सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३३१

आत्मा है, उसमें स्थित होओ। विश्व-कल्पनामात्र है, आत्मा में कुछ नहीं। यह विश्व संकल्प की दृढ़ता से सत् की तरह जान पड़ता है। पहिले भी शुक्र, लवण राजा और इन्द्र के पुत्रों के वृतान्त में कहा है कि संकल्प से जो उन्हें जगत् दृढ़ होकर भासित हुआ था, सो वास्तव में कुछ नहीं था। वैसे ही यह विश्व भी चित्त के फुरने में स्थित है। असम्यकदृष्टि से अद्वैत आत्मा में दृश्य भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में जल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार आदिक अज्ञान से दृश्य भासित होते हैं। इससे इनको त्यागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थित होओ। हे राम! एक गढ़ तुमको बताता हूँ, जिसमें किसी शत्रु की गति नहीं। उसमें स्थित होओ। हम भी उसी गढ़ में स्थित हैं; और जितने ज्ञानवान् हैं, वे उसी में स्थित होते हैं।

हे राम! काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदिक विकार आत्मा में नहीं पाये जाते। जैसे रात्रि में दिन नहीं होता, वैसे ही विकाररूपी दिन गढ़रूपी रात्रि में नहीं पाया जाता। इससे अचिन्त्यरूप गढ़ में, जहाँ कोई फुरना नहीं और जो केवल शान्तरूप है, अहंभाव त्यागकर स्थित होओ तो अहं-त्वं भाव निवृत्त हो जावै। जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब ज्ञानी फुरने और न फुरने में स्वरूप को समान देखता है और सम्पूर्ण जगत् उसको आत्मरूप दिखता है। इससे चिदावली से देह पर्यन्त जो अनात्म है, उसको क्रम-क्रम से त्यागो। प्रथम देह को त्यागो, फिर इन्द्रियों के अभिमान को त्यागो। इसी क्रम से सबको त्यागकर अपने वास्तवस्वरूप में स्थित होओ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवत्वाभावप्रतिपादनं नामाष्टाधिकशततमस्सर्गः ॥ १०८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार चेतनमात्र है। आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। आत्मा ही विश्वरूप होकर स्थित है। जैसे सूर्य की किरणें ही जल का आभास होती हैं, वैसे ही आत्मा का चमत्कार दृश्यरूप होकर स्थित है। जैसे संकल्प और संकल्प करनेवाला भिन्न नहीं और आकाश ही भ्रम से मोती की माला होकर भासित होता है, वैसे ही आत्मा ही

३३२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

दृश्यरूप होकर भासित होता है । जैसे बीज ही वृक्ष, फूल और फल होता है, वैसे ही विश्व आत्मा ही है और दृश्यरूप होकर स्थित है । जैसे जल के तरंग जल ही हैं, वैसे ही विश्व आत्मा ही है । हे राम ! चिदावली, जीव, अहंकार, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय, देह, विश्व, आकाश, काल, दिशा, पदार्थ, सब कुछ आत्मा ही है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । इससे विश्व को अपना स्वरूप जानो । जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य ही है, वैसे ही तुम जानो कि सब मैं ही हूँ । जो ऐसे न जान सको तो ऐसे जानो कि देह भी जड़ है और इन्द्रियों से पालित है; वह देह मैं नहीं हूँ । इन्द्रियाँ भी मैं नहीं, क्योंकि प्राण इन्द्रियों का सार है । जो प्राण न हो तो इन्द्रियाँ किसी काम की नहीं ।

प्राण भी मैं नहीं; क्योंकि प्राण का सार मन है । जो मन मूर्च्छित होता है और प्राण (साँस) आते-जाते भी हैं तो भी किसी काम के नहीं । मन भी मैं नहीं; क्योंकि मन को प्रेरणावाली बुद्धि है । जो निश्चय बुद्धि करती है, मन भी वहीं जाता है । बुद्धि भी मैं नहीं; क्योंकि बुद्धि का प्रेरक अहंकार है । अहंकार भी मैं नहीं; क्योंकि अहंकार का सार जीव है । जीव के बिना अहंकार किसी काम का नहीं । जीव भी मैं नहीं; क्योंकि जीव का सार चिदावली है । शुद्ध चित् में चैतन्यो-न्मुखत्व होने को चिदावली कहते हैं । जीवसंज्ञा से प्रथम ईश्वरभाव चिदावली भी मैं नहीं; क्योंकि चिदावली का सार चिन्मात्र है और वह अद्वितीय निर्विकल्प स्वरूप है । ये सब अनात्मभ्रम से सिद्ध हुए हैं, मैं केवल शान्तरूप आत्मा हूँ । हे राम ! जो तुम्हारा वास्तवस्वरूप है, वही होकर रहो । अपने भिन्न अनात्म में अहं-प्रीति को त्याग दो । तुम देह से रहित निर्विकार हो, तुममें जन्म-मरणादिक कोई विकार नहीं और तुम शान्तरूप ज्यों के त्यों स्थित हो । तुम कर्ता स्वरूप में और नहीं हुए-उसी स्वरूप में स्थित रहो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सार पयोधनं नाम नवा-धिकशततमस्सर्गः ॥ १०९ ॥

वसिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा चिन्मात्र से बढ़कर और सार कुछ

❁ निर्वाण प्रकरण ❁ ३३५

नहीं। उसी में स्थित रहो, जिससे सब ताप मिट जावें। हे राम! सर्वत्र आत्मा ही स्थित है। जैसे बीज ही फलफूल होकर स्थित होता है, वैसे ही सब कुछ आत्मा में ही स्थित है। तब निषेध और त्याग किसका करिये? इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे शिष्य! वशिष्ठजी के वचन सुन रामजी प्रसन्न हुए। जैसे कमल सूर्य को देखकर खिल जाता है, वैसे ही रामजी की बुद्धि वशिष्ठजी के वचनरूपी सूर्य से खिल उठी। तब वह बोले, हे भगवन् सर्वधर्मज्ञ! आपकी कृपा से अब मैं जगा। बड़ा आश्चर्य है कि आत्मा सर्वदा अनुभवरूप और अपना रूप आप है, पर उसके प्रमाद से मैंने इतने काल तक दुःख पाया। अहंता और ममतारूपी बड़ा बोझ जो सिर पर था, उससे मैं दुःखी था। जैसे किसी के सिर पर पत्थर की शिला हो और ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप में वह पैदल चले तो दुःख पाता है, और जो उसके सिर से कोई उस शिला को उतार ले और छाया में बैठाये तो बड़े सुख को प्राप्त होता है, वैसे ही अज्ञानरूपी धूप में अहंताममतारूपी शिला के बोझ से मैं दुःखी था, आपने वचनरूपी बल से उस शिला को उतार लिया और आत्मरूपी वृक्ष की छाया में विश्राम कराया।

हे भगवन्! अब मुझे शान्तिपद प्राप्त हुआ है और मेरे तीनों ताप मिट गये हैं। अब जो सुमेरु पर्वत का भार भी आ पड़े तो भी मुझे कोई कष्ट नहीं। अब मेरे सब संशय निवृत्त हुए हैं। जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल और स्वच्छरूप होता है, वैसे ही रागद्वेषरूपी मेरा द्वन्द्व नष्ट हो गया। अब मैं अपने स्वभाव में स्थित हूँ। परन्तु एक प्रश्न है, कृपा करके उसका उत्तर दीजिये। महापुरुष बारम्बार प्रश्न करने से बुरा नहीं मानते। हे भगवन्! आप कहते हैं कि सब ब्रह्म ही है तो शास्त्र का यह विधि-निषेध और उपदेश किसके लिए है कि यह कर्म कर्तव्य है और यह कर्म कर्तव्य नहीं।

वशिष्ठजी बोले, हे राम! आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। विश्व भी उसका चमत्कार है। जैसे समुद्र में पवन से नाना प्रकार के तरङ्ग उठते हैं, पर जल से वे भिन्न नहीं, वैसे ही चैतन्य आत्मा में अहंभाव को

३४४ ॠ योगवाशिष्ठ ॠ

लेकर चैतन्यान्मुखत्व उपजा है। उसमें देश, काल, वस्तु बन गये हैं और शास्त्र निकले हैं। फिर फुरने में उसके दो रूप—हुए हैं एक विद्या और दूसरा अविद्या। उसमें विद्यारूप जो जीव हुए हैं, वे ईश्वर कहलाते हैं और अविद्यारूप जीव हैं, जिनको अपने स्वरूप में अहं प्रत्यय वास्तव रहा है, वे ईश्वर हैं, और जिनका स्वरूप का प्रमाद हुआ और जो संकल्प-विकल्प में बहते हैं, वे जीव दुखी हैं।

हे राम ! इतनी संज्ञा फुरने में हुई है, तो भी आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। जैसे एक ही रस फूल, फल और वृक्ष हुआ है, रस से भिन्न कुछ नहीं। आत्मा रस की तरह भी परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ। फुरने में ईश्वर-जीव और विद्या-अविद्या हुए हैं—आत्मा में कुछ नहीं। हे राम ! जिनका संकल्प आधिभौतिक में दृढ़ नहीं हुआ, वे जीव शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होते हैं और उनको आत्मा का साक्षात्कार भी शीघ्र ही होता है। जिसका संस्कार आधिभौतिक में दृढ़ हुआ है, वे चिरकाल में आत्मपद को प्राप्त होते हैं। आत्मपद की प्राप्ति बिना वे दुःख पाते हैं। जिनको आत्मपद की प्राप्ति होती है, वे सुखी होते हैं।

हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी के स्वरूप में और कुछ भेद नहीं, केवल सम्यक् और असम्यक् दर्शन का भेद है। हे राम ! विद्या भी दो प्रकार की है—एक ईश्वरवाद और दूसरा अनीश्वरवाद है। जो ईश्वरवादी हैं, वे तुरीयपद को प्राप्त होते हैं, और जो अनीश्वरवादी हैं, उनको जब ईश्वर की भावना होती है, तब वे शास्त्र और गुरु द्वारा ईश्वर को प्राप्त होते हैं। ईश्वरवादी भी दो प्रकार के हैं—एक वे जो और वासना त्यागकर ईश्वरपरायण होते हैं, वे शीघ्र ही ईश्वर को प्राप्त होते हैं। आत्मा ही ईश्वर है, जो सबका अपनारूप है। दूसरे प्रकार के जीव ईश्वर को मानते हैं, पर उनकी वासना संसार की ओर होती है। वे चिरकाल में आत्म-पद को प्राप्त होते हैं। अनीश्वरवादी भी दो प्रकार के हैं--एक कहते हैं कि कुछ होगा। उनको होते-होते की भावना में शास्त्र और गुरु के द्वारा आत्मपद की प्राप्ति होगी। दूसरे कहते हैं कि कुछ नहीं है। उनको चिरकाल में जब आस्तिक भावना होगी, तब वे आत्मपद को प्राप्त होंगे।

❁ निर्वाण प्रकरण ❁ ३३५

हे राम ! उनके निमित्त विधि और निषेध कहे हैं कि शुभकर्म को अङ्गी- कार करो और अशुभ कर्म त्यागो। उससे जब अन्तःकरण शुद्ध होगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी। जो विधि-निषेध शास्त्र न कहें तो बड़ा छोटे को खा जाय। इस निमित्त शास्त्र का दण्ड है। हे राम ! स्वरूप से किसी को उपदेश नहीं, भ्रम में उपदेश है। जिस पुरुष का भ्रम निवृत्त हुआ है, वह फिर मोह में नहीं डूबता—जैसे जल में डूबा फिर नहीं डूबता। जिसका चित्त वासना से घिरा हुआ जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा है, उसका इस संसार से निकलना कठिन है। जैसे उजाड़ के कुएँ में गिरकर निकलना कठिन होता है, वैसे ही चित्त से मिलकर संसार से निकलना कठिन होता है।

हे राम ! इस चित्त को स्थिर करो, जिससे तुम्हारे दुःख मिट जावें और सत्तासमान पद को प्राप्त होओ।

हे राम ! जिसको आत्मा का साक्षात्कार हुआ है और अनात्म में अहं-प्रत्यय निवृत्त हुआ है वह पुरुष जो कुछ करता है; उसमें नहीं बँधता। वह अपने को सदा अकर्ता देखता है। जिसको अनात्मा में अहं- प्रत्यय है, वह सदा पुरुष करे तो भी कर्ता है और जो न करे तो भी कर्ता है। हे राम ! जो अज्ञानी शुभ कर्म करता है वह शुभ कर्म करता हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है, और अशुभ कर्म करने से नरक को प्राप्त होता है। जो शुभ कर्म को त्यागता है तो भी नरक को प्राप्त होता है; क्योंकि उसे अनात्म में आत्म अभिमान रहता है। इससे बुद्धि का निग्रह करो और इन्द्रियों से चेष्टा करो। देखने, सुनने, सूँघने को मैं तुम्हें नहीं वर्जता, मैं यही कहता हूँ कि अनात्म में अभिमान को त्यागो। जब अनात्म के अभिमान को त्यागोगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। तब जहाँ तुम्हारा चित्त जायगा, वहाँ आत्मा ही भासित होगा—आत्मा से भिन्न कुछ न भासित होगा। इससे चित्त को त्यागो और आत्मपद में स्थित हो। चित्त अहंभाव का नाम है। जैसे विश्व की उत्पत्ति हुई है, सो भी सुनो। शुद्ध चैतन्यमात्र में चिदावलीरूप अहंतरङ्ग उठा है। उस चिदावलीरूप समुद्र में जीवरूपी तरङ्ग उपजता है और जीवरूपी

३३६ # योगवाशिष्ठ

समुद्र में अहंरूपी तरङ्ग भासित हुआ है । अहंकाररूपी समुद्र में बुद्धिरूपी तरङ्ग उपजा है । बुद्धिरूपी समुद्र में चित्तरूपी तरङ्ग उठा है और चित्तरूपी समुद्र में संकल्परूपी तरङ्ग उपजा है । उस संकल्परूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग उपजा है और जगतरूपी समुद्र में देहरूपी तरङ्ग भासित हुआ है । उसके संयोग से दृश्य का ज्ञान हुआ कि यह पदार्थ है, यह नहीं है, ये ऐसे हैं । उसी से देश, काल, दिशा सब हुए हैं ।

हे राम ! निदान ये सब संकल्प से ही गये हैं । अतएव आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । केवल शान्तरूप एकरस आत्मा है । उसमें नाना प्रकार के आचार रचे हैं । जैसे स्वप्न की सृष्टि जो नाना प्रकार की दिखती है, सो अपना ही अनुभव होता है, वैसे ही इस जगत को भी जानो । आत्मा सर्वदा एकरस, अद्वैत, शुद्ध, परम निर्वाण, अपने आप में स्थित है । उसके फुरने से नाना प्रकार की कल्पनाएँ उदय हुई हैं । हे राम ! शुद्ध आत्मा में चिदेव संज्ञा भी संकल्प से हुई है—"चिदेव पञ्चभूतानि; चिदेव भुवनत्रयम्" । आत्मा अनिर्वाच्यपद है । उसमें वाणी की गति नहीं । वह शुद्ध शान्तरूप है । चिदेव जो स्फुरित है, उस स्फुरण से संसार हुआ सा स्थित है । जैसे एक ही बीज ने वृक्ष, फूल, फल आदि संज्ञाएँ पाई हैं, पर वह बीज से भिन्न कुछ नहीं । पर आत्मा बीज की तरह भी नहीं, संकल्प से ही नाना संज्ञाएँ हुई हैं और जगत् स्थित है । तो भी आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे वायु चलती है तो भी वायु है और ठहरती है तो भी वायु है, वैसे ही आत्मा में नानात्व कुछ नहीं, वह केवल शुद्ध अद्वैत है । आत्मरूपी समुद्र में नाना प्रकार के विश्वरूपी तरङ्ग स्थित हैं । हे राम ! आकार भी आत्मा से भिन्न नहीं, जो आत्मा से भिन्न भासित हो, उसे मिथ्या जानो । मृगतृष्णा के जल की तरह उसे जानकर उसकी भावना त्यागो और स्वरूप की भावना करो ।

इति श्रीयो० निर्वाण० ब्रह्मै० कल्पप्रति० नामदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरे वचनों को ग्रहण कर हृदय में आस्तिक भावना करो । जब सर्वत्याग करोगे, तब चित्त क्षीण हो

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३३७

जावेगा और जब चित्त क्षीण हुआ तब शान्ति होगी। हे राम ! काष्ठ- वत् मौन होकर हृदय में सबका त्याग करो। बाहर से कर्मों को करो, पर अभिमान से रहित होकर अन्तर्मुख हो रहो। अन्तर्मुख आत्मा में स्थित होने को कहते हैं। जब आत्मा में स्थित होगे, तब विद्यमान दृश्य भी तुम्हें न भासित होगा, क्योंकि तब सब आत्मा ही प्रतीति होगा। जो तुम्हारे पास भेरी के शब्द होंगे, तो भी न सुन पड़ेंगे और जो सुगन्धि सूँघोगे तो भी नहीं मोहित करेगी। निदान जो कुछ कर्म करोगे सो तुम्हें स्पर्श न करेगा—आकाश की नाईं सबसे असंग रहोगे। हे राम ! स्वरूप से भिन्न न देख पड़े और आत्मा से भिन्न न फुरे, तुम अन्धे-गूँगे की तरह और पत्थर की शिला के समान मौन हो रहो, तब तुम्हारी चेष्टा यन्त्र की पुतली के समान अनिच्छित होगी। जैसे यन्त्र की पुतली धागे की सत्ता से चेष्टा करती है, वैसे ही तुम्हारी नीति-शक्ति से प्राणों की चेष्टा होगी। स्वाभाविक क्रिया में अभिमान से रहित होकर स्थित होओ। जो अभिमान सहित चेष्टा करता है, वह मूर्ख और असम्यक्दर्शी है। जो सम्यक्दर्शी है, उसको अनात्म शरीरादि में अभिमान नहीं होता। हे राम ! जिसको अनात्म में अभिमान नहीं और जिसका चित्त दृश्य में लिप्त नहीं होता, वह चाहे सारी सृष्टि का संहार करे अथवा उसे उत्पन्न करे, उसको कुछ बन्धन नहीं होता; क्योंकि वह सब कर्म अभिलाषा से रहित होकर करता है।

हे राम ! समाधि में स्थित हो और जाग्रत् की तरह सब कर्म करो। तुममें सब कर्म भी दिखें तो भी उनमें सुषुप्त की तरह कोई वासना न उठे। अपने स्वरूप की समाधि रहे। समाधि भी तब कहिये, जब कोई दूसरा हो, जो इसमें स्थित हो व इसका त्याग करे। हे राम ! जहाँ एक शब्द और दो शब्द भी नहीं कह सकते, वह अद्वितीयआत्मा परमार्थ- सत्ता है। उसमें चित्त ने नाना प्रकार के विकार कल्पित किये हैं—ज्ञानी को सब एकरस भासित होता है। ज्ञानी को ज्ञानी जानता है। जैसे सर्प के निशान को सर्प ही जानता है, वैसे ही ज्ञानी को एकरस

३३८ * योगवाशिष्ठ *

आत्मा ही भासित होता है, सो ज्ञानी ही जानता है। मूर्ख को संकल्प में नाना प्रकार का जगत दिखता है, इससे संकल्प को त्यागकर अपने प्रकृत आचार में विचरो। जैसे उन्मत्त और बालक की चेष्टा स्वाभाविक होती है कि अङ्ग हिलते हैं, वैसे ही अभिमान में रहित होकर चेष्टा करो। जैसे पत्थर की शिला जड़ होती है, वैसे ही दृश्य की भावना में ऐसे रहित हो कि जड़ की तरह कुछ न फुरे। जब ऐसे होगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। हे राम! चित्त के सम्बन्ध में क्षोभ उत्पन्न होता है। जैसे वसन्तऋतु में फूल उत्पन्न होते हैं, वैसे ही चित्तरूपी वसन्त-ऋतु में दुःखरूपी फूल उत्पन्न होते हैं। जब तुम चित्त को शान्त करोगे, तब परमपद को प्राप्त होगे, जो सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल है। इससे तुम असंग हो रहो। जब तुम स्थूल से स्थूल होगे, तब भी असंग रहोगे। ऐसे पद को पाकर काष्ठ-पत्थर की तरह मौन हो रहो।

हे राम! दृश्य पदार्थ को त्यागकर जो द्रष्टा जाननेवाला है, उसमें स्थित हो। हे राम! इन्द्रियाँ तो अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं। उनकी ओर तुम भावना मत करो कि यह सुन्दर रूप है और इसकी प्राप्ति हो। भले के प्राप्त होने की भावना मत करो। इनके जानने-वाला जो आत्मा है, उसी में स्थित रहो। जो पुरुष द्रष्टा में स्थित होता है, वह गोपद की तरह संसारसमुद्र को नाँघ जाता है। हे राम! जो पदार्थ दिखते हैं, उनमें अपनी-अपनी सृष्टि है। वह संकल्पमात्र ही है और अपने-अपने संकल्प में स्थित है। पर सब संकल्प आत्मा के आश्रित हैं। जैसे सब पदार्थ आकाश में स्थित हैं, वैसे ही सब संकल्पों की सृष्टि आत्मा के आश्रित है। एक के संकल्प को दूसरा नहीं जानता—सृष्टि अपनी-अपनी है। जैसे समुद्र में जितने बुलबुले हैं; उनकी जल में एकता है और आकार में एकता नहीं, वैसे ही स्वरूप से सबंकी एकता है और संकल्पसृष्टि अपनी-अपनी है। जो पुरुष ऐसे सोचता है कि मैं उसकी सृष्टि को जानूँ, तब जानता है।

हे राम! आत्मा कल्पवृक्ष है; उसमें जैसी कोई भावना करता है, वैसी ही सिद्धि होती है। जब ऐसी ही भावना करके जीव स्वरूप में

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३३६

लगता है कि सब सृष्टि मुझे भासित हो तो भावना से वह भासित होती है। ज्ञानी ऐसी भावना नहीं करता, क्योंकि आत्मा से भिन्न वह कोई पदार्थ नहीं जानता और जानता है कि स्वरूप से सबकी एकता है, पर संकल्परूप से एकता नहीं होती। जैसे तरंगों की एकता नहीं, पर जल की एकता है और जो एक तरंग दूसरे के साथ मिल जाती है तो उसमे एकता होती है, वैसे ही एक का संकल्प भावना से दूसरे के साथ मिलता है; इससे ज्ञानी जानता है कि संकल्परूप आकार नहीं मिलते और स्वरूप में सबकी एकता है। जिसकी भावना होती है कि मैं इसकी सृष्टि को देखूँ तो वह उसके संकल्प में अपना संकल्प मिलाकर देखता है, तब उसकी सृष्टि जानता है। जैसे दो मणियों का प्रकाश भिन्न-भिन्न होता है और जब दोनों इकट्ठी एक ही स्थान में रखिये तो दोनों का प्रकाश इकट्ठा हो जाता है, वैसे ही संकल्प की एकता भावना से होती है। ज्ञानी को प्रथम संकल्प हो कि मैं उसकी सृष्टि देखूँ तो संकल्प से देखता है, पर ज्ञान के उपजने से वाञ्छा नहीं रहती।

हे राम ! इच्छा चित्त का धर्म है। जब चित्त ही नष्ट हो गया, तब इच्छा किसको रहे। जब स्वरूप का प्रमाद होता है, तब चित्तरूपी दैत्य प्रसन्न होता है कि यह मेरा आहार हुआ और मैं इसको भोजन करूँगा। हे राम ! जो पुरुष चित्त के वश हुआ है और जिसको स्वरूप की भावना नहीं हुई, उसे चित्तरूपी दैत्य जन्मरूपी बन में लिये फिरता है; उसको लील लेता है, उसका पुरुषार्थ नष्ट करता है और आत्मभावनावाली बुद्धि उत्पन्न नहीं होने देता। जैसे वृक्ष को अग्नि लगे तो फिर उसमें फल नहीं लगते, वैसे ही पुरुषार्थरूपी वृक्ष को भोगरूपी अग्नि लगी तो शुद्ध बुद्धिरूपी फल उत्पन्न नहीं होता। हे राम ! अपना चित्त आत्मा में लगाओ और फिर विषय की ओर उसे न जाने दो। यह चित्त दुष्ट है; जब इसको स्थिर करोगे, तब परम अमृत में शोभायमान होंगे। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत में शोभा पाता है, वैसे ही ब्रह्मलक्ष्मी में शोभित होकर परम निर्वाणपद को प्राप्त होगे।

इति श्रीयो० नि० निर्वाणवर्णनं नामैकादशाधिकशततमस्सर्गः ॥ १११ ॥

३४० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञान की सप्त भूमिका हैं । इनमें ज्ञान की उत्पत्ति होती है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिस भूमिका में जिज्ञासु पहुँचता है, उसका लक्षण क्या है और ये सप्तभूमिका क्या हैं, कैसे प्राप्त होती हैं, सो कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सप्तभूमिका जिस प्रकार प्राप्त होती हैं और जिस प्रकार इनमें ज्ञान प्राप्त होता है सो सुनो । हे राम ! जब बालक माता के गर्भ में होता है, तब उसकी दृढ सुषुप्ति जड़ अवस्था होती है—जैसे ज्ञानी को होती है—परन्तु बालक में संस्कार रहता है, इससे संस्कार की सत्यता आगे होती है । जैसे बीज में अंकुर होता है, उससे आगे चलकर वृक्ष होता है; वैसे ही बालक की भावी होती है । पर ज्ञानी का भावी नहीं होती । जैसे दग्ध बीज में अंकुर नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी की भावी नहीं होती; क्योंकि वह संसार में सुप्त है, और स्वरूप में स्थित नहीं है । जब बालक को बाहर निकलकर कुछ काल व्यतीत होता है तब उसकी वह दृढ जड़ता निवृत्त हो जाती है और सुषुप्ति रहती है । कुछ काल के उपरान्त सुषुप्ति भी लय हो जाती है और चेतनता होती है । तब वह जानता है कि 'यह मैं हूँ' 'ये मेरे माता पिता हैं' । तब कुलवाले उसको सिखाते हैं कि यह मीठा है; यह कडुवा है; यह तेरी माता है; यह तेरा पिता है; यह तेरा कुल है; इससे पाप होता है; इससे पुण्य होता है; इससे स्वर्ग मिलता है, इससे नरक पाता है; इस प्रकार यज्ञ होता है, इस प्रकार तप होता है और इस प्रकार दान करते हैं ।

हे राम ! इस प्रकार कुल के उपदेश और शास्त्र के भय से वह धर्म में निरत होता और पाप का त्याग करता है । ऐसा शास्त्र के अनुसार आचरण करनेवाला पुरुष धर्मात्मा कहलाता है । वे धर्मात्मा पुरुष भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्ति की ओर है और दूसरा निवृत्ति की ओर । जो प्रवृत्ति की ओर है, वह पुण्य कर्मों से स्वर्ग के फल भोगता है और मोक्ष को उत्तम नहीं जानता, इससे संसार में जल के तृण की तरह भ्रमण करता है । कभी चिरकाल में वह इस संसार-चक्र से छुटकारा पाता है । जो निवृत्त की ओर होता है, उसको विषयभोग से वैराग्य

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३४१

उपजता और वह कहता है कि यह संसार मिथ्या है; मैं इससे तरूँ और उस पद को प्राप्त होऊँ, जहाँ क्षय और अतिशय न हो—यह संसार सर्वदा चलरूप और दुःखदायी है। हे राम! उस पुरुष को इस क्रम से ज्ञान और विज्ञान उत्पन्न होता है। और जो पशुधर्मी मनुष्य है, उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है। शास्त्र के अर्थ के न जाननेवालों को पशु-धर्मी कहते हैं। वे अपनी इच्छा के अनुसार आचरण कर अशुभ को ग्रहण करते और विचार से रहित होते हैं। मनुष्य भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्तिमार्गी और दूसरे निवृत्तिमार्गी।

जिसको शास्त्र शुभ कहे उसको ग्रहण करना और जिसे अशुभ कहे उसका त्याग करना और यह कामना करके फल के निमित्त यज्ञादिक शुभ कर्म करना कि स्वर्ग, धन, पुत्रादिक मुझे प्राप्त हों, प्रवृत्ति-मार्ग है। ऐसी कामना रखकर शुभ कर्म करके जो इस प्रकार संसारसमुद्र में बहते हैं, वे चिरकाल में निवृत्ति की ओर भी आते हैं और तब स्वरूप को जान पाते हैं। निवृत्तिमार्गी वह है, जो निष्काम होकर और शुभ कर्म करके अन्तःकरण को शुद्ध करता है, उसको वैराग्य उपजता है और वह कहता है कि मुझे कर्मों से क्या है और उनके फलों से क्या है; मैं किसी प्रकार आत्मपद को प्राप्त होऊँ। वह यही विचारता है कि मैं संसार से कब मुक्त हूँगा। यह संसार मिथ्या है और मुझे भोग से क्या है? यह भोग तो सर्प है।

हे राम! इस प्रकार वह भोगों की निन्दा करता है; संसार से उप-रत होता है; शम, दम आदिक जो ज्ञान के साधन हैं, उनका आचरण करता है; शुभ-अशुभ, देश, काल और पदार्थ को विचारता है; मर्यादा से बोलता है; संतजनों का संग करता और सत्शास्त्र और ब्रह्म-विद्या को बारम्बार विचारता है। इस प्रकार मन्तजनों के संग से उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है। जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती है और विषयों के उपरत होती है। तब वह तीर्थ, ठाकुरद्वारों आदि शुभ स्थानों को पूजता है; देह और इन्द्रियों से मन्तों की टहल करता है और सबसे मित्रता रखकर दया,

३४२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

सत्य और कोमलता धारणकर विचरता है। वह ऐसे वचन बोलता है, जिनसे सब कोई प्रसन्न हों और जो यथाशास्त्र हों। इससे भिन्न किसी को कुद्ध नहीं कहता। वह अज्ञानी का संग त्यागता है; स्वर्ग आदि के सुखों की कामना नहीं करता—केवल आत्मपरायण होता है; सन्तों और शास्त्रों की दृढ़भक्ति करता है और उनके अर्थों में मन लगाकर और किसी ओर चित्त नहीं लगाता। जैसे कदर्य मूर्ख सर्वदा धन का चिन्तन करता है, वैसे ही वह सदा आत्मा का चिन्तन करता है। जो पुरुष इतने गुणों से युक्त है, उसको प्रथम भूमिका प्राप्त हुई है। वह पापरूपी सर्प को बाँस के समान नष्ट करता है; मन्तजन, मन्तशास्त्र और धर्मरूपी मेघ को गर्दन ऊँची करके देखता है और प्रसन्न होता है। इसका नाम शुभेच्छा है। उसको फिर दूसरी भूमिका प्राप्त होती है। तब जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है। उसका लक्षण है—मन्तशास्त्रों और ब्रह्मविद्या को विचार कर उनमें दृढ़ भावना करना। इस विचार का कवच जो गले में डालना है, उससे शस्त्रों का कोई घाव नहीं लगता। इन्द्रियरूपी चोर के हाथ में इच्छारूपी बरछी है। वह विचाररूपी कवच पहननेवाले को नहीं लगती।

हे राम ! इन्द्रियरूपी सर्प में तृष्णारूपी विष है, उससे वह मूर्ख को मारता है। विचारवान् पुरुष इन्द्रियों के विषयों का नाश कर डालता है, सब ओर से उदासीन रहता है और दुर्जनों की संगति को बल करके त्याग करता है। जैसे गधा तृण को त्यागता है, वैसे ही वह मूर्ख की संगति को त्यागता है। उसमें सब इच्छाओं का भी त्याग होता है; परन्तु एक यह इच्छा रहती है कि दया सब पर करता है और मन्तापवान रहता है। उसके निषिद्धदोष स्वाभाविक रूप से जाते रहते हैं—दम्भ, गर्व, मोह, लोभ आदि स्वभावतः नष्ट हो जाते हैं। जैसे सर्प कञ्चुकी (केंचुल) को त्यागकर शोभायमान होता है, वैसे ही विचार-वान् पुरुष इन्द्रियों के विषयों को त्यागकर शोभा पाता है। जो उसको क्रोध भी आता है तो क्षणमात्र रहता है, हृदय में स्थिर नहीं हो सकता। वह खाना, पीना, लेना, देना आदि कर्म विचारपूर्वक करता है और

✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ३४३

सर्वदा शुद्धमार्ग में विचरणता है। मन्तजनों का संगकर और सतशास्त्रों का अर्थ विचारकर बोध को बढ़ाता और तीर्थों के स्नान से काल व्यतीत करता है। हे राम ! यह दूसरी भूमिका है।

जब तीसरी भूमिका आती है, तब श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्म-शास्त्र) के अर्थ हृदय में स्थित होते हैं और जैसे कमल पर भँवरे आकर स्थित होते हैं, वैसे ही उस पुरुष के हृदय में शुभ गुण स्थित होते हैं। तब उसे फूलों की शय्या सुखदायी नहीं लगती, वन और कन्दरा सुख-दायक लगती हैं। निदान उसका वैराग्य दिन दिन बढ़ता जाता है। वह तालाबों, बावलियों और नदियों में स्नान करके शुभ स्थानों में रहता है। पत्थर की शिला पर शयन करता है। देह को तप से क्षीण करता है। धारणा से चित्त को किमी स्थान में नहीं लगाता। आत्म-भावना और ध्यान करके भोगों से सर्वदा निवृत्त होता है। भोगों को अन्तवन्त विचार कर अर्थात् ये बने नहीं रहते, यह सोचकर और देह के अहंकार को उपाधि जानकर वह त्यागता है। देह को रक्त, मांस, मल आदिक से पूर्ण जानकर उसमें अहंकार को त्यागता है। उसकी निन्दा करता है और सूखे तृण की नाईं तुच्छ जानकर त्याग देता है। जैसे विष्ठायुक्त तृण को पशु त्यागता है, वैसे ही देह के अहंकार को वह त्यागता है और कन्दराओं में विचर कर फल-फूलों का आहार करता है, मन्तजनों की टहल करके आयु बिताता है और सदा असंग रहता है। यह तीसरी भूमिका है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रथमद्वितीयतृतीय भूमिकालक्षण-विचारो नाम द्वादशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११२ ॥

वसिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञान का यह साधन है कि ब्रह्मविद्या को विचार के उसके अर्थ की बारम्वार भावना करे और पुण्यक्रियाओं का आचरण करे। इससे भिन्न ज्ञान का कोई साधन नहीं—इसी से ज्ञान की प्राप्ति होती है। जिस पुरुष को ऐसी भावना होती है, उसको यदि नाना प्रकार की सुगन्ध—अगर, चन्दन, चोये आदि और अप्सरा अनिच्छित प्राप्त हों तो उनका निगदर करता है और जो स्त्री को देखता

३४४ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

है तो माता समान जानता है; पराये धन को पत्थर के बट्टे समान देखकर वाञ्छा नहीं करता और सब प्राणियों पर दया करता है। जैसे अपने सुख को प्रसन्न करनेवाला है और दुःख को अनिष्ट जानता है, वैसे ही और को भी अपने सदृश जानकर सुख देता है, दुःख किसी को नहीं देता। इस प्रकार वह पुण्य कर्म करता रहता है। सतशास्त्रों के अर्थ का अभ्यास करता है और सर्वदा असंग रहता है। असंग भी दो प्रकार का है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! संग-असंग का लक्षण क्या है, इनका भेद समझाकर कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! असंग दो प्रकार का है—एक समान और दूसरा विशेष। उनका लक्षण सुनो। समान असंग यह है कि मैं कुछ नहीं करता, न मैं किसी को देता हूँ और न मुझे कोई देता है। सब ईश्वर की आज्ञा है। जिसको धन देने की इच्छा होती है उसको वह धन देता है और जिससे लेना होता है उससे लेता है; अपने अधीन कुछ नहीं। समान असंगवाला जो कुछ दान, तप, यज्ञादि करता है, वह ईश्वरार्पण करता है और अपना अभिमान कुछ नहीं करता। कहता है कि सब ईश्वर की शक्ति से होता है। इस प्रकार निरभिमान होकर वह धर्मचेष्टा में स्वाभाविक विचरणता है। जो कुछ इन्द्रियों के भोग की सम्पदा है उसको आपदा जानता है, और भोगों को महाआपदारूप मानता है। सम्पदा आपदारूप है; संयोग वियोग-रूप है और जितने पदार्थ हैं वे सब सन्निपातरूप हैं—विचार से नष्ट हो जाते हैं। इससे सबको वह नाशरूप जानता है।

यह संयोग-वियोग को दुःखदायी जानता है। परस्त्री को विष का बेलि समान रस से रहित जानता है और सब पदार्थों को परिणामी जान कर किसी की इच्छा नहीं करता। सम्पूर्ण विश्व का जो ईश्वर है, उसे जिसको सुख देना है, उसको वह सुख देता है और जिसको दुःख देना है उसको दुःख देता है। अपने हाथ कुछ नहीं। करने करानेवाला ईश्वर है। न मैं करता हूँ; न मैं भोक्ता हूँ; और न मैं वक्ता हूँ—सब ईश्वर की सत्ता से होता है। ऐसे निरभिमान होकर वह पुण्यकर्म करता है। यह समान असंग है। उसके वचन सुनने में श्रवण को अमृत की प्राप्ति होती

निर्वाण प्रकरण । ३४५

है । इस प्रकार सन्तों के मिलने और तीसरी भूमिका की प्राप्ति से जिसकी बुद्धि बढ़ी है और जो निरभिमान है, उसके उपदेश में अनुभव से तब तक अभ्यास करे, जब तक हाथ पर रखे आँवले की नाईं आत्मा का अनुभव साक्षात्कार प्रत्यक्ष हो । विशेष असंगवाला कहता है कि न मैं कुछ करता हूँ, न कराता हूँ; केवल आकाशरूप आत्मा हूँ । न मुझमें करना है, न कराना है। न कोई और है, न मेरा है। मैं केवल आकाशरूप अद्वैत आत्मा हूँ।

हे राम ! वह पुरुष न भीतर, न बाहर, न पदार्थ, न अपदार्थ, न जड़, न चेतन, न आकाश, न पाताल, न देश, न पृथ्वी, न मैं न मेरे को देखता है । वह निर्वाण, अज, अविनाशी, सब शब्द-अर्थों से रहित, केवल शून्य आकाश में स्थित है । चित्त से रहित चेतन में जो प्रस्थित है, उसको श्रेष्ठ असंग कहते हैं । उसकी चेष्टा देख भी पड़ती है तो भी उसमें हृदय में पदार्थों की भावना का अभाव है । जैसे जल में कमल दिखता है । परन्तु जल से ऊपर ही रहता है, वैसे ही वह कर्म करता देख पड़ने पर भी असंग रहता है । उसको कोई कामना नहीं रहती कि यह हो और यह न हो; क्योंकि उसको संसार का अभाव निश्चय हुआ है और वह सब कल्पनाओं से रहित है । उसको आत्मा से भिन्न किसी पदार्थ की सत्ता नहीं फुरती । यह श्रेष्ठ असंग कहाता है । कार्य करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और न करने में कुछ हानि नहीं होती । वह सर्वदा असंग है और संसार में कभी नहीं डूबता, क्योंकि वह तो संसारसमुद्र के पार हुआ है, उसने अनात्म में आत्म-भावना त्यागी है; अहंभाव का त्याग किया है । इष्ट-अनिष्टरूप जितने पदार्थ हैं, उनके सुख-दुःख की वेदना उसे नहीं फुरती और वह सदा मौनरूप हैं। उसके लेखे धन पत्थर के समान है । यह श्रेष्ठ असंग कहाता है ।

हे राम ! एक कमल है, जो अज्ञानरूपी कीचड़ से निकलकर आत्मरूपी जल में विराजता है । उसका बीज संसार की अभावना है । उस जल में तृष्णारूपी मछलियाँ हैं, जो उस कमल के चहुँ ओर

३४६ योगवाशिष्ठ ।

फिरती है और उसके साथ कुकर्म दुःखरूपी काँटे हैं। अज्ञानरूपी रात्रि में उस कमल का मुख मूँदा रहता है और विचाररूपी सूर्य का उदय होने से वह खिलता और शोभा पाता है। उसमें सुगन्ध सन्तोष है। वह हृदय के बीच लगता है। उसका फल असंग है। यह तीसरी भूमिका में उगता है। हे राम! सन्तों की संगति और सतशास्त्रों के विचार से मनुष्य सार को प्राप्त करता है और अमृत मोक्ष को पाता है। बड़ा कष्ट है कि ऐसे स्वरूप को भूलकर जीव दुःखी होते हैं। इनका स्वरूप आनन्दरूप है, जो दुःखों का नाश करता है और जिसमें कोई दुःख नहीं। वह इन भूमिकाओं के द्वारा प्राप्त होता है। हे राम! यह तीसरी भूमिका ज्ञान के निकटवर्ती है और विचारवान् पुरुष इन भूमिकाओं में स्थित होकर बुद्धि को बढ़ाते हैं। जब इस प्रकार मनुष्य बोध को बढ़ाता है तो शास्त्र की युक्ति से रक्षा करता है और क्रमशः इस तीसरी भूमिका को प्राप्त होता है, जहाँ असंगता प्राप्त होती है। जैसे किसान खेती की रक्षा करके उसे बढ़ाता है, वैसे ही वह विचाररूपी जल से बुद्धि को बढ़ाना है। तब बुद्धिरूपी बेल बढ़ती है। फिर चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है और अहंकार, मोहादिक शत्रुओं से रक्षा होती है।

हे राम! इस भूमिका को प्राप्त होकर मनुष्य ज्ञानवान् होता है। सो यह भूमिका क्रमशः प्राप्त होती है, अथवा बड़े पुण्य कर्म किये हों तो फुरती है या अकस्मात् भी फुरती है। जैसे नदी के तट पर कोई आ बैठा हो और नदी के वेग से बीच में जा पड़े, वैसे ही जब पहली भूमिका प्राप्त होती है, तब बुद्धि को बढ़ाती है, और जब बुद्धिरूपी बेलि बढ़ती है, तब ज्ञानरूपी फल लगता है। जब ज्ञान उपजता है, तब उसमें प्रत्यक्ष क्रिया दिखे तो भी उसका वह अभिमान नहीं करता, जैसे शुद्धमणि प्रतिबिम्ब को ग्रहण भी करती है, परन्तु उसमें कोई रङ्ग नहीं चढ़ता।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे तृतीयाभूमिकाविचारो नाम त्रयोदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११३ ॥

राम बोले, हे भगवन्! आपने भूमिका का वर्णन किया, पर उसमें

* निर्वाण प्रकरण * ३४७

मुझे यह संशय है कि जो भूमिका से रहित और प्रकृति के सम्मुख हैं उनको भी कदाचित् ज्ञान उपजेगा अथवा न उपजेगा ? जो एक, दो वा तीन भूमिका पाकर शरीर छूटे और आत्मा का साक्षात्कार न हुआ हो और उसको स्वर्ग की भी कामना न हो, तो वह कौन गति पाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष विषयी हैं, उनको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है । वे वासना करके घटीयन्त्र की तरह कभी स्वर्ग की ओर कभी पाताल को जाते और दुःख पाते हैं । कभी अकस्मात् काकतालीय न्याय से ही उनको सन्तों के संग और सत्शास्त्रों को सुनने की वासना फुरती है । जैसे मरुस्थल में बेलि लगना कठिन है, वैसे ही जिस पुरुष को आत्मा का प्रमाद और भोग की भावना है उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है । परन्तु जब अकस्मात् उसे सन्तों के संग से वैराग्य उपजता है और उसकी बुद्धि निवृत्ति की ओर आती है, तब भूमिका के द्वारा उसे ज्ञान प्राप्त होता है और तभी वह मुक्त होता है ।

हे राम ! अकस्मात् की यही भावना उपजे बिना जीव नाना योनियों में भ्रमता है । जिसको एक अथवा दो भूमिका प्राप्त हुई हैं और शरीर छूट गया तो वह और जन्म पाकर ज्ञान को प्राप्त होता है, उसका पिछला संस्कार जाग जाता है और दिन-दिन बढ़ता जाता है । जैसे बीज से प्रथम वृक्ष का अंकुर होता है, फिर डाल, फूल और फल से वह बढ़ता जाता है, वैसे ही उसका अभ्यास बढ़ता जाता है और ज्ञान प्राप्त होता है । जैसे पहलवान कसरत कर रात्रि को सो जाता है और फिर दिन हुए उठता है तब पहलवानी का अभ्यास आप फुरता है और वह कसरत करने लगता है, अथवा जैसे कोई मार्ग चलता-चलता सो जावे और जागकर चलने लगे, वैसे ही वह फिर पूर्व के अभ्यास में लगता है । हे राम ! जिसको यह भावना होती है कि मुझे विशेषता प्राप्त हो, वह जन्म पाता है । ब्रह्मा से चींटीपर्यन्त जिसको विशेष होने की कामना है, वह भी जन्म पाता है । ज्ञानी को भोगों की और विशेष प्राप्त होने की इच्छा नहीं होती । जिसको भोग की इच्छा होती है, वह भोग में अपने को विशेष जानता है और अनिष्ट की निवृत्ति की

३४८ * योगवाशिष्ठ *

इच्छा करता है । ज्ञानी को कोई वासना नहीं होती कि यह विशेषता मुझे प्राप्त हो, इसी से वह फिर जन्म नहीं पाता । जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही वासना से रहित ज्ञानी जन्म नहीं पाता ।

हे राम ! जन्म का कारण वासना है । जैसी-जैसी वासना होती है, वैसी-वैसी अवस्था को जीव प्राप्त होता है । वासना नाना प्रकार की हैं । जब शरीर छूटने का समय आता है, तब जो वासना प्रबल दृढ़ होती है और जिसका सर्वदा अभ्यास होता है, वही अन्तकाल में दिखाई देती है, चाहे वह पाठ की, तप की, कर्म की, देवता इत्यादिक की हो, सबको दबाकर वही उस समय उठती है । हे राम ! उस समय जो सामने पदार्थ होते हैं, वे भी नहीं भासित होते; पाँचों इन्द्रियों के विषय विद्यमान हों तो भी नहीं भासित होते; वही पदार्थ भासित होता है, जिसका दृढ़ अभ्यास किया हुआ होता है । वासनाएँ तो अनेक होती हैं, परन्तु जैसी वासना दृढ़ होती है, उसी के अनुसार शरीर धारण करता है । जब देह छूटती है, तब मुहूर्तपर्यन्त सुषुप्ति की नाईं जड़ता रहती है, उसके उपरान्त चेतनता होती है । तब जीव वासना के अनुसार शरीर देखता है और जानता है कि यह मेरा शरीर है; मैं उत्पन्न हुआ हूँ । कोई ऐसे होते हैं कि उसी क्षण में युग का अनुभव करते हैं । कोई ऐसे होते हैं कि चिरकाल पर्यन्त जड़ रहते हैं, तब उनको चेतनता फुरती है, और उसके अनुसार संसार भ्रम देखते हैं । और कोई, जो संस्कारवान् होते हैं, उनको शीघ्र ही एक क्षण में चेतनता होती है और वे जानते हैं कि हम उस जगह मरे थे और इस जगह जन्मे हैं; यह हमारी माता है, यह पिता है और यह कुल है ।

इस प्रकार एक मुहूर्त में जागकर वे देखते हैं और बड़े कुल को देखते हैं । इसी प्रकार वे परलोक और यमराज के दूतों को देखते हैं और जानते हैं कि ये हमें लिये जाते हैं और हमारे पुत्रों ने पिण्ड दिये हैं, उन पिण्डों से हमारा शरीर बना है और दूत ले चले हैं । तब आगे ये धर्मराज को देखते हैं और उनके निकट जाके खड़े होते हैं । पुण्य और पाप दोनों मूर्ति धारण कर उनके आगे स्थित

* निर्वाण प्रकरण * ३४६

होते हैं । तब धर्मराज अन्तर्यामी से एक-एक का हाल पूछते हैं कि इसने क्या कर्म किये हैं ? यदि पुण्यवान् होता है तो स्वर्गभोग भोगा-कर फिर योनि में डाला जाता है और जो पापी होता है तो नरक में डाल देते हैं । निदान सब प्रकार के जन्म लेने पड़ते हैं । सर्प की योनि में कहता है कि मैं सर्प हूँ । ऐसे ही जब जीव बैल, वानर, तीतर, मछली, बगला, गर्दभ, बेलि, वृक्ष इत्यादि की योनि पाता है, तो जानता है कि मैं यही हूँ । अकस्मात् काकतालीय न्याय से कभी मनुष्यशरीर पाता है तो माता के गर्भ में जानता है कि यहाँ मैंने जन्म लिया है; यह मेरी माता है, मैं पिता से उत्पन्न हुआ हूँ और यह मेरा कुल है । फिर बाहर निकलता है और बालक होता है तब जानता है कि मैं बालक हूँ । यौवन अवस्था होती है तब जानता है कि मैं जवान हूँ । फिर वृद्ध होता है तब जानता है कि मैं वृद्ध हूँ ।

इस प्रकार काल बिताकर जब मरता है तो सर्प, तोता, तीतर, वानर, मच्छ, कच्छ, वृक्ष, पशु, पक्षी, देवता इत्यादिक जन्म धारण करता है । हे राम ! संसार में वह घटीयन्त्र की तरह फिरता है । कभी ऊपर और कभी नीचे को जाता है । इसी प्रकार स्वरूप के प्रमाद से जीव दुःख पाता है । हे राम ! इतना विस्तार जो तुमसे कहा है, सो बना कुछ नहीं, केवल अद्वैत आत्मा है; पर चित्त के संयोग से इतना भ्रम देखता है । वासना द्वारा विमानों को देखता है और आकाश में जाता है । जैसे पवन गन्ध को ले जाता है, वैसे ही पुर्यष्टका को साथ ले जाता है और शरीर देखता है । हे राम ! आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । परन्तु चित्त के संयोग से जीव इतने भ्रम देखता है । इससे चित्त को स्थिर करो तो भ्रम मिट जायगा और आत्मतत्त्वमात्र ही शेष रहेगा । जो शुद्ध और आनन्दरूप है, उसी में स्थित हो रहो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्ववासनारूपवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह तो प्रवृत्तिवाले का क्रम कहा । अब निवृत्ति का क्रम सुनो । जिसको भूमिका प्राप्त हुई है और आत्मपद

३५०

  • योगवासिष्ठ *

नहीं प्राप्त हुआ, उसके सब पाप भस्म हो जाते हैं। जब उसका शरीर छूटता है; तब वह वासना के अनुसार शून्याकार हुआ। फिर अपने साथ शरीर देखता है और फिर बड़े परलोक को देखता है, जहाँ स्वर्ग के सुख भोगता है। फिर विमान पर चढ़कर लोकपालों के पुरों में विचरता है, जहाँ मन्द मन्द पवन चलता है, सुन्दर वृक्षों की सुगन्ध है और पाँचों इन्द्रियों के रमणीय विषय हैं। देवताओं में क्रीड़ा करता है और भोगों को भोगकर संसार में उपजता है। फिर भूमिका क्रम को प्राप्त होता है। जैसे मार्ग चलता कोई सो जाय तो वह जागकर फिर चलता है, वैसे ही शरीर पाकर वह फिर भूमिका के क्रम को प्राप्त होता है और जैसी जैसी भावना दृढ़ होती है, वैसे ही वैसे भाषित होता है। यह सब जगत् संकल्पमात्र है। संकल्प के अनुसार ही यह भाषित होता है और वासना के अनुसार परलोक के भ्रम जन्य सुख-दुःख देखता है। वहाँ से उन्हें भोगकर फिर संसार में आ पड़ता है। इसी प्रकार संकल्प से भटकता है। फिर जब कभी आत्मा की ओर उन्मुख होता है, तब संसार का भ्रम मिट जाता है। जब तक आत्मा की ओर नहीं आता, तब तक अपने संकल्प से संसार को देखता है। प्रति जीव को अपनी अपनी सृष्टि भाषित होती है। देवता, दैत्य, भूमिलोक, स्वर्ग, सब संकल्प के रचे हुए हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र से लेकर तृण तक, जो कुछ संसार दिखता है, वह सब मनोमात्र है, मन के संकल्प से उदय हुआ है और असद्रूप है। जैसे मनोराज्य, गन्धर्वनगर और स्वप्नसृष्टि भ्रम है, वैसे ही यह जगत् भ्रम है। सब सृष्टि परस्पर अदृष्ट है; कहीं उदय होती दिखती है और कहीं लय हो जाती है।

जैसे मूर्च्छ और देश को जाता है, वैसे ही देह को त्यागकर जीव परलोक को जाता है। पर स्वरूप की स्थिति में आना जाना, अहं त्व की कोई कल्पना नहीं है—केवल सत्तामात्र अपने आपमें स्थित है। और जगत् भी वही है। हे राम! यह विश्व आत्मस्वरूप है। जैसे मणि में चमक का चमत्कार होता है, वैसे ही विश्व-आत्मा का चमत्कार है। जो कुछ तुमको दिखता है, सो आत्मा ही है। आत्मा के