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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1140, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1140

३३२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

दृश्यरूप होकर भासित होता है । जैसे बीज ही वृक्ष, फूल और फल होता है, वैसे ही विश्व आत्मा ही है और दृश्यरूप होकर स्थित है । जैसे जल के तरंग जल ही हैं, वैसे ही विश्व आत्मा ही है । हे राम ! चिदावली, जीव, अहंकार, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय, देह, विश्व, आकाश, काल, दिशा, पदार्थ, सब कुछ आत्मा ही है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । इससे विश्व को अपना स्वरूप जानो । जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य ही है, वैसे ही तुम जानो कि सब मैं ही हूँ । जो ऐसे न जान सको तो ऐसे जानो कि देह भी जड़ है और इन्द्रियों से पालित है; वह देह मैं नहीं हूँ । इन्द्रियाँ भी मैं नहीं, क्योंकि प्राण इन्द्रियों का सार है । जो प्राण न हो तो इन्द्रियाँ किसी काम की नहीं ।

प्राण भी मैं नहीं; क्योंकि प्राण का सार मन है । जो मन मूर्च्छित होता है और प्राण (साँस) आते-जाते भी हैं तो भी किसी काम के नहीं । मन भी मैं नहीं; क्योंकि मन को प्रेरणावाली बुद्धि है । जो निश्चय बुद्धि करती है, मन भी वहीं जाता है । बुद्धि भी मैं नहीं; क्योंकि बुद्धि का प्रेरक अहंकार है । अहंकार भी मैं नहीं; क्योंकि अहंकार का सार जीव है । जीव के बिना अहंकार किसी काम का नहीं । जीव भी मैं नहीं; क्योंकि जीव का सार चिदावली है । शुद्ध चित् में चैतन्यो-न्मुखत्व होने को चिदावली कहते हैं । जीवसंज्ञा से प्रथम ईश्वरभाव चिदावली भी मैं नहीं; क्योंकि चिदावली का सार चिन्मात्र है और वह अद्वितीय निर्विकल्प स्वरूप है । ये सब अनात्मभ्रम से सिद्ध हुए हैं, मैं केवल शान्तरूप आत्मा हूँ । हे राम ! जो तुम्हारा वास्तवस्वरूप है, वही होकर रहो । अपने भिन्न अनात्म में अहं-प्रीति को त्याग दो । तुम देह से रहित निर्विकार हो, तुममें जन्म-मरणादिक कोई विकार नहीं और तुम शान्तरूप ज्यों के त्यों स्थित हो । तुम कर्ता स्वरूप में और नहीं हुए-उसी स्वरूप में स्थित रहो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सार पयोधनं नाम नवा-धिकशततमस्सर्गः ॥ १०९ ॥

वसिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा चिन्मात्र से बढ़कर और सार कुछ

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