योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1131, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ३२३
वाहक पुण्यनाम है, जो आत्मा के प्रमाद से हुआ है । यद्यपि केवल-पद से उत्थान हुआ है, तो भी प्रमादी नहीं, क्योंकि उसे आत्मा का स्मरण रहा है । जब आत्मपद को भूला, तब तीसरा आधिभौतिक हुआ और पञ्चतत्त्वों को अपना रूप जानने लगा । हे राम ! जीव के ये तीन स्वरूप हैं । आत्मा के प्रमाद से जीवसंज्ञा पाता है, दुःखी और परतन्त्र होता है । इससे पाञ्चभौतिक और अन्तवाहक को त्यागकर वास्तव स्वरूप में स्थित होओ । हे राम ! ये जो स्थूल और सूक्ष्म शरीर हैं, वे आत्मविचार से नष्ट हो जाते हैं । पर तीसरा जो स्वरूप है, वह सत्य है । तुम उर्मी में स्थित होओ । राम ने पूछा, हे भगवन् ! ये तीन रूप जो तुमने जीव के कहे, उनके मध्य में नाशरूप कौन है और सतरूप कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! हाथ-पाँव से युक्त जो देह भोग में मिली हुई है, वह स्थूलरूप है । यह जीव अपने ही संकल्प से सदा इसका प्रमाद करता है । चित्तरूपी देह इस स्फुरणरूप से अन्त-र्वाहक है । वह सदा प्राणवायु के रथ पर स्थित रहता है—देह हो, चाहे न हो ।
हे राम ! ये दोनों शरीर उपजते और नष्ट भी होते हैं । आदि-अन्त से रहित चिन्मात्र जो निर्विकल्प है, उसे जीव का परमरूप जानो । जो तुरीयपद है, उसी में जाग्रत् आदिक उपजे हैं और उसी में लीन होते हैं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं तीन को जानता हूँ—एक जाग्रत् है जो निद्रा से रहित और जिसमें इन्द्रियाँ और चार अन्तःकरण अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं । दूसरा स्वप्न है । उसमें भी इन्द्रियाँ विषय को जाग्रत् की तरह संकल्प से ग्रहण करती हैं । तीसरे में इन्द्रियाँ अपने विषय से रहित होती हैं और जड़ता आती है, तब कुछ नहीं भासित होता । शिला की तरह जड़ता तमोगुणात्मक है—यह सुषुप्ति है । इन तीनों को तो मैं जानता हूँ । अब तुरीय और तुरीया-तीत को कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अपना होना और न होना, दोनों को त्यागकर शेष केवल तुरीयपद रहता है । वह शान्त और निर्मलपद है । हे राम ! तुरीय जाग्रत् नहीं; क्योंकि जाग्रत्