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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1137, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1137

⚙️ निर्वाण प्रकरण ३२६

अभाव है। जो कुछ शब्द आदिक संज्ञाएँ हैं, वे भी स्फुरण में हैं; आत्मा तो अनिर्वचनीयपद है। उसकी इतनी संज्ञा शास्त्रकारों ने कही हैं—शून्यवादी उसी को शून्य कहते हैं; विज्ञानवादी विज्ञानरूप कहते हैं; उपासनावाले उसी को ईश्वर कहते हैं। कोई कहते हैं कि आत्मा सबका कारण है, वही शेष रहता है। कोई आत्मा को सर्वशक्तिमान् कहते हैं। कोई कहते हैं कि आत्मा निःशक्ति है। कोई साक्षी आत्मा और शक्ति को भिन्न मानते हैं।

हे राम ! जितने वाद हैं, वे सभी कल्पना से हुए हैं। कल्पना को मानकर ही सब वाद उठाते हैं। वास्तव में कोई वाद नहीं। आत्मा निर्वाच्यपद है। मेरा जो सिद्धान्त है, वह भी सुनो। आत्मा सब कलनाओं से अतीत है। जैसे पवन स्पन्दनशक्ति से उठता है और निस्पन्द से ठहर जाता है—क्योंकि स्पन्दन भी पवन है और निस्पन्द भी पवन है, इतर कुछ नहीं—वैसे ही आत्मा शुद्ध अद्वैतरूप है, और कलना भी आत्मा के आश्रय से होती है; आत्मा से भिन्न नहीं है। और जो भिन्न प्रतीत होती है, उसको मिथ्या जानकर त्यागो, और अपने निर्विकार स्वरूप में स्थित रहो। जब तुम आत्मस्वरूप में स्थित होगे, तब जितने शास्त्रों के भिन्न-भिन्न मतवाद हैं, वे कोई न रहेंगे; केवल अपना आप स्वच्छ आत्मा ही भासित होगा। हे राम ! उस निर्विकल्पपद को पाकर तुमने शान्ति पाई है। तुम असत् की तरह स्थित हुए हो; क्योंकि द्वैतकलना नहीं फुरती। हे राम ! आत्मा, ब्रह्म आदि शब्द भी उपदेश के लिए कहे हैं। आत्मा तो शब्द से अतीत है। यह सब जगत् आत्मस्वरूप है और संसाररूप विकार आत्मा में असम्यग्दर्शन से प्रतीत होते हैं। जैसे शून्य आकाश में तारे मोती सदृश भासित होते हैं, सो अविदित हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् द्वैत अविदित भासित होता है। इससे जगत् द्वैत की भावना त्यागकर निर्विकल्प आत्मस्वरूप में स्थित रहो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यानाशरूपवर्णनं नाम सप्ताधिकशततमस्सर्गः ॥ १०७ ॥