सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ २६५

वैसे ही तेरा आत्मा तेरे पास और सदा अनुभवरूप है। उसके प्रमाद से तू अपने को दुःखी जानता है। जब अज्ञानरूपी निद्रा से तू जागेगा, तब अपने को जानेगा और तेरे दुःख और शोक नष्ट हो जावेंगे। देह और इन्द्रियादिक जो दृश्य हैं, उनसे मिलकर अपने को यह जानना कि मैं हूँ, यही अज्ञाननिद्रा है। इससे रहित होकर देख, जिसमें आनन्द को प्राप्त हो। ये जो पदार्थ दिखते हैं, सब मिथ्या हैं। जैसे बालक मृत्तिका में राजा, मेना, हाथी और घोड़े की कल्पना करता है, किन्तु वास्तव में उनमें न कोई राजा होता है, न मेना होती है, न कोई हाथी-घोड़ा होता है एक मृत्तिका ही होती है, वैसे ही चित्तरूपी बालक ने आत्मरूपी मृत्तिका में जो राजा और मेना आदिक सम्पूर्ण विश्व की कल्पना की है, सो सब मिथ्या है। हे राजन् ! एक उपाय तुझसे कहता हूँ, उसे कर, जिसमें तेरे दुःख नष्ट हो जावें। एक वस्तु जो 'अहं अभिलाषा सहित वासना है, उसका त्याग कर। फिर जहाँ इच्छा हो वहाँ विचर। तुझे दुःख का स्पर्श न होगा। संकल्प ही उपाधि है और कोई उपाधि नहीं। जैसे जब मणि तृण से ढकी होती है, तब नहीं देख पड़ती और जब तृण दूर करिये तब मणि प्रकट हो जाती है, वैसे ही आत्मारूपी मणि वासनारूपी तृण से ढकी है। जब वासनारूपी तृण दूर कीजिये, तब आत्मारूपी मणि प्रकट हो।

हे राजन् ! जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति से रहित जो आत्मपद है, उसको जब प्राप्त होगा, तब जानेगा कि मैं मुक्त हूँ। तेरा स्वरूप तो केवल आत्मरूप है, उस पद में स्थित हो। वह अजन्मा, नित्य, चैतन्य-मात्र और सबका अपना रूप है। उसी के प्रमाद से दुःख होता है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलौने बनाते हैं और हाथी, घोड़ा आदि उनके नाम कल्पित कर अभिमान करते हैं कि ये मेरे हैं और उनका नाश होने से दुःखी होते हैं, वैसे ही बालकरूप अज्ञानी स्वरूप के प्रमाद में अभिमान करता है कि ये मेरे हैं और मैं इनका हूँ, और उनका नाश होने से दुःखी होता है—यह नहीं जानता कि सत् का नाश नहीं होता। का असत् नाश होने में सत् का नाश मान बैठता है। जैसे घट का

२६६ ✹ योगवासिष्ठ ✹

नाश होने से घटाकाश का नाश मानिये, वैसे ही मूर्खता से दुःख पाता है। हे राजन् ! तू अपनी आत्मा जान। आत्मादिक संज्ञा की शास्त्रों ने उपदेश के लिए कल्पित की है, नहीं तो आत्मा अनिर्वच-नीय पद है। उसमें वाणी की गति नहीं, पर इन्हीं से जाना जाता है, क्योंकि मन और वाणी में भी आत्मसत्ता है; उसी से आत्मादिक संज्ञा सिद्ध होती है। जैसे जितने स्वप्न के पदार्थ हैं; उनमें अनुभवसत्ता है, उससे वे पदार्थ सिद्ध होते हैं, वैसे ही जितनी कुछ अर्थ-संज्ञाएँ हैं, वे सब आत्मा से सिद्ध होती हैं। ऐसा जो तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो जिसमें जरा-मृत्यु आदि दुःख नष्ट हो जावें ।

हे राजन् ! निःस्पन्द होकर देखेगा तो स्पन्दन में भी वही भासित होगा, और स्पन्दन-निःस्पन्दन तुल्य ही जान पड़ेंगे । जो समाधि में होगा अथवा चेष्टा करेगा तो भी तुल्य होंगी। और न समाधि में शान्ति भासित होगी और न चेष्टा में दुःख होगा। दोनों में एकरस रहेगा। हे राजन् ! देना अथवा लेना, यज्ञ, दान आदिक क्रियाएँ, जो कुछ प्राकृत आचार प्राप्त हो, उसकी मर्यादा और शास्त्र की विधि से कर, पर निश्चय आत्मस्वरूप में ही रख। जैसे नट तरह-तरह के स्वाँग भरकर सम्पूर्ण चेष्टाएँ करता है, पर उसमें निश्चय नटत्व ही का रहता है, वैसे ही तू सब चेष्टाएँ कर, पर उसके अभिमान और संकल्प से रहित हो। ग्रहण अथवा त्याग, जो कुछ स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो, उसमें ज्यों का त्यों रह। जब निर्विकल्प होकर अपने स्वरूप को देखेगा, तब उत्थानकाल में भी तुझे आत्मा ही दिखेगा। जैसे जल के जानने से तरङ्ग, फेन, बुलबुले आदि सब जल ही भासित होते हैं, वैसे ही जब तू आत्मा को जानेगा, तब संसार भी आत्मरूप दिखेगा। जो आत्मा को नहीं जानता, उसको जगत् ही दिखता है और उससे वह दुःख पाता है। इससे तू अन्तर्मुख हो और संकल्प को त्यागकर परम निर्वाण अच्युतपद में स्थित हो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे गजइक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६६ ॥

२६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, न असत् है, न कोई देश है, न काल है, न कोई पदार्थ है। केवल चैतन्यमात्र गुणातीत है। उसमें न कोई गुण है, न माया है। केवल शान्तरूप आत्मा है।

हे राजन् ! वह शास्त्रों और गुरु के वचनों से पाया जाता है, कोरे तप से नहीं मिलता। केवल अपने आप जाना जाता है, शास्त्रादिक तो लखा देते हैं, परन्तु "यह है" ऐसा कहकर नहीं जनाते। द्रष्टा पुरुष अपने आप जानता है। जैसे नेत्रों में जो सूर्य की ज्योति है, वही सूर्य को देखती है; वैसे ही आत्मा ही आत्मा को देखता है। वह अन्तर्मुख और संकल्प से रहित होकर अपने को आप देखता है। जब संकल्प बहिर्मुख होता है, तब वही दृढ़ होकर स्थित होता है और फिर उसकी भावना होती है। तब संकल्परूप जगत् दृढ़ता से स्थित होता है, तब दुःखदायी होता है। हे राजन् ! जीव को और कोई दुःखदायी नहीं, अपने ही संकल्प से असम्यग्दर्शी दुःखी होता है। सम्यग्दर्शी को जगत् दृष्टिगोचर होने पर भी दुःखदायी नहीं होता। जैसे रम्मी में सर्प की भावना होती है तो भय प्राप्त होता है, फिर जब रम्मी को जान लेने से सर्प का भ्रम दूर होता है, तब भय भी जाता रहता है, वैसे ही पुरुष को जो संसार की भावना होती है, वह दुःखदायी है इससे आत्मा की भावना कर, जिससे तेरे सब दुःख नष्ट हो जावें। हे राजन् ! तू सर्वदा आनन्दरूप और अद्वैत है। तुझमें कोई कल्पना नहीं, तू आत्मस्वरूप है। आत्मा छहों काम, क्रोध आदि विकारों से रहित है। विकार मिथ्या देह के हैं, आत्मा शुद्ध है। आत्मा के प्रमाद से विकार भासित होते हैं। जब तू आत्मा को जानेगा, तब कोई विकार न देख पड़ेगा; क्योंकि आत्मा अद्वैत है।

राजा ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि आत्मा अद्वैत है। जो यह बात है तो पर्वत आदिक विश्व का कैसे भान होता है और पत्थररूप बड़े आकार बन के कहाँ से उपजे हैं ? इसका रूप क्या है, कृपा करके कहो। मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में संसार कोई नहीं। वह सदा शान्तरूप और निराकार है। उसमें स्पन्दन-निःस्पन्द दोनों शक्ति हैं। जब निःस्पन्द शक्ति होती है, तब केवल अद्वैत भासित होता

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २६६

है। और जब स्पन्दनशक्ति चेतती है, तब नाना प्रकार के जगत के आकार भासित होते हैं। पर वास्तव में आत्मा ही है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग कुछ और नहीं, वही है, पर पवन के संयोग से तरंग उठते हैं तो भिन्न भिन्न नजर आते हैं; वैसे ही स्फुरणशक्ति से भिन्न-भिन्न अहंकार भासित होते हैं—वास्तव में सब आत्मस्वरूप हैं—इतर कुछ नहीं। जैसे वट के बीज में पत्ते, डाल, फूल और फल अनेक देख पड़ते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता ने जो नाना प्रकार के आकार रखे हैं, वे यद्यपि देख पड़ते हैं, तो भी कुछ बना नहीं, केवल अद्वैत आत्मा ज्यों का त्यों स्थित है। वह सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है। पर्वत आदिक जो विश्व दिखता है, सो सब आत्मा का चमत्कार है। जैसे स्वप्न में पर्वत और वृक्ष आदिक नाना प्रकार के आकारों का जो भान होता है, वह केवल अनुभव है—उससे इतर कुछ नहीं, वैसे ही जाग्रत विश्व भी आत्मा का अनुभवरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं।

इक्ष्वाकु ने पूछा, हे भगवन् ! जो आत्मा सूक्ष्म है तो असतरूप पर्वतादिक स्थूल पदार्थ सत् होकर कैसे देख पड़ते हैं, यह कृपा करके कहो ? मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में अनन्त शक्ति है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं, सब उसी के रूप हैं। जैसे सूर्य की किरण सूर्य से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा की शक्ति आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे पवन में दो शक्तियाँ हैं—स्पन्दन और निःस्पन्द, सो उसी का रूप है—स्पन्दन-शक्ति से प्रकट भासित होता है और निःस्पन्द से प्रकट नहीं भासित होता, वैसे ही आत्मा में भी स्पन्दन तथा निःस्पन्द, दो शक्तियाँ हैं। जब स्पन्दनशक्ति उठती है, तब अहंभाव प्रकट होता है और जब अहं-भाव हुआ, तब चित्त का उदय होता है। अहं ही चित्त है। जब चित्त हुआ तब आकाश की भावना से आकाश बन जाता है। जब स्पर्श की भावना हुई, तब पवन उत्पन्न होता है। रूप की भावना से अग्नि बनती है। जब रस की भावना हुई, तब जल उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार चित्त की कल्पना से तत्त्व उपजे हैं। जब चारों तत्त्व इकट्ठे हुए, तब एक अण्ड बना। और जब दृढ़ संकल्प किया, तब स्वायंभुव मनु उत्पन्न

३०० ❈ योगवाशिष्ट ❈

हुआ। जब अण्ड फूटा, तब स्वर्ग, मध्य (पृथ्वी) और पाताल, तीन लोक हुए। ये तीनों लोक राजस, सात्त्विक और तामस तीनों गुण हुए। फिर पर्वत आदिक दृश्य पदार्थ हुए।

हे राजन् ! केवल संकल्पमात्र से ही सब हुआ है। जब स्पन्दनशक्ति स्फुरती है, तब ये प्रकार आत्मा में भासित होते हैं, परन्तु वास्तव में कुछ बना नहीं। जैसे समुद्र में फेन और बुलबुले जो उठते हैं, सो जल रूप हैं—जल से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। आदि मनु जो स्वायम्भुव हैं, उनके संकल्प ने आगे मन रचे हैं। इसी प्रकार त्रिगुणमय सृष्टि उत्पन्न होती है, सो केवल संकल्पमात्र है। जब तक चित्त है, तबतक विश्व है; जब चित्तस्फुरण से रहित हुआ, तब शक्ति निःस्पन्द होती है और जब शक्ति निःस्पन्द हुई तब फिर जगत् नहीं दिखाई देता है। हे राजन् ! यह विश्व मन के स्फुरण से है और सत्य की नाईं स्थित हुआ है। मन जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु वह नहीं भासित होता और असत्य की नाईं भासित होता है। वह सत् कैसे असत्य की तरह हुआ है और असत् कैसे मन की तरह हुआ है, यह सुन। सत् जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु सो नहीं भासित होता और असत्य जो परिच्छिन्नरूप देश-काल-वस्तु-परिच्छेद-संयुक्त है, वह मन जैसा भासित हुआ है। जहाँ देखिये, वहाँ दृश्य गुणमय संसार का भान होता है। यह माया महा आश्चर्यरूप है, जिसने सत्य में असत्य की और असत्य में सत्य की प्रतीति कराई है। चित्त के सम्बन्ध से ही संसार भासित होता है; आत्मा में संसार कदापि नहीं है। जब चित्त को स्थित करके देखोगे, तब तुम्हें संसार न भासित होगा।

जैसे गम्भीर जल होता है तो चलता नहीं दीखता, वैसे ही गम्भीर आत्मा में संसार नहीं जाना जाता कि कहाँ जगता है। संसार भी आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, आत्मस्वरूप ही है। जैसे अग्नि की चिनगारी और जल के तरङ्ग अग्नि और जल से भिन्न नहीं अथवा मणि का प्रकाश मणि से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से संसार भिन्न नहीं; केवल आत्मस्वरूप है। ऐसे आत्मा को जानकर शान्ति पाओ।

❄ निर्वाण प्रकरण ❄ ३०१

जिसमे सारे दुःख नष्ट हो जावें। केवल शान्तपद आत्मा तेरा अपना रूप है। अपने स्वरूप को भूल तू दुःखी हुआ है। जब आत्मा को जानेगा, तब संसार भी आत्मरूप दिखेगा, क्योंकि वह आत्मस्वरूप है। आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। ऐसा आत्मा तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो। हे राजन् ! यह सब जगत् चिदाकाशरूप है, यही भावना दृढ़ कर। जिसकी ऐसी भावना दृढ़ है और जिसकी सब इच्छा शान्त हो गईं, उस पुरुष को कोई दुःख नहीं होता। उसने निरिच्छारूपी कवच पहिना है। हे राजन् ! जो अहँ के अर्थ से रहित है, जिसका सर्व शून्य हो गया है और जिसने निरालम्ब का आश्रय लिया है; वह पुरुष मुक्त है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मनुइक्ष्वाकुआख्याने सर्व-ब्रह्मप्रतिपादनं नाम सप्तषष्टितमसर्गः ॥ ६७ ॥

मनु बोले, हे राजन् ! यह संसार आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। जैसे जल और तरङ्ग, सूर्य और किरणें, अग्नि और चिनगारी भिन्न नहीं है, वैसे ही आत्मा और संसार भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप ही है। जैसे इन्द्रियों के विषय इन्द्रियों में रहते हैं वैसे ही आत्मा में संसार है। जैसे पवन में जो स्पन्दन-निःस्पन्दशक्ति है सो पवन से भिन्न नहीं, वैसे ही संसार आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप है। हे राजन् ! विषय की सत्यता को त्यागकर केवल आत्मा की भावना कर, जिसमें तेरे संशय मिट जावें। तू आत्मस्वरूप और निर्गुण है; तुझको गुणों का स्पर्श नहीं होता और तू सबसे परे है। जैसे आकाश में धूल, धुवाँ और बादल ये विकार देख पड़ते हैं, पर आकाश निर्लेप रहता है, वह अद्वैतरूप है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुषों को, जिनको आत्मज्ञान हुआ है, सुख, दुःख, राजस, तामस, सात्त्विक गुण लिप्त नहीं करते। यद्यपि उनमें लोकदृष्टि में ये गुण दीखते हैं, पर वे अपने आत्मा में नहीं दीखते। जैसे समुद्र में अनेक तरङ्ग जलरूप होते हैं और शुद्ध मणि में नील, पीत आदिक प्रतिबिम्ब पड़ते हैं सो देखने भर को हैं, मणि को स्पर्श नहीं करते, वैसे ही जिस पुरुष के हृदय से वासना का मल दूर हुआ है, उसके शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले राजस, सात्त्विक और तामस गुणों के कार्य

३०२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

सुख-दुःख देखने भरके होते हैं, उसे स्पर्श नहीं करते । उसमें केवल मत्त समान पद का निश्चय होता है और उसको कोई सङ्ग स्पर्श ना करता । जैसे आकाश को धूल लेप नहीं होता, वैसे ही आत्मा व गुणों का सम्बन्ध नहीं होता । जो पुरुष ऐसा जानता है, उसको ज्ञानी कहते हैं ।

जब जीव निःस्पन्द होता है, तब आत्मा होता है और जब उस वासना का स्पन्दन होता है, तब वह संसारी होता है । जब चित्त जगता है, तब अनेक सृष्टि भासित होती है, और जब चित्त स्फुरण रहित होता है, तब संसार का अत्यन्ताभाव होता है और प्रध्वंसाभाव भी नहीं भासित होता है । तब संसार भी केवल आत्मरूप हो जाता है इससे हे राजन् ! वासना को त्यागकर चित्त को स्थित करो । वासना ही मल है । जब वासना का त्याग होगा, तब केवल आकाश की तरह अपने को स्वच्छ जानोगे ! आत्मा वाणी का विषय नहीं वह केवल आत्मत्वमात्र, अपने रूप में स्थित और सर्वदा उदयरूप है । विश्व भी आत्मा का चमत्कार है; कुछ भिन्न वस्तु नहीं । द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की त्रिपुटी अज्ञान से भासित होती है; आत्मा सर्वदा एकरूप और त्रिपुटी से रहित है । चित्त के स्फुरण से आत्मा ही त्रिपुटी रूप होकर स्थित हुआ है, इससे चित्त को स्थिर कर देखो कि आत्मा में भिन्न कुछ वस्तु नहीं । वासना के स्फुरण में संसार है, जब वह मिटती है, तब संसार भी मिट जाता है । उस वासना के स्फुरण की निवृत्ति लिए सात भूमिका कहता हूँ ।

जब प्रथम जिज्ञासु होता है, तब चाहता है कि संतजनों का संग कर ब्रह्मविद्या-शास्त्र को देखे और सुने—यह प्रथम भूमिका है । भूमि चित्त के ठहरने के स्थान को कहते हैं । फिर जब सत्संग और शास्त्र में बुद्धि बढ़ी, तब सन्तों और शास्त्रों के कहने को विचारना कि मैं कौन हूँ और संसार क्या है—यह दूसरी भूमिका है । उसके उपरान्त यह विचार- ना कि मैं आत्मा हूँ; संसार मिथ्या है और मुझमें कोई संसार नहीं बारम्बार ऐसी भावना करना तीसरी भूमिका है । जब आत्मभावना

  • निर्वाण प्रकरण * ३०३

दृढ़ता से आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सम्पूर्ण वासनाएँ मिट जाती हैं और जब स्वरूप मे नीचे के स्तर पर उतरकर देखता है, तब संसार भासित होता है, परन्तु उसे वह स्वप्न की नाईं जानता है—इसमें वासना नहीं उठती । ऐसा अवलोकन चौथी भूमिका है । जब अवलोकन होता है, तब आनन्द प्रकट होता है । ऐसे महाआनन्द का प्रकट होना और जब आनन्द प्रकट हो तब उसमें स्थिर होना पञ्चम भूमिका है । तुरीयापद छठी भूमिका है । चित्त की दृढ़ता का नाम तुरीयावस्था है । जब तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है, तब परम निर्वाण होता है—उसको सप्तम भूमिका कहते हैं । उस परम निर्वाणपद की जीवन्मुक्त को गति नहीं, क्योंकि तुरीयातीतपद को वाणी मे बता नहीं सकते ।

प्रथम तीन भूमिका जो कही हैं, वे जाग्रत् अवस्था हैं । उनमें मनुष्य श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है और संसार की सत्ता भी दूर नहीं होती । चतुर्थ भूमिका स्वप्नवत् है । उसमें संसार की सत्ता नहीं होती । पञ्चम भूमिका सुषुप्ति अवस्था है; क्योंकि उसमें जीव आनन्दघन में स्थित होता है । छठी भूमिका तुरीयपद है, जो जाग्रत्-स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों का साक्षी है । उसमें केवल ब्रह्म ही प्रकाश पाता है और चित्त निर्वाणपद में लय हो जाता है । तुरीयपद में जीवन्मुक्त लोग बिचरते हैं । सप्तम भूमिका तुरीयातीतपद है; वही परम-निर्वाणपद है । तुरीयावस्था में ब्रह्माकारवृत्ति रहती है । जब ब्रह्मा-कारवृत्ति भी लीन हो जाती है, जहाँ वाणी की गति नहीं, वहाँ चित्त नष्ट हो जाता है; तब वह केवल आत्मतत्त्वमात्र रह जाता है । उसमें अहंभाव नहीं होता । शान्त और परमनिर्वाण तेरा स्वरूप है और सब विश्व भी वही रूप है, कुछ भिन्न नहीं जैसे सुवर्ण ही भूषण है और सुवर्ण में भूषण कल्पित है । भूषण भी परिणाम मे होता है, पर आत्मा सदा अच्युतरूप है और कभी परिणाम को नहीं प्राप्त होता । वह केवल एक रस है । उसने चित्त के स्फुरण मे विश्व की कल्पना की है, इससे विकारसंयुक्त भासित होता है । हे राजन ! ऐसा आत्मा तुम्हारा

३०४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

स्वरूप है। उसमें स्थित होकर अपने प्रकृत आचार में निरहंकार होकर विचर। बल्कि अहंकार के त्याग का अभिमान भी त्यागकर केवल आत्मरूप हो रहो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमानिर्वाणवर्णनं नामाष्टनवतितमसर्गः ॥ ९८ ॥

मनु बोले, हे राजन् ! आदि-मध्य-अन्त में रहित अनाभास सर्व-चिदाकाश सत्ता ज्यों की त्यों स्थित है और आगे भी वही स्थित रहेगी। इसमें न ऊर्ध्व है, न अधः है, न तम है, न प्रकाश है और न कुछ उससे भिन्न है। वह सबकी सत्ता है, जो चिन्मात्र परम सार है। उसने आप ही संकल्प से चेतना की, तब जगत् हुआ। हे राजन् ! यह विश्व आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे जल में तरङ्ग, मिर्च में तीक्ष्णता, शक्कर में मधुरता, अग्नि में उष्णता, बर्फ में शीतलता, सूर्य में प्रकाश, आकाश में शून्यता और वायु में स्पन्दन है, वैसे ही आत्मा में जो विश्व है, वह आत्मस्वरूप ही है, आत्मा से भिन्न नहीं। हे राजन् ! जो सब आत्मस्वरूप ही है, तो शोक और मोह किसका करता है ? जैसे काष्ठ की पुतली यन्त्र के तागे से अनिच्छित चेष्टा करती है, वैसे ही नीतिरूप तागे से, अभिमान से रहित होकर, तू भी विचर और यह निश्चय रख कि न मैं कुछ करता हूँ, न कराता हूँ। किसी में रागद्वेष न कर। जैसे शिला पर जो मूर्ति लिखी होती है उसको न किसी का राग है और न द्वेष है, वैसे ही तू भी विचर। आत्मा से भिन्न कुछ न देख पड़े, ऐसा निरहंकार हो। चाहे व्यवहारी गृहस्थ हो चाहे संन्यासी, चाहे देहधारी हो चाहे देहत्यागी, चाहे विक्षेपी हो चाहे ध्यानी, तुझे कोई दुःख न होगा, तू ज्यों का त्यों ही रहेगा। वासना का होना ही संसार है और वासना से रहित होना मोक्ष है। जब वासना उठती है, तब संसारी होता है और जब वासना मिट जाती है, तब केवल आकाशरूप भासित होता है।

हे राजन् ! यह सब जगत् आत्मरूप है और आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जब सब आत्मा ही है, तब शोक और मोह किसका

निर्वाण प्रकरण३०५

कीजिये। हे राजन्! आत्मा सर्वदा एकरस है और विश्व आत्मा का चमत्कार है। जन्म-मरण आदि नाना विकार आत्मा के अज्ञान में प्रतीत होते हैं। जब आत्मा का ज्ञान होगा, तब आत्मरूप ही एकरस भासित होगा और विषमता कुछ न रहेगी। संवेदन में आकार दीखते हैं। अहंकार और वासना के सम्बन्ध को संवेदन कहते हैं। अहंकार और चित्त, दोनों पर्यायवाची हैं। हे राजन्! इसका अहंकार के साथ होना ही दुःखदायी है। केवल चिन्मात्र में अहंभाव मिथ्या है। जब तक संवेदन दृश्य की ओर उठता है, तब तक दृश्य का अन्त नहीं आता और नाना प्रकार के विकार भासित होते हैं। पर जब संवेदन आत्मा अधिष्ठान की ओर आता है, तब आत्मा शुद्ध अपना रूप होकर भासित होता है।

संवेदन भी आत्मा का कल्पित आभास है। आभास के आश्रय में विश्व कल्पित हुआ है। फुरने में भी और न फुरने में भी आत्मा ज्यों का त्यों है। परन्तु फुरने में विषमता भासित होती है, और न फुरने में ज्यों की त्यों आत्मा भासित होता है। जैसे रश्मी के अज्ञान में सर्प दीखता है, जब रश्मी का ज्ञान होता है, तब सर्प की सत्यता जाती रहती है और रश्मी ज्यों की त्यों जान पड़ती है, पर सर्प जान पड़ने के काल में भी रश्मी ज्यों की त्यों ही थी, उसमें कुछ नहीं हुआ था—जानने न जानने में एक समान ही थी, वैसे ही आत्मा स्फुरण के समय में जगतरूप में दीखता है और स्फुरण के निवृत्त होने पर आत्मा ही भासित होता है, पर आत्मा दोनों कालों में एक समान है। जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से भिन्न नहीं और अग्नि में उष्णता भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में विश्व भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप ही है।

हे राजन्! अहंकार को त्याग करके अपने सत्ता-महान स्वरूप में स्थित हो, तब तेरे सब दुःख निवृत्त हो जावेंगे। एक कवच तुझको बनाता हूँ, उसको धारण करके विचर तो तुझ पर अनेक शस्त्रों की वर्षा होने पर भी तुझे दुःख न होगा। तू जो कुछ देखता-सुनता है, उसे सब ब्रह्म जान और बारम्बार यही भावना कर कि ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं।

३०६ ❇ योगवासिष्ठ ❇

जब ऐसी भावना दृढ़ करेगा, तब कोई शस्त्र तुझे काट न सकेगा। यह ब्रह्मभावना ही कवच है। जब इसको तू धारण करेगा, तब सुखी होगा।

इतना कह वाल्मीकिजी बोले कि जब वशिष्ठजी ने रामजी को मनु और इक्ष्वाकु का संवाद सुनाया, तब सायंकाल में सूर्य अस्त हुआ और सारी सभा और वशिष्ठजी भी स्नान को उठे। फिर सूर्य की किरणों के निकलते ही सब आ पहुँचे।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मोक्षरूपवर्णनं नाम नवनवतितमसर्गः ॥ ६६ ॥

मनु बोले, हे राजन! जिसका कारण ही मिथ्या है, उसका कार्य कैसे सत हो? यह आभास जो संवेदन है, वही विश्व का कारण है। जब आभास ही मिथ्या है, तब विश्व कैसे सत्य हो और जब विश्व ही असत है, तब भय और शोक किसका करना है? हे राजन! न कोई जन्मता है, न मरता है, न सुख है, न दुःख है, आत्मा ज्यों का त्यों स्थित है। उर्मा में संवेदन ने विश्व की कल्पना की है। इसमें संवेदन का त्याग कर कि 'न मैं हूँ, न यह है'। जब तुझे ऐसा दृढ़ निश्चय होगा, तब आत्मा ही शेष रहेगा और अहंकार निवृत्त हो जावेगा; क्योंकि आत्मा के अज्ञान में वह होता और आत्मज्ञान से ही नष्ट हो जाता है। हे राजन! जो वस्तु भ्रम सिद्ध हो और सत दिखे, उसको प्रथम विचारिये। जो विचार किये से रहे तो उसे सत्य और आत्मा जानिये; और जो विचार किये में नष्ट हो जावे तो उसको अनात्मा तथा मिथ्या जानिये। जैसे हीरा श्वेत होता है और बर्फ का कण भी श्वेत होता है, एक समान दोनों भासित होते हैं, पर उनकी परीक्षा के लिये सूर्य के सम्मुख दोनों को रखिये तो जो धूप में गल जाय उसे झूठा जानिये और जो ज्यों का त्यों रहे उसको सत जानिये, वैसे ही विचाररूपी सूर्य के सम्मुख करिये तो अहंकार बर्फ की नाईं नष्ट हो जाता है, क्योंकि जो अहंकार अनात्म अभिमान में होता है, वह तुच्छ है—सर्वव्यापी नहीं।

जीव इन्द्रियों की क्रिया जो अपने में मानता है और परमधर्म की

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३०७

अपने में कल्पना करता है, वह भी तुच्छ है। वह अपने को आत्मा से भिन्न जानता है और पदार्थों को अपने से भिन्न जानता है, इस कारण विचार करने पर वरफ के हीरे की नाईं मिथ्या हो जाता है, अतः अविचार में सिद्ध है, विचार करने में नष्ट हो जाता है। पर आत्मा सब का साक्षी ज्यों का त्यों रहता है। वह अहंकार और इन्द्रियों का भी साक्षी और सर्वव्यापी है। हे राजन्! जो सत् वस्तु है, उसकी भावना कर और सम्यक्दर्शी बन। सम्यक्दर्शी को कोई दुःख नहीं होता। जैसे मार्ग में पड़ी रस्सी को रस्सी जानिये तो कोई भय नहीं और सर्प जानिये तो भय होता है। इससे सम्यक्दर्शी हो—असम्यक्दर्शी मत बन। हे राजन्! जो कुछ दृश्य पदार्थ हैं, वे सुखदायी नहीं, दुःखदायी ही हैं। जबतक इनका संयोग है, तबतक सुख जान पड़ता है, पर जब उनका वियोग होता है तब दुःख मिलता है। इससे तू उदासीन हो; किसी दृश्य पदार्थ को सुखदायी न जान और दुःखदायी भी न जान। सुख और दुःख दोनों मिथ्या हैं। इनमें आस्था मत कर अहंकार से रहित जो तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो। जब अहंकार नष्ट होगा, तब अपने को जन्म-मरण विकारों से रहित आत्मा जानेगा कि मैं निरहंकार ब्रह्म चिन्मात्र हूँ। ऐसे अहंभाव से रहित होने पर अपना होना भी न रहेगा; केवल चिन्मात्र, आनन्द और राग-द्वेष के क्षोभ से रहित शान्त रूप होगा। जब अपने का ऐसा जाना, तब सोच किसका करेगा?

हे राजन्! इस दृश्य का त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो और इस मेरे उपदेश को विचार कि मैं सत्य कहता हूँ, अथवा असत्य। जो विचार में संसार सत्य हो संसार की भावना कर और जो आत्मा सत्य हो तो आत्मा की भावना कर। हे राजन्! सम्यक्दर्शी होकर सत् को सत् और असत् को असत् जान। जो असम्यक्दर्शी हैं, वे सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मानते हैं। यथार्थ न जानने से असत वस्तु स्थिर नहीं रहती, परन्तु अज्ञानी दुःख पाता है। जैसे कोई पुरुष एक कुटी रचकर सोचने लगे कि मैंने आकाश की रक्षा की है और फिर जब कुटी नष्ट हो तब शोक करे कि आकाश नष्ट हो गया, क्योंकि

३०८

❇ योगवाशिष्ठ ❇

वह आकाश को कुटी के आश्रय जानता था, वैसे ही अज्ञानी पुरुष आत्मा को देह के आश्रय जानकर देह के नष्ट होने पर आत्मा का नाश मानता और दुःखी होता है। जैसे सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं, भूषणों के नष्ट होने पर मूर्ख सुवर्ण को नष्ट मानता है; वैसे ही देह के नष्ट होने पर अज्ञानी अपने को नष्ट जानता है। पर जिसको सुवर्ण का ज्ञान है, वह भूषणों के रहते भी सुवर्ण को देखता है और भूषण संज्ञा कल्पित जानता है। अतः ज्ञानवान् आत्मा को अविनाशी और देह तथा इन्द्रियों को असत् जानता है।

हे राजन् ! तू देह और इन्द्रियों के अभिमान से रहित हो। जब अभिमान से रहित इन्द्रियों की चेष्टा करेगा, तब शुभ अशुभ कर्म तुझे बाँध न सकेंगे; और जो अभिमान सहित कर्म करेगा तो शुभ अशुभ फल को भोगेगा। हे राजन् ! जो मूर्ख अज्ञानी हैं, वे ऐसे कर्मों का आरम्भ करते हैं, जिनका कल्पपर्यन्त नाश न हो। वे देह-इन्द्रियों के अभिमान का प्रतिबिम्ब आपमें मानते हैं कि मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ; इससे अनेक जन्म पाते हैं, क्योंकि उनके कर्मों का नाश कभी नहीं होता और जो तत्त्ववेत्ता ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे अपने को देह और इन्द्रियों के गुणों से रहित जानते हैं और उनके संचित और क्रियमाण कर्म नष्ट हो जाते हैं। संचित कर्म वृक्ष की तरह हैं और क्रियमाण फूल-फल की तरह। जैसे रुई को लपेटकर अग्नि लगाने में वृक्ष, फूल, फल सब तृणवत् जलते हैं, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि में संचित और क्रियमाण कर्म जल जाते हैं।

इससे हे राजन् ! जो कुछ चेष्टा तू वासना से रहित होकर करेगा, उसमें कोई बन्धन नहीं। जैसे बालक के अङ्ग स्वाभाविक ही भली-बुरी प्रकार हिलते हैं, उसके हृदय में अभिमान नहीं उठता, इससे उसको बन्धन नहीं; वैसे ही तू भी इच्छा से रहित होकर चेष्टा कर तो तुझे कोई बन्धन न होगा। यद्यपि सब चेष्टा तुझमें तब भी दिखेंगी तो भी वासना से रहित होगा, फिर जन्म न पावेगा। जैसे भुना बीज देखने भर को होता है और उगता नहीं, वैसे ही तुझमें सब क्रिया

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३०६

देख पड़ेंगी, परन्तु जन्म का कारण न होंगी, अर्थात् पुण्यक्रिया का फल सुख न भोगेगा और पापक्रिया मे दुःख न पावेगा, किन्तु पाप-पुण्य का स्पर्श न होगा। जैसे जल में कमल स्थित होता है और उसको जल स्पर्श नहीं करता, वैसे ही पाप-पुण्य का स्पर्श तुझको न होगा। इस-लिए अहं अभिलाषा से रहित होकर जो कुछ अपना प्राकृतिक आचार है, सो कर। हे राजन् ! जैसे आकाश में जल से पूर्ण मेघ दिखते हैं, परन्तु आकाश को लिप्त नहीं करते, वैसे ही तुझको कोई कर्म बन्धन न करेगा। जैसे विष के न जाननेवाले को विष नहीं मार सकता, वैसे ही ज्ञानी को कर्म नहीं बाँध सकता।

ज्ञानवान् कर्म करके भी अपने को अकर्ता जानता है, पर अज्ञानी न करने में भी अभिमान से कर्ता होता है। जो देह और इन्द्रियों में कर्ता है और उसके अभिमान से रहित है, वह अकर्ता है। जो पुरुष इन्द्रियों का संयम करता है, पर मन में विषय के भोग की तृष्णा रखता है, जिसका अन्तःकरण राग-द्वेष से मूढ़ है और बड़े-बड़े कर्मों को करता और दुःखी होता है, वह मिथ्याचारी है। जो पुरुष हृदय में राग-द्वेष से रहित है, पर कर्म इन्द्रियों से चेष्टा करता है, वह विशेष ज्ञानी है, अपनी जान कुछ नहीं करता। वह मोक्ष पाता है। हे राजन् ! अज्ञानरूप वासना से रहित होकर विचर। जो ऐसे होकर विचरेगा सो अपने को ज्यों का त्यों आत्मा जानेगा। अपने को सदा उदयरूप, सबका प्रकाशक जानेगा और जन्म-मरण-बन्धन मुक्ति-विकार से रहित ज्यों का त्यों आत्मा भासित होगा।

हे राजन् ! उस पद को पाकर तू शांति पावेगा। अन्य सब कला विशेष अभ्यास बिना नष्ट होती हैं। जैसे रस बिना वृक्ष चाहे फैलने-वाला हो तो भी उगता नहीं। ज्ञानकला अभ्यास के बिना नहीं उपजती और उपजकर फिर नष्ट नहीं होती। जैसे धान बोते हैं तो वे दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगते हैं, वैसे ही ज्ञानकला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है। हे राजन् ! ज्ञान उपजने से जीव ऐसे जानता है कि मैं न मरता हूँ, न जन्मता हूँ; निरहंकार, निष्किंचनरूप, सबका प्रकाशक, अजर

३१० ✺ योगवाशिष्ठ ✺

और अमर हूँ। हे राजन! ऐसी ज्ञानकला पाकर जीव मोह को नहीं प्राप्त होता। जैसे दूध मे दही बनकर वह फिर दूध नहीं होता और जैसे दूध को मथकर घृत निकालो तो फिर घृत नहीं मिलता, वैसे ही जिसकी ज्ञानकला उदय हुई है, उसे फिर मोह नहीं स्पर्श करता। हे राजन! अपने स्वरूप में स्थित होकर और को त्याग करने का नाम पुरुषप्रयत्न है। जिस पुरुष को आत्मा की भावना हुई है, वह संसार-समुद्र से पार हुआ है। पर जिसको संसार की भावना है, वह संसारी जरा और मृत्यु के दुख पाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थोपदेशो नाम शततमसर्गः ॥ १०० ॥

मनु बोले, हे राजन! बड़ा आश्चर्य है कि शुद्ध चिन्मात्र आत्मा में माया से नाना प्रकार के देह, इन्द्रियाँ और दृश्य भासित हुए हैं। हे राजन! दृश्य का कारण अज्ञान है। जिस आत्मा के मोहावरण अज्ञान में दृश्यरूप भासित होता है, उसी के ज्ञान से वह अज्ञान लीन हो जाता है। इस कारण इस संवेदन को त्यागकर आत्मा की भावना कर। यह में हूँ, ये मेरे हैं, ये संकल्प मिथ्या ही उठते हैं। हे राजन! प्रथम कारणरूप में एक जीव उपजा, फिर उस आदि-जीव से अनेक जीवगण हुए। जैसे अग्नि से चिनगारी निकलती है, वैसे ही उससे अनेक रूप धरे हैं। कोई गन्धर्व, कोई विद्याधर, कोई मनुष्य, कोई राक्षस इत्यादिक हुए हैं। फिर जैसे संकल्प होते गये हैं, वैसे ही रूप होते गये। वास्तव में जैसे जल में तरङ्ग स्वरूप के प्रमाद से अनेक भाव को प्राप्त होते हैं, वैसे ही अपने संकल्प अपने ही को बन्धन होते गये हैं। इससे संकल्प नानात्व की कल्पना मिथ्या है। हे राजन! इस भावना को त्यागकर आत्मपद को प्राप्त हो। आत्मा अनन्त है। यह विश्व भान और प्रकार का होता है। जैसे समुद्र सम है, पर उसमें जो कई आवर्त-तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं, सो जल से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अनेक प्रकार का विश्व जो दिखता है सो आत्मा से भिन्न नहीं, आत्म-स्वरूप ही है। इससे आत्मा की भावना कर। कहीं ब्रह्म सत् संकल्प

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३११

होकर स्फुरित होता है तो जानता है कि मैं ब्रह्म, शुद्धरूप और सदा मुक्तरूप हूँ और इस संसारसमुद्र से पार हो गया हूँ। जहाँ चेतनाशक्ति है, वहाँ अपने को जीता मानता है और दुःखी भी जानता है। अन्तः-करण से मिलकर भोग की भावना करना और सदा विषय की तृष्णा करना जीवात्मा का लक्षण है। जहाँ वासना क्षय हुई और शुद्ध आत्मा प्रत्यक्ष हुआ, वहाँ जीवसंज्ञा नष्ट हो जाती है और केवल शुद्ध आत्मा प्रकाश पाता है।

हे राजन्! चेतन जब अन्तःकरण से मिलकर बहिर्मुख होता है, तब संसारी होकर जग-भरण में दुःखी होता है। और जब चेतनाशक्ति अन्तर्मुख होती है; तब जन्म-मरण की भावना को त्यागकर स्वरूप की भावना करता है, जिससे सब दुःखों की निवृत्ति होती है। जब इसकी भावना स्वरूप की ओर लगती है, तब कोई दुःख नहीं रहता और जब इसे स्वरूप का प्रमाद होता है, तब यह दुःख पाता है। स्वरूप के ज्ञान में आनन्दरूप मुक्त होता है। हे राजन्! तू संसाररूपी कूप की गगरी न हो। जब गगरी रस्सी से बँधती है तो कभी ऊपर को जाती है और कभी नीचे। पर जब रस्सी टूट जाती है, तब न ऊपर को जाती है और न नीचे को। कूप क्या है, नीचे क्या है और ऊपर क्या है, यह भी सुन। हे राजन्! यह संसार ही कूप है; स्वर्गलोक ऊपर है और नरक नीचे है। जीव पुण्यकर्म से स्वर्ग को और पापकर्म से नरक को जाता है। इसी प्रकार आशारूपी रस्सी से बँधा हुआ जीव जन्ममरणरूपी चक्र में फिरता है। स्वर्ग और नरक में फिरने का कारण आशा है। जब आशा निवृत्त होती है, तब न कोई नरक है न स्वर्ग। जब तक देह में अभिमान है, तब तक नीच से नीच गति को प्राप्त होता है। जैसे पत्थर की शिला समुद्र में डालो तो नीचे से नीचे चली जाती है, वैसे ही नीच स्थानों को देखकर देहाभिमानी नीचे को चला जाता। जब इन्द्रियाँ-दिक का अभिमान त्याग करता है, तब जैसे क्षीरसमुद्र से निकलकर चन्द्रमा नीचे से ऊपर को चला गया है, वैसे ही ऊपर को जाता है।

हे राजन्! यदि आत्मा की भावना करेगा तो आत्मा ही होगा।

३६२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

इससे आशारूपी फाँसी को तोड़कर शान्तपद को प्राप्त हो। आत्मा चिन्तामणि की तरह है। जैसी भावना कीजिये, वैसी ही सिद्धि होती है। यदि तू आत्मभावना करेगा तो सम्पूर्ण विश्व अपने में देखेगा। जैसे पर्वत शिला और पत्थर को अपने में देखता है, वैसे ही तू भी सब को आत्मा जानेगा। हे राजन ! जो कुछ दृश्य है सो सर्वात्मा के आश्रय है। शास्त्र और शास्त्रदृष्टि सब आत्मा के आश्रय है। राजा भी आत्मा के आश्रय है। वह सर्वसत्य आत्मा चिन्तामणि कल्पवृक्ष है। जैसी कोई भावना करता है, वैसी सिद्धि होती है। हे राजन ! स्फुरण में यह सब दृश्य सत्य है। जब स्फुरण नष्ट होता है, तब न कोई शास्त्र है और न कोई दृष्टि। तब केवल अद्वैत आत्मा है; तब निषेध किसका कीजिये और अङ्गीकार किसको करिये ? जो पुरुष अहंकार से रहित हुआ है वह सर्वशास्त्र-दृष्टि पर विराजता है और सर्व आत्मा होता है। जल उर्मी को जल कहते हैं और कालवादी उर्मी को काल कहते हैं। सब का आश्रय आत्मा है। जो पुरुष देहाभिमानी है, वही मूर्ख है और स्वरूप के अज्ञान से नीचे और ऊपर के लोकों में आना जाना रहता है; पशु, पक्षी आदि की स्थावर-जङ्गम योनियाँ पाता है और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ दुःख को प्राप्त होता है। जो पुरुष सम्यक्दर्शी है और जिसकी शुद्ध चेष्टा है, उसको कोई विकार नहीं देख पड़ता—वह आकाश की तरह सदा निर्मल निर्लेप भासित होता है। उसको सम्पूर्ण विश्व आत्मस्वरूप दिखता है। जो चेष्टा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रादिक करते हैं उसका कर्त्ता भी वह अपने को जानता है। उसके सब दुःखों का अन्त होता है, वह आत्मपद को प्राप्त होता है। उसको सब सुखों की सीमा प्राप्त होती है।

हे राजन ! जैसे नदी जब तक चलती है तब तक समुद्र को नहीं पाती; जब समुद्र को पहुँच जाती है, तब नहीं चलती, वैसे ही जब तू आत्मपद को प्राप्त होगा, तब कोई इच्छा तुझे न रहेगी। हे राजन ! तू अहंकार का त्याग कर अथवा ऐसा जान कि सब में ही हूँ। जगत्भ्रम आदिक दुःख तब तक हैं, जब तक आत्मबोध नहीं होता। जब

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३१३

आत्मबोध होता है, तब कोई दुःख नहीं रहता। दोनों ही दुःख भारी हैं, पर ज्ञानी को इन्द्र के वज्रसमान दुःख भी स्पर्श नहीं करता। हे राजन्! जैसे पेड़ से सूखकर फल गिरता है, उसी प्रकार जब ज्ञानरूपी फल प्राप्त होता है, तब मन, बुद्धि, अहंकार पेड़ की तरह गिर पड़ते हैं। जब तक मन की चपलता है, तब तक दुःख पाता है। जब मन की चपलता निवृत्त होती है तब कोई क्षोभ नहीं रहता और शान्तपद को प्राप्त होता है। शान्ति तब होती है, जब प्रकृति का वियोग होता है। प्रकृति के संयोग से संसारी होता है और दुःख पाता है। इससे प्रकृति को त्याग दे अर्थात् अहंकार से रहित होकर चेष्टा कर।

जब तू अहंकार से रहित होगा, तब उस पद को प्राप्त होगा, जो न जड़ है, न चेतन है, न शून्य है, न अशून्य है, न केवल है; न अकेवल है। उसे न आत्मा कह सकते हैं, न अनात्मा। वह न एक है, न दो। जो कुछ नाम हैं सो प्रतियोगी से मिले हुए हैं। प्रतियोगी होकर द्वैत होता है, पर आत्मा अद्वैत है। जिसमें वाणी की गति नहीं, जो अनिर्वचनीयपद है उसको वाणी से कैसे कहिये ? जितनी नाम-संज्ञा है सो उपदेशमात्र है आत्मा अनिर्वाच्य पद है इसमें संकल्प का त्याग करके आत्मा की भावना कर। जब तू आत्मभावना करेगा, तब केवल आत्मा ही प्रकाशित होगा। जैसे फूल का कोई अङ्ग सुगन्ध से रहित नहीं होता, वैसे ही आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। हे राजन्! जब अहंकार का त्याग करेगा, तब अपने आप शोभायमान होगा और आकाश की तरह निर्मल आत्मा में स्थित होगा। अहंकार को त्यागकर उस पद को प्राप्त होगा, जहाँ शास्त्र और शास्त्रों के अर्थ नहीं पहुँचते, जहाँ सम्पूर्ण इन्द्रियों के रस लीन हो जाते हैं और सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। तब केवल मोक्षपद को प्राप्त होगा। हे राजन्! मोक्ष किसी देश में नहीं कि वहाँ जाकर पावे; न किसी काल में ही है कि अमुक काल आवेगा तब मुक्त होगा; और मोक्ष न कोई पदार्थ ही है कि उसको ग्रहण करेगा। केवल अहंकार के त्याग से मोक्ष होता है। जब तू अहंकार का त्याग करेगा, तभी मोक्ष है। जब

३१४ * योगवाशिष्ठ *

तू इस अनात्म अभिमान को त्यागेगा, तब अपने आप शोभायमान होगा। जैसे धुवाँ बिना अग्नि प्रकाशमान होती है, वैसे ही अहंकार बिना तू प्रकाशित होगा। जैसे बड़े पर्वत पर निर्मल और गम्भीर तालाब सोहता है, वैसे ही तू मोहेगा। हे राजन्! तू अपने स्वरूप में स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे समाधनवर्णनं नामैकाधिकशततमस्सर्गः ॥ १०१ ॥

मनु बोले, हे राजन्! तू शुद्ध और रागद्वेष से रहित आत्माराम नित्य अन्तर्मुख रह। जब तू आत्माराम होगा, तब तेरी व्याकुलता नष्ट हो जायगी और तू शीतल चन्द्रमा सा पूर्ण हो जायगा। ऐसा होकर अपने प्रकृत आचार में विचर और किसी फल की वाञ्छा न कर। जो पुरुष वाञ्छा से रहित होकर कर्म करता है, वह सदा अकर्ता है और महा शोभा पाता है। ऐसी अवस्था में स्थित होकर जो भोजन आवे उसको खा ले और जो अनिच्छित वस्त्र आवे उसको पहन ले। जहाँ नींद आवे, वहाँ सो रह। रागद्वेष से रहित हो। जब तू ऐसा होगा, तब शास्त्र और शास्त्रों के अर्थ का उल्लंघन कर लौकिक व्यवहार करेगा। जो ऐसा पुरुष है, वह परम रस को पाकर मतवाला होता है। उसको संसार की कुछ इच्छा नहीं रहती। हे राजन्! ज्ञानवान् चाहे काशी में देह त्याग अथवा चाण्डाल के गृह में, वह सदा मुक्त है। वह सदा आत्मारूप में स्थित है। वर्तमानकाल में वह देह को नहीं त्यागता; क्योंकि जिस काल में उसको ज्ञान हुआ, उसी काल में देह का अभाव हुआ—ज्ञान से देह की बाधा हट जाती है। हे राजन्! ज्ञानवान् सदा मुक्तरूप है। वह न किसी की स्तुति करता है और न निन्दा; क्योंकि उसके चित्त की कल्पना मिट गई है। यद्यपि रागद्वेष ज्ञानवान् में भी देख पड़ते हैं और वह हँसता-रोता भी देख पड़ता है, पर उसके अन्तर में न राग है न द्वेष। वास्तव में वह न हँसता है, न रोता है—ज्यों का त्यों है। जैसे आकाश शून्यरूप है और उसमें बादल भी देख पड़ते हैं, परन्तु आकाश को वे लिप्त नहीं करते, वैसे ही ज्ञानवान् को

ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ३२५

कर्म बन्धन नहीं करता। पर अज्ञानी जानते हैं कि ज्ञानवान को क्रिया बन्धन करते हैं।

हे राजन् ! ज्ञानवान् सर्वदा नमस्कार करने और पूजने योग्य है। जिस स्थान में ज्ञानवान बैठता है, उस स्थान को भी नमस्कार है। जिससे बोलता है उस जिह्वा को भी नमस्कार है। जिस पर ज्ञानवान् दृष्टि डालता है, उसको भी नमस्कार है। वह सबका आश्रय है। हे राजन् ! जैसा ज्ञानवान् की दृष्टि से आनन्द मिलता है, वैसा आनन्द तप, दान और यज्ञ आदि कर्मों में नहीं मिलता। ऐसी दृष्टि और किसी की नहीं होती, जैसी सन्त की दृष्टि है। वह ऐसे आनन्द को पाता है, जिसमें वाणी की गति नहीं। जो पुरुष सन्त की दृष्टि को पाकर सुखी होता है, उससे लोग दुःख नहीं पाते और लोगों से वह दुखी नहीं होता। वह न किसी का भय करता है; न किसी का हर्ष करता है। हे राजन् ! सिद्धि पाने का सुख अल्प है; क्योंकि उड़ने की सिद्धि पाई तो अनेक पक्षी उड़ते फिरते हैं; इससे आत्मज्ञान तो नहीं मिलता और आत्मज्ञान बिना शान्ति नहीं होती। जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब जरा, मृत्यु आदि दुःख से मुक्त होता है और कोई दुःख नहीं रहता। जैसे पिंजड़े से छूटा सिंह फिर पिंजड़े के बन्धन में नहीं पड़ता, वैसे ही वह पुरुष अज्ञानरूपी पिंजड़े में नहीं फँसता।

हे राजन् ! इससे तू आत्मा की भावना कर, जिससे तेरे दुःख नष्ट हो जावें। अज्ञान से तुझे दुःख दिखते हैं-अज्ञान से रहित सदा आनन्द-रूप है। इससे अनुभवरूप आत्मा में स्थित हो। जब तू आत्मा में स्थित होगा तब जैसे शुद्धमणि के निकट श्वेत, रक्त, पीत, श्याम आदि रंग रखिये तो वह उनके प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, पर कोई रंग उसे स्पर्श नहीं करता वे कल्पित से भासित होते हैं, वैसे ही तू प्रकृत आचार को अङ्गीकार करता रहेगा, पर तुझे पाप-पुण्य का स्पर्श न होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मनुइक्ष्वाकुसंवादसमाप्तिर्नाम द्व्यधिकशततमसर्गः ॥ १०२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार उपदेश करके जब मनु चुप हो