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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1138, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1138

३३० | योगवाशिष्ट

राम ने पूछा, हे भगवन् ! देह, इन्द्रिय और कल्पना में सार वस्तु क्या है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ यह अहं-त्व आदि दृश्य जगत् है, सो सब चिन्मात्र है। जैसे समुद्र जलमात्र ही है, वैसे ही जगत् चिन्मात्र है। मनसहित षट् इन्द्रियों में जो कुछ दृश्य प्रतीत होता है, सो ब्रह्ममात्र है। हे राम ! देह, इन्द्रिय आदि सब मिथ्या हैं; आत्मा में ये कोई नहीं हैं। चित्त के द्वारा कल्पित हैं और चित्त ही इनको देखता है। जैसे मरुस्थल में मृग को जलबुद्धि होती है तो जल के निमित्त दौड़कर दुःख पाता है, वैसे ही चित्तरूपी मृग आत्मरूपी मरुस्थल में देह-इन्द्रिय-विषयरूपी जल की कल्पना कर दौड़ता है और दुःख पाता है। ये देह और इन्द्रियाँ भ्रम से भासित होते हैं। जैसे मूर्ख बालक परछाहीं में वेताल की कल्पना करता है, वैसे ही मूर्ख चित्त ने देह-इन्द्रियादि की कल्पना की है। हे राम ! आत्मा शुद्ध, निर्विकार है। उसमें चित्त ने भ्रम से विकार आरोपित किये हैं। जैसे भ्रान्त दृष्टि में आकाश में दो चन्द्रमा दिखते हैं, वैसे ही चित्त ने देह-इन्द्रिय आदि की कल्पना की है। पर चित्त भी सत्य नहीं है; आत्मा की सत्ता लेकर चेष्टा करता है। जैसे चुम्बक की सत्ता लेकर लोहा चेष्टा करता है, वैसे ही निर्विकार आत्मा की सत्ता लेकर चित्त नाना प्रकार के विकारों की कल्पना करता है। इससे चित्त का त्याग करो, जिससे तुम्हारा विकार-जाल मिट जावे।

हे राम ! देह-इन्द्रियों में सार क्या है, सो सुनो। जो कुछ संसार है, उसका सार देह है; क्योंकि सब देह के सम्बन्धी हैं। जब देह मिट जाता है, तब सम्बन्धी भी नहीं रहते। देह का सार इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों का सार प्राण है; प्राणों का सार मन है और मन का सार बुद्धि है। बुद्धि का सार अहंकार है, अहंकार का सार जीव है, जीव का सार चिदावली है। चिदावली वासना-संयुक्त चेतना को कहते हैं। चिदावली का सार चित्त से रहित शुद्ध चैतन्य है, जिसमें सब विकल्प लय हो जाते हैं। जो शुद्ध, निर्मल और चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है, उसमें कोई उत्थान नहीं। हे राम ! चिदावली पर्यन्त सबको त्यागकर इनका जो सार चैतन्य

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