योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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लेकर चैतन्यान्मुखत्व उपजा है। उसमें देश, काल, वस्तु बन गये हैं और शास्त्र निकले हैं। फिर फुरने में उसके दो रूप—हुए हैं एक विद्या और दूसरा अविद्या। उसमें विद्यारूप जो जीव हुए हैं, वे ईश्वर कहलाते हैं और अविद्यारूप जीव हैं, जिनको अपने स्वरूप में अहं प्रत्यय वास्तव रहा है, वे ईश्वर हैं, और जिनका स्वरूप का प्रमाद हुआ और जो संकल्प-विकल्प में बहते हैं, वे जीव दुखी हैं।
हे राम ! इतनी संज्ञा फुरने में हुई है, तो भी आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। जैसे एक ही रस फूल, फल और वृक्ष हुआ है, रस से भिन्न कुछ नहीं। आत्मा रस की तरह भी परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ। फुरने में ईश्वर-जीव और विद्या-अविद्या हुए हैं—आत्मा में कुछ नहीं। हे राम ! जिनका संकल्प आधिभौतिक में दृढ़ नहीं हुआ, वे जीव शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होते हैं और उनको आत्मा का साक्षात्कार भी शीघ्र ही होता है। जिसका संस्कार आधिभौतिक में दृढ़ हुआ है, वे चिरकाल में आत्मपद को प्राप्त होते हैं। आत्मपद की प्राप्ति बिना वे दुःख पाते हैं। जिनको आत्मपद की प्राप्ति होती है, वे सुखी होते हैं।
हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी के स्वरूप में और कुछ भेद नहीं, केवल सम्यक् और असम्यक् दर्शन का भेद है। हे राम ! विद्या भी दो प्रकार की है—एक ईश्वरवाद और दूसरा अनीश्वरवाद है। जो ईश्वरवादी हैं, वे तुरीयपद को प्राप्त होते हैं, और जो अनीश्वरवादी हैं, उनको जब ईश्वर की भावना होती है, तब वे शास्त्र और गुरु द्वारा ईश्वर को प्राप्त होते हैं। ईश्वरवादी भी दो प्रकार के हैं—एक वे जो और वासना त्यागकर ईश्वरपरायण होते हैं, वे शीघ्र ही ईश्वर को प्राप्त होते हैं। आत्मा ही ईश्वर है, जो सबका अपनारूप है। दूसरे प्रकार के जीव ईश्वर को मानते हैं, पर उनकी वासना संसार की ओर होती है। वे चिरकाल में आत्म-पद को प्राप्त होते हैं। अनीश्वरवादी भी दो प्रकार के हैं--एक कहते हैं कि कुछ होगा। उनको होते-होते की भावना में शास्त्र और गुरु के द्वारा आत्मपद की प्राप्ति होगी। दूसरे कहते हैं कि कुछ नहीं है। उनको चिरकाल में जब आस्तिक भावना होगी, तब वे आत्मपद को प्राप्त होंगे।