योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ निर्वाण प्रकरण ❁ ३३५
हे राम ! उनके निमित्त विधि और निषेध कहे हैं कि शुभकर्म को अङ्गी- कार करो और अशुभ कर्म त्यागो। उससे जब अन्तःकरण शुद्ध होगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी। जो विधि-निषेध शास्त्र न कहें तो बड़ा छोटे को खा जाय। इस निमित्त शास्त्र का दण्ड है। हे राम ! स्वरूप से किसी को उपदेश नहीं, भ्रम में उपदेश है। जिस पुरुष का भ्रम निवृत्त हुआ है, वह फिर मोह में नहीं डूबता—जैसे जल में डूबा फिर नहीं डूबता। जिसका चित्त वासना से घिरा हुआ जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा है, उसका इस संसार से निकलना कठिन है। जैसे उजाड़ के कुएँ में गिरकर निकलना कठिन होता है, वैसे ही चित्त से मिलकर संसार से निकलना कठिन होता है।
हे राम ! इस चित्त को स्थिर करो, जिससे तुम्हारे दुःख मिट जावें और सत्तासमान पद को प्राप्त होओ।
हे राम ! जिसको आत्मा का साक्षात्कार हुआ है और अनात्म में अहं-प्रत्यय निवृत्त हुआ है वह पुरुष जो कुछ करता है; उसमें नहीं बँधता। वह अपने को सदा अकर्ता देखता है। जिसको अनात्मा में अहं- प्रत्यय है, वह सदा पुरुष करे तो भी कर्ता है और जो न करे तो भी कर्ता है। हे राम ! जो अज्ञानी शुभ कर्म करता है वह शुभ कर्म करता हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है, और अशुभ कर्म करने से नरक को प्राप्त होता है। जो शुभ कर्म को त्यागता है तो भी नरक को प्राप्त होता है; क्योंकि उसे अनात्म में आत्म अभिमान रहता है। इससे बुद्धि का निग्रह करो और इन्द्रियों से चेष्टा करो। देखने, सुनने, सूँघने को मैं तुम्हें नहीं वर्जता, मैं यही कहता हूँ कि अनात्म में अभिमान को त्यागो। जब अनात्म के अभिमान को त्यागोगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। तब जहाँ तुम्हारा चित्त जायगा, वहाँ आत्मा ही भासित होगा—आत्मा से भिन्न कुछ न भासित होगा। इससे चित्त को त्यागो और आत्मपद में स्थित हो। चित्त अहंभाव का नाम है। जैसे विश्व की उत्पत्ति हुई है, सो भी सुनो। शुद्ध चैतन्यमात्र में चिदावलीरूप अहंतरङ्ग उठा है। उस चिदावलीरूप समुद्र में जीवरूपी तरङ्ग उपजता है और जीवरूपी