योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३३१
आत्मा है, उसमें स्थित होओ। विश्व-कल्पनामात्र है, आत्मा में कुछ नहीं। यह विश्व संकल्प की दृढ़ता से सत् की तरह जान पड़ता है। पहिले भी शुक्र, लवण राजा और इन्द्र के पुत्रों के वृतान्त में कहा है कि संकल्प से जो उन्हें जगत् दृढ़ होकर भासित हुआ था, सो वास्तव में कुछ नहीं था। वैसे ही यह विश्व भी चित्त के फुरने में स्थित है। असम्यकदृष्टि से अद्वैत आत्मा में दृश्य भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में जल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार आदिक अज्ञान से दृश्य भासित होते हैं। इससे इनको त्यागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थित होओ। हे राम! एक गढ़ तुमको बताता हूँ, जिसमें किसी शत्रु की गति नहीं। उसमें स्थित होओ। हम भी उसी गढ़ में स्थित हैं; और जितने ज्ञानवान् हैं, वे उसी में स्थित होते हैं।
हे राम! काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदिक विकार आत्मा में नहीं पाये जाते। जैसे रात्रि में दिन नहीं होता, वैसे ही विकाररूपी दिन गढ़रूपी रात्रि में नहीं पाया जाता। इससे अचिन्त्यरूप गढ़ में, जहाँ कोई फुरना नहीं और जो केवल शान्तरूप है, अहंभाव त्यागकर स्थित होओ तो अहं-त्वं भाव निवृत्त हो जावै। जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब ज्ञानी फुरने और न फुरने में स्वरूप को समान देखता है और सम्पूर्ण जगत् उसको आत्मरूप दिखता है। इससे चिदावली से देह पर्यन्त जो अनात्म है, उसको क्रम-क्रम से त्यागो। प्रथम देह को त्यागो, फिर इन्द्रियों के अभिमान को त्यागो। इसी क्रम से सबको त्यागकर अपने वास्तवस्वरूप में स्थित होओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवत्वाभावप्रतिपादनं नामाष्टाधिकशततमस्सर्गः ॥ १०८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार चेतनमात्र है। आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। आत्मा ही विश्वरूप होकर स्थित है। जैसे सूर्य की किरणें ही जल का आभास होती हैं, वैसे ही आत्मा का चमत्कार दृश्यरूप होकर स्थित है। जैसे संकल्प और संकल्प करनेवाला भिन्न नहीं और आकाश ही भ्रम से मोती की माला होकर भासित होता है, वैसे ही आत्मा ही