सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ २८७

शास्त्र के उपदेश हुए हैं, जो आत्मा को जगा देते हैं । जब भली प्रकार- रश्मी की तरह- आत्मा को जाना, तब सर्प के सदृश जो परिच्छिन्न अहंकार है, वह नष्ट हो जाता है । जैसे नेत्र का मल जब अञ्जन के लगाने में नष्ट हो जाता है, तब नेत्र ज्यों के त्यों निर्मल होते हैं, वैसे ही अज्ञानरूपी मैल गुरु और शास्त्र के उपदेशरूपी सुरमे से नष्ट हो जाता है । वास्तव में न कोई अहंकार है और न शास्त्र है; क्योंकि आत्मा सर्वदा सब समय उदयरूप है । परन्तु तो भी गुरु और शास्त्र से जाना जाता है ।

हे राम ! ज्ञानवान् के साथ चारों अन्तःकरण और इन्द्रियाँ भी देख पड़ती हैं, पर उनमें सत्यता नहीं होती । जैसे भुना हुआ बीज दिखाई देता है, पर उगने की सत्यता नहीं रखता, जैसे जला वस्त्र देखनेमात्र को है, पर उसमें सत्यता कुछ नहीं होती; वैसे ही ज्ञानवान को अभि- लाषारूप अहंकार नहीं होता और उससे वह कष्ट नहीं पाता । जैसे सूर्य की किरणों से मरुस्थल में जलाभास होता है और उसको देखकर पीने के लिए मृग दौड़ता और दुःखी होता है, वैसे ही दृश्यरूपी मरुस्थल में पदार्थरूपी जलाभास को देखकर अज्ञानरूपी मृग दौड़ते हैं और दुःख पाते हैं । जब ज्ञानरूपी वर्षा से आत्मरूपी जल चढ़ा, तब चित्तरूपी मृग कहाँ दौड़े ? जब ज्ञानरूपी वर्षा होती है और अनुभवरूपी जल चढ़ता है, तब चित्तरूपी मृग में यहरूपी जो स्फुरण था, वह नष्ट हो जाता है । हे राम ! अहंकार अविचार से सिद्ध है और विचार से क्षीण हो जाता है । जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों से क्षीण होती है और जब अधिक तेज होता है तब जलरूप हो जाती है, बर्फ की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही अहंकाररूपी बर्फ विचाररूपी किरणों से क्षीण हो जाती है । जब दृढ़ विचार होता है, तब अहंकार-संज्ञा नष्ट हो जाती है और केवल आत्मा ही रहती है । राम ने पूछा; हे सर्वतत्त्वज्ञ भगवन् ! जिनका अहंकार नष्ट होता है, उनका लक्षण क्या है, सो कहिये ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानरूपी गढ़ा संसार है, उसमें पदार्थ की सत् भावना से वह नहीं गिरता, जिसका अहंकार नष्ट हो जाता है । जैसे समुद्र में नदियाँ स्वाभाविक रूप से आकर मिलती हैं, वैसे ही

२८८

# * योगवाशिष्ठ *

उसको क्षमा, शान्ति आदिक शुभगुण स्वाभाविकरूप से प्राप्त होते हैं। उसका क्रोध भी नष्ट हो जाता है और देखनेमात्र यदि भासता भी है तो अर्थकार नहीं होता; विषमता करके भिन्न भावना हृदय में नहीं स्फुरती और केवल सत्तासमान में स्थित होता है। जैसे शरदकाल का मेघ गर्जता है; पर वर्षा से रहित होता है वैसे ही इन्द्रियों की चेष्टा वह अभिमान से रहित होकर करता है। जैसे वर्षाऋतु के जाने से कुदिग नहीं रहता, वैसे ही उसकी अभिमान चेष्टा नष्ट हो जाती है और लोभ भी मन से जाता रहता है। जैसे वन में अग्नि लगती है तो मृग और पक्षी उस वन को त्याग जाते हैं, वैसे ही लोभरूपी मृग उसको त्याग जाते हैं और उसके मन में कोई कामना नहीं रहती। जैसे दिन में उल्लूक और पिशाच नहीं विचरते, वैसे ही जहाँ ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है वहाँ सम्पूर्ण कामनारूपी तम नष्ट हो जाता है और शान्तरूप आत्मा में स्थित रहता है। जैसे मजदूर दो पोटों को ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप में उठाता है और गर्मी से थकता है तो उसको डालके वृक्ष के नीचे सुख में स्थित होता है, वैसे ही वासनारूपी पोट है और अज्ञानरूपी धूप है उसमें दुःखी होता है; पर ज्ञानरूपी यत्न करके वासनारूपी पोट को डाल कर सुख में स्थित होता है।

हे रामजी! उस पुरुष की भोगवासना नष्ट हो जाती है और फिर उसे दुःख नहीं देती। जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भागता है और फिर निकट नहीं आता, वैसे ही ज्ञानरूपी गरुड़ को देखकर भोगरूपी सर्प भागते हैं और फिर निकट नहीं आते। आत्मपद को पाकर ज्ञानी शान्तिरूपी दीपकवत् प्रकाशवान् होता है और भाव-अभाव पदार्थ उसको स्पर्श नहीं करते और संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है। ज्ञान समझनेमात्र है, कुछ यत्न नहीं। सन्तों के पास जाकर प्रश्न करना कि मैं कौन हूँ? जगत् क्या है? परमात्मा क्या है? भोग क्या है? और इनसे मुक्त होकर कैसे परमपद को प्राप्त होऊँ। फिर जो ज्ञानवान् उपदेश करे, उसके अभ्यास से आत्मपद को प्राप्त होगा, अन्यथा न होगा।

इति श्री० नि० सन्तलक्षण माहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्णवतितमस्सर्गः ॥४४॥

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २८६

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिस प्रकार तुम्हारे पूर्वज इक्ष्वाकुनामक बड़े राजा जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं, वैसे ही तुम भी विचरोगे; क्योंकि तुम भी उसी कुल में उपजे हो। हे राम! वह सब राजाओं में श्रेष्ठ सूर्यवंशी इक्ष्वाकु राजा मनु का पुत्र और सूर्य का पौत्र था। जैसे पितरों का राजा धर्म है। उसका स्वभाव शीतल था। जैसे सूर्य को देखकर मणि में तेज प्रकट होता है, वैसे ही उसको देखकर शत्रु संतप्त होते थे। पर साधु, मित्र और प्रजा को वह रमणीय लगता था और वे सब उसको देखकर शान्ति पाते थे। जैसे चन्द्रमा को देखकर चन्द्रमुखी कुमुद प्रसन्न होते हैं, वैसे ही उसको देखकर सब प्रसन्न होते थे। वह पापरूपी वृक्षों का काटनेवाला कुल्हाड़ा और मित्रों को सुखदायक था—जैसे मोरों को मेघ सुखदायक होता है। सुन्दर वह ऐसा था कि उसको देख-कर उसके पास लक्ष्मी स्थिर हो रही थी। उसके यश से सम्पूर्ण पृथ्वी भर रही थी। वह राजा भली प्रकार प्रजा का पालन करता था। एक समय उसके मन में विचार उपजा कि संसार में जग, मरण आदि बड़े कष्ट हैं। इस संसार-दुःख के तरने का क्या उपाय है।

ऐसे वह विचार रहा था कि इतने में शम्भु मुनि ब्रह्मलोक से आये। उसने उनका भली प्रकार पूजन करके पूछा, हे भगवन्! आपकी कृपा का प्रताप मेरे हृदय में बैठकर प्रश्न करने को प्रेरित करता है, इससे मैं प्रश्न करता हूँ। हे भगवन्! मेरे हृदय में संसार बलता है और जैसे समुद्र को बड़वाग्नि जलाती है, वैसे ही मुझको जलाता है। इससे आप वही उपाय कहिये, जिससे मुझको शान्ति हो। हे भगवन्! यह संसार कहाँ से उपजा; दृश्य का स्वरूप क्या है और वह कैसे निवृत्त होता है? जैसे जाल से पक्षी निकल जाता है, वैसे ही जन्म, मरणरूप संसार महाजाल से मैं निकलना चाहता हूँ। जैसे वरुण समुद्र के सब स्थान जानता है, वैसे ही तुम जगत् के सब व्यवहारों को जानते हो और संशय के निवृत्त करनेवाले हो। अज्ञानरूपी तम के नाशकर्ता तुम सूर्य हो; तुम्हारे अमृतरूपी वचनों से मैं शान्ति को प्राप्त हूँगा। मुनि बोले हे साधो! मैं चिरकाल पर्यन्त जगत् में विचरता रहा हूँ, परन्तु ऐसा प्रश्न

२६०      * योगवाशिष्ठ *

मुझसे किसी ने नहीं किया । तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है ? यह प्रश्न अनर्थ का नाश करनेवाला है । तेरी बुद्धि विवेक में विकासमान हुई देख पडती है । हे राजन् ! जो कुछ जगत तुमको भासित होता है, सो सब असत है । जैसे रस्सी में सर्प, स्वप्न में गन्धर्वनगर, मरुस्थल में जल, सीपी में रूपा, आकाश में नीलापन और दूसरा चन्द्रमा भ्रम में दिखते हैं, वैसे ही यह जगत असतरूप है; जैसे जल में चक्र और तरङ्ग असतरूप हैं, वैसे ही जगत असतरूप है । जो मन सहित षट् इन्द्रियों से अतीत है और शून्य भी नहीं, सो मन और अविनाशी आत्मा कहलाता है । वह निर्मल परब्रह्म सर्व ओर से पूर्ण और अनन्त है, उसी में जगत कल्पित है ।

हे राजन् ! जैसे सब वृक्षों में एक ही रस व्यापक है, वैसे ही सब पदार्थों में एक चिन्मात्रसत्ता व्यापक है । जैसे अचल समुद्र में द्रवता से तरंग उठते हैं, वैसे ही परमात्मा में जगत प्रकट होते हैं । उस महादर्पण में सब वस्तुएँ प्रतिबिम्बित होती हैं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले, चक्रादिक होते हैं; वैसे ही आत्मा में जीवादिक का आभास होता है । प्रथम स्फुरणरूप होते हैं और पीछे कारणकार्यरूप होते हैं । चित्तशक्ति अपने संकल्प से भूतादिक देह रचती है, उसमें स्वरूप के प्रमाद से आत्मा अभिमान करता है । जैसे कुमवारी की क्रिया अपने बन्धन का कारण होती है, वैसे ही जीव को अपना संकल्प बन्धन का कारण होता है । हे राजन् ! जीवकला को स्वरूप का अज्ञान हुआ है । इससे जैसे बालक को अपनी परछाईं यक्षरूप होकर डराती है, वैसे ही यह नाना प्रकार के आरम्भ को प्राप्त हुआ है, और अकारण ही ब्रह्मशक्ति फुरने से कारणभाव को प्राप्त हुआ है । उसमें बन्धन और मोक्ष भासित होते हैं । पर वास्तव में न बन्धन है और न मोक्ष है । निरामय ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । उसमें एक और अनेक कुछ नहीं कह सकते । इससे बन्धन-मोक्ष की कल्पना को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।

इति श्रीयो० नि० इक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चनवतितमस्सर्गः ॥९५॥

* निर्वाण प्रकरण * २६१

मुनि बोले, हे राजन्! जैसे द्रवता से जल ही तरंगभाव को प्राप्त होता है, तैसे ही चिन्मात्र ही संकल्प के स्फुरण से जीव होता है। और वह जीव संसार में कर्मों के वश भ्रमता हुआ भी अपने को कर्ता देखता है। पर सर्वात्मा परब्रह्म करता हुआ कुछ नहीं करता। जैसे सूर्य के प्रकाश से सब चेष्टाएँ होती हैं, पर सूर्य अकर्ता है, तैसे ही आत्मा की शक्ति से जगत् चेष्टा करता है। जैसे चुम्बक पत्थर के निकट लोहा चेष्टा करता है, तैसे ही आत्मा की चेतनता से सब देहादिक चेष्टा करते हैं। पर आत्मा सदा अकर्ता है। जैसे जल में तरंग उठते हैं, तैसे ही आत्मा में देहादिक प्रकट होते हैं। जैसे सुवर्ण में भूषणों की कल्पना होती है, तैसे ही आत्मा में मोह से सुख-दुःख कल्पित होते हैं, पर आत्मा में कुछ कल्पना नहीं। शुद्ध आत्मा में मूढ़ों ने सुख-दुःख की कल्पना की है। पर जो ज्ञानवान् हैं, उनको मन, चित्त, सुख-दुःख सब आकाशरूप शून्य हैं। वे देह से रहित केवल चिदाकाशभाव को नहीं प्राप्त होते हैं। वे जरा-मरण को नहीं प्राप्त होते और सब कार्य करते देख पड़ते हैं, पर हृदय से सदा अकर्तारूप हैं। जैसे जल और दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब पड़ता है, परन्तु उसे स्पर्श नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् को क्रिया नहीं स्पर्श करती। शरीर के व्यवहार में भी वह सदा निर्मल है।

हे राजन्! आत्मा स्थिररूप है, परन्तु भ्रम से चञ्चल भासित होता है। जैसे जल की चञ्चलता से पर्वत का प्रतिबिम्ब भी चञ्चल होता है, तैसे ही देहादिक से आत्मा चलता भासित होता है। पर आत्मा नित्य शुद्ध और अपने आपमें स्थित है। जैसे घट के नाश से मिट्टी का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे शुद्ध मणि में नाना प्रकार के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं, पर उनमें वह रञ्जित नहीं होती, तैसे ही आत्मा में मन, इन्द्रियाँ और देह दिखते हैं, पर उसे स्पर्श नहीं करते। जैसे सब मिष्ट पदार्थों में एक ही मिठाई व्यापी है तैसे ही सब पदार्थों में एक आत्मसत्ता व्यापी है। हे राजन्! आत्मा सदा अचलरूप है। परन्तु अज्ञान से चलरूप भासित होता है। जैसे दौड़ते हुए बालक को सूर्य दौड़ता लगता है, तैसे

२४२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

आत्मा देह संग में अज्ञानवश विकारवान भासित होता है । जैसे प्रतिबिम्ब का विकार आदर्श को नहीं स्पर्श करता, वैसे ही देह का विकार आत्मा को नहीं स्पर्श करता । जैसे अग्नि में सुवर्ण डालिये तो मैल जल जाता है, पर सुवर्ण का नाश नहीं होता, वैसे ही देह के नाश में आत्मा का नाश नहीं होता । वह तो नित्य शुद्ध, अवाच्य और अचिन्त्यरूप है ।

हे राजन् ! वह देखने में नहीं आता, परन्तु चेतनवृत्ति से सब देखता है । जैसे राहु अदृष्ट है, परन्तु चन्द्रमा के संयोग से दिखता है, वैसे ही आत्मा अदृष्ट है, परन्तु चेतनवृत्ति से जाना जाता है । जैसे शुद्ध दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही निर्मल बुद्धि से आत्मा का साक्षात्कार होता है । वह संकल्प से रहित अपने आपमें स्थित है ! जब बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने में आप उसको पाती है । हे राजन् ! जब तक अपनी बुद्धि निर्मल न हो, तब तक शास्त्र और गुरु से ईश्वर नहीं मिलता । जब अपनी बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने आप वह दिखता है । जब संसार की सत्यता हृदय से दूर हो और आत्मा का अभ्यास हो तब बुद्धि निर्मल होती है । हे राजन् ! सब भाव-अभावरूप जो देहादिक पदार्थ हैं, वे असत् और केवल भ्रममात्र हैं । उनकी आस्था का त्याग करो । जैसे कोई मार्ग में चलता है तो अनेक पदार्थ मिलते हैं, परन्तु उनमें वह कुछ रागद्वेष नहीं करता, वैसे ही देह और इन्द्रियों के स्नेह से रहित आत्मतत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है । उसमें देहादिक इन्द्रजाल की तरह मिथ्या है । उनकी भावना दूर से त्यागकर नित्य आत्मा में स्थित होओ ।

हे राजन् ! जीव आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु भी है, क्योंकि आत्मा में ओर का सद्भाव नहीं-आत्मा में आत्मा का ही भाव है-द्वैत नहीं । जो दृश्य पदार्थ और अनात्मधर्म विषय से खींचकर चित्त को अपने रूप में स्थित करता है, वह अपना मित्र है । और जो अनात्मधर्म में पदार्थों की ओर चित्त लगाता है, वह अपना शत्रु है । वास्तव में जो कुछ दृश्य प्रपंच है, वह भी आत्मरूप है । आत्मा में

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २६३

भिन्न कोई वस्तु नहीं। जैसे समुद्र में जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, सब जल ही जल है, वैसे ही आत्मा से भिन्न जगत् कोई वस्तु नहीं—सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त एक आत्मसत्ता ही स्थित है। जैसे अनेक घटों के जल में एक ही सूर्य का प्रकाश प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही अनेक देहों में एक ही आत्मा व्याप रहा है। वह न अस्त होता है और न उदय होता है; सदा एकरस अविनाशी पुरुष ज्यों का त्यों स्थित है। उसमें अहंभावना से संसार भासित होता है। जैसे सीपी में चाँदी की बुद्धि होती है वैसे ही आत्मा में अहंबुद्धि संसार का कारण है। जीव इसी बुद्धि से सब दुःखों का भागी होता है। जैसे वर्षाकाल में सब नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही अनात्म के अभिमान से सब आपदाएँ प्राप्त होती हैं। वास्तव में चिन्मात्र ब्रह्म और जीव में रञ्चक भी भेद नहीं। दोनों एक रूप ही हैं। ऐसी बुद्धि ही बन्धन से मुक्ति का कारण है। आत्मा सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त है। जैसे सूर्य का प्रकाश सब स्थानों में होता है, परन्तु जहाँ शुद्ध जल है वहाँ स्पष्ट दिखता है, वैसे ही आत्मा सब जगह पूर्ण रूप से व्याप्त है, परन्तु शुद्ध बुद्धि में ही भासित होता है। जैसे तरङ्ग और बुलबुलों में जल ही व्याप रहा है, वैसे ही अविनाशी आत्मा सर्वत्र व्यापा है। पर जैसे सुवर्ण में भूषण नहीं, वैसे ही आत्मा में जगत् का अभाव है।

हे राजन् ! यह संसार आत्मा में नहीं है; केवल आत्मा ही है। जो एक वस्तु पात्र की तरह आधार होता है, उसमें दूसरी वस्तु होती है। पर आत्मा तो अद्वैत है, उसमें दूसरी वस्तु संसार कहाँ से हो ? जैसे सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं—वास्तव में कुछ नहीं, वैसे ही आत्मा में संसार अज्ञान से कल्पित है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल चिदाकाश है। जैसे नदियाँ और समुद्र नाममात्र भिन्न हैं, वास्तव में जल ही है, वैसे ही केवल चिदाकाश में विश्व नाममात्र का है। जितने आकार दीखते हैं, उनको काल खा जाता है। जैसे नदियों का भक्षण करके समुद्र नहीं अघाता, वैसे ही पदार्थ-समूहों का काल भक्षण करके नहीं अघाता। हे राजन् ! ऐसे पदार्थों में क्या अभिलाषा करनी है ? कई

२६४ * योगवासिष्ठ *

कोटि प्राणियों की सृष्टि उत्पन्न होती है और उसको काल खा जाता है-कोई पदार्थ काल में मुक्त नहीं होता, जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुल-बुले उपजते हैं और नष्ट हो जाते हैं। इससे तू काल में अतीतपद की भावना कर, जिसमें काल का भी भक्षण कर सके। कैसे भावना करिये और कैसे भक्षण करिये, सो भी सुन। जैसे मन्दराचल ने अगस्त्यमुनि के आने की भावना की है वैसे ही तू भी अपने स्वरूप की भावना कर, तब काल का भक्षण करेगा। जैसे अगस्त्यमुनि ने समुद्र को पी लिया था, वैसे ही आत्मारूपी अगस्त्य कालरूपी समुद्र को खा जायगा।

हे राजन् ! जन्म-मरणादिक विकार भ्रम से है और आत्मा के प्रमाद से भासित होते हैं। जब आत्मा को निश्चय करके जानोगे तब कोई विकार न भासित होगा; क्योंकि ये अज्ञान से रचे हैं-आकाश में कोई विकार नहीं। जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प दिखता है, सो तब तक है, जब तक रस्सी को नहीं जाना, और जब रस्सी को जाना, तब सर्प का भ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही जन्म-मरणादिक विकार आत्मा में तब तक दिखते हैं, जब तक आत्मा को नहीं जाना। जब आत्मा को जानोगे तब सब विकार नष्ट हो जावेंगे। हे राजन् ! विकार से रहित आत्मा तेरा स्वरूप है। उसकी भावना कर, जिसमें तेरे दुःख नष्ट हो जावें। आत्मपद को कहीं खोजने नहीं जाना है; न किसी वस्तु को जानकर ग्रहण करना है कि यह आत्मा है; और न किसी काल की अपेक्षा ही है। आत्मा तेरा अपना स्वरूप है और सर्वदा अनुभवरूप है। तुझसे भिन्न कुछ वस्तु नहीं। तू अपने यथार्थ रूप को जान। आत्मा के न जानने से मनुष्य अपने को दुःखी जानता है। मैं मरूँगा, मैं दरिद्री हूँ, मैं दास हूँ इत्यादि दुःख तब तक होते हैं, जब तक आत्मा को नहीं जाना। जब आत्मा को जानोगे, तब आनन्दरूप हो जाओगे।

जैसे किसी स्त्री की गोद में पुत्र हो और वह स्वप्न में देखे कि बालक मेरे पास नहीं है तो बड़े दुःख को प्राप्त हो और रुदन करने लगे, पर जब स्वप्न से जागे और देखे कि बालक उसकी गोद में है तो बड़े आनन्द को प्राप्त हो और उसके दुःख-शोक नष्ट हो जावें। हे राजन् !

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ २६५

वैसे ही तेरा आत्मा तेरे पास और सदा अनुभवरूप है। उसके प्रमाद से तू अपने को दुःखी जानता है। जब अज्ञानरूपी निद्रा से तू जागेगा, तब अपने को जानेगा और तेरे दुःख और शोक नष्ट हो जावेंगे। देह और इन्द्रियादिक जो दृश्य हैं, उनसे मिलकर अपने को यह जानना कि मैं हूँ, यही अज्ञाननिद्रा है। इससे रहित होकर देख, जिसमें आनन्द को प्राप्त हो। ये जो पदार्थ दिखते हैं, सब मिथ्या हैं। जैसे बालक मृत्तिका में राजा, मेना, हाथी और घोड़े की कल्पना करता है, किन्तु वास्तव में उनमें न कोई राजा होता है, न मेना होती है, न कोई हाथी-घोड़ा होता है एक मृत्तिका ही होती है, वैसे ही चित्तरूपी बालक ने आत्मरूपी मृत्तिका में जो राजा और मेना आदिक सम्पूर्ण विश्व की कल्पना की है, सो सब मिथ्या है। हे राजन् ! एक उपाय तुझसे कहता हूँ, उसे कर, जिसमें तेरे दुःख नष्ट हो जावें। एक वस्तु जो 'अहं अभिलाषा सहित वासना है, उसका त्याग कर। फिर जहाँ इच्छा हो वहाँ विचर। तुझे दुःख का स्पर्श न होगा। संकल्प ही उपाधि है और कोई उपाधि नहीं। जैसे जब मणि तृण से ढकी होती है, तब नहीं देख पड़ती और जब तृण दूर करिये तब मणि प्रकट हो जाती है, वैसे ही आत्मारूपी मणि वासनारूपी तृण से ढकी है। जब वासनारूपी तृण दूर कीजिये, तब आत्मारूपी मणि प्रकट हो।

हे राजन् ! जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति से रहित जो आत्मपद है, उसको जब प्राप्त होगा, तब जानेगा कि मैं मुक्त हूँ। तेरा स्वरूप तो केवल आत्मरूप है, उस पद में स्थित हो। वह अजन्मा, नित्य, चैतन्य-मात्र और सबका अपना रूप है। उसी के प्रमाद से दुःख होता है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलौने बनाते हैं और हाथी, घोड़ा आदि उनके नाम कल्पित कर अभिमान करते हैं कि ये मेरे हैं और उनका नाश होने से दुःखी होते हैं, वैसे ही बालकरूप अज्ञानी स्वरूप के प्रमाद में अभिमान करता है कि ये मेरे हैं और मैं इनका हूँ, और उनका नाश होने से दुःखी होता है—यह नहीं जानता कि सत् का नाश नहीं होता। का असत् नाश होने में सत् का नाश मान बैठता है। जैसे घट का

२६६ ✹ योगवासिष्ठ ✹

नाश होने से घटाकाश का नाश मानिये, वैसे ही मूर्खता से दुःख पाता है। हे राजन् ! तू अपनी आत्मा जान। आत्मादिक संज्ञा की शास्त्रों ने उपदेश के लिए कल्पित की है, नहीं तो आत्मा अनिर्वच-नीय पद है। उसमें वाणी की गति नहीं, पर इन्हीं से जाना जाता है, क्योंकि मन और वाणी में भी आत्मसत्ता है; उसी से आत्मादिक संज्ञा सिद्ध होती है। जैसे जितने स्वप्न के पदार्थ हैं; उनमें अनुभवसत्ता है, उससे वे पदार्थ सिद्ध होते हैं, वैसे ही जितनी कुछ अर्थ-संज्ञाएँ हैं, वे सब आत्मा से सिद्ध होती हैं। ऐसा जो तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो जिसमें जरा-मृत्यु आदि दुःख नष्ट हो जावें ।

हे राजन् ! निःस्पन्द होकर देखेगा तो स्पन्दन में भी वही भासित होगा, और स्पन्दन-निःस्पन्दन तुल्य ही जान पड़ेंगे । जो समाधि में होगा अथवा चेष्टा करेगा तो भी तुल्य होंगी। और न समाधि में शान्ति भासित होगी और न चेष्टा में दुःख होगा। दोनों में एकरस रहेगा। हे राजन् ! देना अथवा लेना, यज्ञ, दान आदिक क्रियाएँ, जो कुछ प्राकृत आचार प्राप्त हो, उसकी मर्यादा और शास्त्र की विधि से कर, पर निश्चय आत्मस्वरूप में ही रख। जैसे नट तरह-तरह के स्वाँग भरकर सम्पूर्ण चेष्टाएँ करता है, पर उसमें निश्चय नटत्व ही का रहता है, वैसे ही तू सब चेष्टाएँ कर, पर उसके अभिमान और संकल्प से रहित हो। ग्रहण अथवा त्याग, जो कुछ स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो, उसमें ज्यों का त्यों रह। जब निर्विकल्प होकर अपने स्वरूप को देखेगा, तब उत्थानकाल में भी तुझे आत्मा ही दिखेगा। जैसे जल के जानने से तरङ्ग, फेन, बुलबुले आदि सब जल ही भासित होते हैं, वैसे ही जब तू आत्मा को जानेगा, तब संसार भी आत्मरूप दिखेगा। जो आत्मा को नहीं जानता, उसको जगत् ही दिखता है और उससे वह दुःख पाता है। इससे तू अन्तर्मुख हो और संकल्प को त्यागकर परम निर्वाण अच्युतपद में स्थित हो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे गजइक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६६ ॥

२६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, न असत् है, न कोई देश है, न काल है, न कोई पदार्थ है। केवल चैतन्यमात्र गुणातीत है। उसमें न कोई गुण है, न माया है। केवल शान्तरूप आत्मा है।

हे राजन् ! वह शास्त्रों और गुरु के वचनों से पाया जाता है, कोरे तप से नहीं मिलता। केवल अपने आप जाना जाता है, शास्त्रादिक तो लखा देते हैं, परन्तु "यह है" ऐसा कहकर नहीं जनाते। द्रष्टा पुरुष अपने आप जानता है। जैसे नेत्रों में जो सूर्य की ज्योति है, वही सूर्य को देखती है; वैसे ही आत्मा ही आत्मा को देखता है। वह अन्तर्मुख और संकल्प से रहित होकर अपने को आप देखता है। जब संकल्प बहिर्मुख होता है, तब वही दृढ़ होकर स्थित होता है और फिर उसकी भावना होती है। तब संकल्परूप जगत् दृढ़ता से स्थित होता है, तब दुःखदायी होता है। हे राजन् ! जीव को और कोई दुःखदायी नहीं, अपने ही संकल्प से असम्यग्दर्शी दुःखी होता है। सम्यग्दर्शी को जगत् दृष्टिगोचर होने पर भी दुःखदायी नहीं होता। जैसे रम्मी में सर्प की भावना होती है तो भय प्राप्त होता है, फिर जब रम्मी को जान लेने से सर्प का भ्रम दूर होता है, तब भय भी जाता रहता है, वैसे ही पुरुष को जो संसार की भावना होती है, वह दुःखदायी है इससे आत्मा की भावना कर, जिससे तेरे सब दुःख नष्ट हो जावें। हे राजन् ! तू सर्वदा आनन्दरूप और अद्वैत है। तुझमें कोई कल्पना नहीं, तू आत्मस्वरूप है। आत्मा छहों काम, क्रोध आदि विकारों से रहित है। विकार मिथ्या देह के हैं, आत्मा शुद्ध है। आत्मा के प्रमाद से विकार भासित होते हैं। जब तू आत्मा को जानेगा, तब कोई विकार न देख पड़ेगा; क्योंकि आत्मा अद्वैत है।

राजा ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि आत्मा अद्वैत है। जो यह बात है तो पर्वत आदिक विश्व का कैसे भान होता है और पत्थररूप बड़े आकार बन के कहाँ से उपजे हैं ? इसका रूप क्या है, कृपा करके कहो। मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में संसार कोई नहीं। वह सदा शान्तरूप और निराकार है। उसमें स्पन्दन-निःस्पन्द दोनों शक्ति हैं। जब निःस्पन्द शक्ति होती है, तब केवल अद्वैत भासित होता

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २६६

है। और जब स्पन्दनशक्ति चेतती है, तब नाना प्रकार के जगत के आकार भासित होते हैं। पर वास्तव में आत्मा ही है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग कुछ और नहीं, वही है, पर पवन के संयोग से तरंग उठते हैं तो भिन्न भिन्न नजर आते हैं; वैसे ही स्फुरणशक्ति से भिन्न-भिन्न अहंकार भासित होते हैं—वास्तव में सब आत्मस्वरूप हैं—इतर कुछ नहीं। जैसे वट के बीज में पत्ते, डाल, फूल और फल अनेक देख पड़ते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता ने जो नाना प्रकार के आकार रखे हैं, वे यद्यपि देख पड़ते हैं, तो भी कुछ बना नहीं, केवल अद्वैत आत्मा ज्यों का त्यों स्थित है। वह सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है। पर्वत आदिक जो विश्व दिखता है, सो सब आत्मा का चमत्कार है। जैसे स्वप्न में पर्वत और वृक्ष आदिक नाना प्रकार के आकारों का जो भान होता है, वह केवल अनुभव है—उससे इतर कुछ नहीं, वैसे ही जाग्रत विश्व भी आत्मा का अनुभवरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं।

इक्ष्वाकु ने पूछा, हे भगवन् ! जो आत्मा सूक्ष्म है तो असतरूप पर्वतादिक स्थूल पदार्थ सत् होकर कैसे देख पड़ते हैं, यह कृपा करके कहो ? मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में अनन्त शक्ति है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं, सब उसी के रूप हैं। जैसे सूर्य की किरण सूर्य से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा की शक्ति आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे पवन में दो शक्तियाँ हैं—स्पन्दन और निःस्पन्द, सो उसी का रूप है—स्पन्दन-शक्ति से प्रकट भासित होता है और निःस्पन्द से प्रकट नहीं भासित होता, वैसे ही आत्मा में भी स्पन्दन तथा निःस्पन्द, दो शक्तियाँ हैं। जब स्पन्दनशक्ति उठती है, तब अहंभाव प्रकट होता है और जब अहं-भाव हुआ, तब चित्त का उदय होता है। अहं ही चित्त है। जब चित्त हुआ तब आकाश की भावना से आकाश बन जाता है। जब स्पर्श की भावना हुई, तब पवन उत्पन्न होता है। रूप की भावना से अग्नि बनती है। जब रस की भावना हुई, तब जल उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार चित्त की कल्पना से तत्त्व उपजे हैं। जब चारों तत्त्व इकट्ठे हुए, तब एक अण्ड बना। और जब दृढ़ संकल्प किया, तब स्वायंभुव मनु उत्पन्न

३०० ❈ योगवाशिष्ट ❈

हुआ। जब अण्ड फूटा, तब स्वर्ग, मध्य (पृथ्वी) और पाताल, तीन लोक हुए। ये तीनों लोक राजस, सात्त्विक और तामस तीनों गुण हुए। फिर पर्वत आदिक दृश्य पदार्थ हुए।

हे राजन् ! केवल संकल्पमात्र से ही सब हुआ है। जब स्पन्दनशक्ति स्फुरती है, तब ये प्रकार आत्मा में भासित होते हैं, परन्तु वास्तव में कुछ बना नहीं। जैसे समुद्र में फेन और बुलबुले जो उठते हैं, सो जल रूप हैं—जल से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। आदि मनु जो स्वायम्भुव हैं, उनके संकल्प ने आगे मन रचे हैं। इसी प्रकार त्रिगुणमय सृष्टि उत्पन्न होती है, सो केवल संकल्पमात्र है। जब तक चित्त है, तबतक विश्व है; जब चित्तस्फुरण से रहित हुआ, तब शक्ति निःस्पन्द होती है और जब शक्ति निःस्पन्द हुई तब फिर जगत् नहीं दिखाई देता है। हे राजन् ! यह विश्व मन के स्फुरण से है और सत्य की नाईं स्थित हुआ है। मन जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु वह नहीं भासित होता और असत्य की नाईं भासित होता है। वह सत् कैसे असत्य की तरह हुआ है और असत् कैसे मन की तरह हुआ है, यह सुन। सत् जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु सो नहीं भासित होता और असत्य जो परिच्छिन्नरूप देश-काल-वस्तु-परिच्छेद-संयुक्त है, वह मन जैसा भासित हुआ है। जहाँ देखिये, वहाँ दृश्य गुणमय संसार का भान होता है। यह माया महा आश्चर्यरूप है, जिसने सत्य में असत्य की और असत्य में सत्य की प्रतीति कराई है। चित्त के सम्बन्ध से ही संसार भासित होता है; आत्मा में संसार कदापि नहीं है। जब चित्त को स्थित करके देखोगे, तब तुम्हें संसार न भासित होगा।

जैसे गम्भीर जल होता है तो चलता नहीं दीखता, वैसे ही गम्भीर आत्मा में संसार नहीं जाना जाता कि कहाँ जगता है। संसार भी आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, आत्मस्वरूप ही है। जैसे अग्नि की चिनगारी और जल के तरङ्ग अग्नि और जल से भिन्न नहीं अथवा मणि का प्रकाश मणि से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से संसार भिन्न नहीं; केवल आत्मस्वरूप है। ऐसे आत्मा को जानकर शान्ति पाओ।

❄ निर्वाण प्रकरण ❄ ३०१

जिसमे सारे दुःख नष्ट हो जावें। केवल शान्तपद आत्मा तेरा अपना रूप है। अपने स्वरूप को भूल तू दुःखी हुआ है। जब आत्मा को जानेगा, तब संसार भी आत्मरूप दिखेगा, क्योंकि वह आत्मस्वरूप है। आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। ऐसा आत्मा तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो। हे राजन् ! यह सब जगत् चिदाकाशरूप है, यही भावना दृढ़ कर। जिसकी ऐसी भावना दृढ़ है और जिसकी सब इच्छा शान्त हो गईं, उस पुरुष को कोई दुःख नहीं होता। उसने निरिच्छारूपी कवच पहिना है। हे राजन् ! जो अहँ के अर्थ से रहित है, जिसका सर्व शून्य हो गया है और जिसने निरालम्ब का आश्रय लिया है; वह पुरुष मुक्त है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मनुइक्ष्वाकुआख्याने सर्व-ब्रह्मप्रतिपादनं नाम सप्तषष्टितमसर्गः ॥ ६७ ॥

मनु बोले, हे राजन् ! यह संसार आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। जैसे जल और तरङ्ग, सूर्य और किरणें, अग्नि और चिनगारी भिन्न नहीं है, वैसे ही आत्मा और संसार भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप ही है। जैसे इन्द्रियों के विषय इन्द्रियों में रहते हैं वैसे ही आत्मा में संसार है। जैसे पवन में जो स्पन्दन-निःस्पन्दशक्ति है सो पवन से भिन्न नहीं, वैसे ही संसार आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप है। हे राजन् ! विषय की सत्यता को त्यागकर केवल आत्मा की भावना कर, जिसमें तेरे संशय मिट जावें। तू आत्मस्वरूप और निर्गुण है; तुझको गुणों का स्पर्श नहीं होता और तू सबसे परे है। जैसे आकाश में धूल, धुवाँ और बादल ये विकार देख पड़ते हैं, पर आकाश निर्लेप रहता है, वह अद्वैतरूप है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुषों को, जिनको आत्मज्ञान हुआ है, सुख, दुःख, राजस, तामस, सात्त्विक गुण लिप्त नहीं करते। यद्यपि उनमें लोकदृष्टि में ये गुण दीखते हैं, पर वे अपने आत्मा में नहीं दीखते। जैसे समुद्र में अनेक तरङ्ग जलरूप होते हैं और शुद्ध मणि में नील, पीत आदिक प्रतिबिम्ब पड़ते हैं सो देखने भर को हैं, मणि को स्पर्श नहीं करते, वैसे ही जिस पुरुष के हृदय से वासना का मल दूर हुआ है, उसके शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले राजस, सात्त्विक और तामस गुणों के कार्य

३०२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

सुख-दुःख देखने भरके होते हैं, उसे स्पर्श नहीं करते । उसमें केवल मत्त समान पद का निश्चय होता है और उसको कोई सङ्ग स्पर्श ना करता । जैसे आकाश को धूल लेप नहीं होता, वैसे ही आत्मा व गुणों का सम्बन्ध नहीं होता । जो पुरुष ऐसा जानता है, उसको ज्ञानी कहते हैं ।

जब जीव निःस्पन्द होता है, तब आत्मा होता है और जब उस वासना का स्पन्दन होता है, तब वह संसारी होता है । जब चित्त जगता है, तब अनेक सृष्टि भासित होती है, और जब चित्त स्फुरण रहित होता है, तब संसार का अत्यन्ताभाव होता है और प्रध्वंसाभाव भी नहीं भासित होता है । तब संसार भी केवल आत्मरूप हो जाता है इससे हे राजन् ! वासना को त्यागकर चित्त को स्थित करो । वासना ही मल है । जब वासना का त्याग होगा, तब केवल आकाश की तरह अपने को स्वच्छ जानोगे ! आत्मा वाणी का विषय नहीं वह केवल आत्मत्वमात्र, अपने रूप में स्थित और सर्वदा उदयरूप है । विश्व भी आत्मा का चमत्कार है; कुछ भिन्न वस्तु नहीं । द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की त्रिपुटी अज्ञान से भासित होती है; आत्मा सर्वदा एकरूप और त्रिपुटी से रहित है । चित्त के स्फुरण से आत्मा ही त्रिपुटी रूप होकर स्थित हुआ है, इससे चित्त को स्थिर कर देखो कि आत्मा में भिन्न कुछ वस्तु नहीं । वासना के स्फुरण में संसार है, जब वह मिटती है, तब संसार भी मिट जाता है । उस वासना के स्फुरण की निवृत्ति लिए सात भूमिका कहता हूँ ।

जब प्रथम जिज्ञासु होता है, तब चाहता है कि संतजनों का संग कर ब्रह्मविद्या-शास्त्र को देखे और सुने—यह प्रथम भूमिका है । भूमि चित्त के ठहरने के स्थान को कहते हैं । फिर जब सत्संग और शास्त्र में बुद्धि बढ़ी, तब सन्तों और शास्त्रों के कहने को विचारना कि मैं कौन हूँ और संसार क्या है—यह दूसरी भूमिका है । उसके उपरान्त यह विचार- ना कि मैं आत्मा हूँ; संसार मिथ्या है और मुझमें कोई संसार नहीं बारम्बार ऐसी भावना करना तीसरी भूमिका है । जब आत्मभावना

  • निर्वाण प्रकरण * ३०३

दृढ़ता से आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सम्पूर्ण वासनाएँ मिट जाती हैं और जब स्वरूप मे नीचे के स्तर पर उतरकर देखता है, तब संसार भासित होता है, परन्तु उसे वह स्वप्न की नाईं जानता है—इसमें वासना नहीं उठती । ऐसा अवलोकन चौथी भूमिका है । जब अवलोकन होता है, तब आनन्द प्रकट होता है । ऐसे महाआनन्द का प्रकट होना और जब आनन्द प्रकट हो तब उसमें स्थिर होना पञ्चम भूमिका है । तुरीयापद छठी भूमिका है । चित्त की दृढ़ता का नाम तुरीयावस्था है । जब तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है, तब परम निर्वाण होता है—उसको सप्तम भूमिका कहते हैं । उस परम निर्वाणपद की जीवन्मुक्त को गति नहीं, क्योंकि तुरीयातीतपद को वाणी मे बता नहीं सकते ।

प्रथम तीन भूमिका जो कही हैं, वे जाग्रत् अवस्था हैं । उनमें मनुष्य श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है और संसार की सत्ता भी दूर नहीं होती । चतुर्थ भूमिका स्वप्नवत् है । उसमें संसार की सत्ता नहीं होती । पञ्चम भूमिका सुषुप्ति अवस्था है; क्योंकि उसमें जीव आनन्दघन में स्थित होता है । छठी भूमिका तुरीयपद है, जो जाग्रत्-स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों का साक्षी है । उसमें केवल ब्रह्म ही प्रकाश पाता है और चित्त निर्वाणपद में लय हो जाता है । तुरीयपद में जीवन्मुक्त लोग बिचरते हैं । सप्तम भूमिका तुरीयातीतपद है; वही परम-निर्वाणपद है । तुरीयावस्था में ब्रह्माकारवृत्ति रहती है । जब ब्रह्मा-कारवृत्ति भी लीन हो जाती है, जहाँ वाणी की गति नहीं, वहाँ चित्त नष्ट हो जाता है; तब वह केवल आत्मतत्त्वमात्र रह जाता है । उसमें अहंभाव नहीं होता । शान्त और परमनिर्वाण तेरा स्वरूप है और सब विश्व भी वही रूप है, कुछ भिन्न नहीं जैसे सुवर्ण ही भूषण है और सुवर्ण में भूषण कल्पित है । भूषण भी परिणाम मे होता है, पर आत्मा सदा अच्युतरूप है और कभी परिणाम को नहीं प्राप्त होता । वह केवल एक रस है । उसने चित्त के स्फुरण मे विश्व की कल्पना की है, इससे विकारसंयुक्त भासित होता है । हे राजन ! ऐसा आत्मा तुम्हारा

३०४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

स्वरूप है। उसमें स्थित होकर अपने प्रकृत आचार में निरहंकार होकर विचर। बल्कि अहंकार के त्याग का अभिमान भी त्यागकर केवल आत्मरूप हो रहो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमानिर्वाणवर्णनं नामाष्टनवतितमसर्गः ॥ ९८ ॥

मनु बोले, हे राजन् ! आदि-मध्य-अन्त में रहित अनाभास सर्व-चिदाकाश सत्ता ज्यों की त्यों स्थित है और आगे भी वही स्थित रहेगी। इसमें न ऊर्ध्व है, न अधः है, न तम है, न प्रकाश है और न कुछ उससे भिन्न है। वह सबकी सत्ता है, जो चिन्मात्र परम सार है। उसने आप ही संकल्प से चेतना की, तब जगत् हुआ। हे राजन् ! यह विश्व आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे जल में तरङ्ग, मिर्च में तीक्ष्णता, शक्कर में मधुरता, अग्नि में उष्णता, बर्फ में शीतलता, सूर्य में प्रकाश, आकाश में शून्यता और वायु में स्पन्दन है, वैसे ही आत्मा में जो विश्व है, वह आत्मस्वरूप ही है, आत्मा से भिन्न नहीं। हे राजन् ! जो सब आत्मस्वरूप ही है, तो शोक और मोह किसका करता है ? जैसे काष्ठ की पुतली यन्त्र के तागे से अनिच्छित चेष्टा करती है, वैसे ही नीतिरूप तागे से, अभिमान से रहित होकर, तू भी विचर और यह निश्चय रख कि न मैं कुछ करता हूँ, न कराता हूँ। किसी में रागद्वेष न कर। जैसे शिला पर जो मूर्ति लिखी होती है उसको न किसी का राग है और न द्वेष है, वैसे ही तू भी विचर। आत्मा से भिन्न कुछ न देख पड़े, ऐसा निरहंकार हो। चाहे व्यवहारी गृहस्थ हो चाहे संन्यासी, चाहे देहधारी हो चाहे देहत्यागी, चाहे विक्षेपी हो चाहे ध्यानी, तुझे कोई दुःख न होगा, तू ज्यों का त्यों ही रहेगा। वासना का होना ही संसार है और वासना से रहित होना मोक्ष है। जब वासना उठती है, तब संसारी होता है और जब वासना मिट जाती है, तब केवल आकाशरूप भासित होता है।

हे राजन् ! यह सब जगत् आत्मरूप है और आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जब सब आत्मा ही है, तब शोक और मोह किसका

निर्वाण प्रकरण३०५

कीजिये। हे राजन्! आत्मा सर्वदा एकरस है और विश्व आत्मा का चमत्कार है। जन्म-मरण आदि नाना विकार आत्मा के अज्ञान में प्रतीत होते हैं। जब आत्मा का ज्ञान होगा, तब आत्मरूप ही एकरस भासित होगा और विषमता कुछ न रहेगी। संवेदन में आकार दीखते हैं। अहंकार और वासना के सम्बन्ध को संवेदन कहते हैं। अहंकार और चित्त, दोनों पर्यायवाची हैं। हे राजन्! इसका अहंकार के साथ होना ही दुःखदायी है। केवल चिन्मात्र में अहंभाव मिथ्या है। जब तक संवेदन दृश्य की ओर उठता है, तब तक दृश्य का अन्त नहीं आता और नाना प्रकार के विकार भासित होते हैं। पर जब संवेदन आत्मा अधिष्ठान की ओर आता है, तब आत्मा शुद्ध अपना रूप होकर भासित होता है।

संवेदन भी आत्मा का कल्पित आभास है। आभास के आश्रय में विश्व कल्पित हुआ है। फुरने में भी और न फुरने में भी आत्मा ज्यों का त्यों है। परन्तु फुरने में विषमता भासित होती है, और न फुरने में ज्यों की त्यों आत्मा भासित होता है। जैसे रश्मी के अज्ञान में सर्प दीखता है, जब रश्मी का ज्ञान होता है, तब सर्प की सत्यता जाती रहती है और रश्मी ज्यों की त्यों जान पड़ती है, पर सर्प जान पड़ने के काल में भी रश्मी ज्यों की त्यों ही थी, उसमें कुछ नहीं हुआ था—जानने न जानने में एक समान ही थी, वैसे ही आत्मा स्फुरण के समय में जगतरूप में दीखता है और स्फुरण के निवृत्त होने पर आत्मा ही भासित होता है, पर आत्मा दोनों कालों में एक समान है। जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से भिन्न नहीं और अग्नि में उष्णता भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में विश्व भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप ही है।

हे राजन्! अहंकार को त्याग करके अपने सत्ता-महान स्वरूप में स्थित हो, तब तेरे सब दुःख निवृत्त हो जावेंगे। एक कवच तुझको बनाता हूँ, उसको धारण करके विचर तो तुझ पर अनेक शस्त्रों की वर्षा होने पर भी तुझे दुःख न होगा। तू जो कुछ देखता-सुनता है, उसे सब ब्रह्म जान और बारम्बार यही भावना कर कि ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं।

३०६ ❇ योगवासिष्ठ ❇

जब ऐसी भावना दृढ़ करेगा, तब कोई शस्त्र तुझे काट न सकेगा। यह ब्रह्मभावना ही कवच है। जब इसको तू धारण करेगा, तब सुखी होगा।

इतना कह वाल्मीकिजी बोले कि जब वशिष्ठजी ने रामजी को मनु और इक्ष्वाकु का संवाद सुनाया, तब सायंकाल में सूर्य अस्त हुआ और सारी सभा और वशिष्ठजी भी स्नान को उठे। फिर सूर्य की किरणों के निकलते ही सब आ पहुँचे।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मोक्षरूपवर्णनं नाम नवनवतितमसर्गः ॥ ६६ ॥

मनु बोले, हे राजन! जिसका कारण ही मिथ्या है, उसका कार्य कैसे सत हो? यह आभास जो संवेदन है, वही विश्व का कारण है। जब आभास ही मिथ्या है, तब विश्व कैसे सत्य हो और जब विश्व ही असत है, तब भय और शोक किसका करना है? हे राजन! न कोई जन्मता है, न मरता है, न सुख है, न दुःख है, आत्मा ज्यों का त्यों स्थित है। उर्मा में संवेदन ने विश्व की कल्पना की है। इसमें संवेदन का त्याग कर कि 'न मैं हूँ, न यह है'। जब तुझे ऐसा दृढ़ निश्चय होगा, तब आत्मा ही शेष रहेगा और अहंकार निवृत्त हो जावेगा; क्योंकि आत्मा के अज्ञान में वह होता और आत्मज्ञान से ही नष्ट हो जाता है। हे राजन! जो वस्तु भ्रम सिद्ध हो और सत दिखे, उसको प्रथम विचारिये। जो विचार किये से रहे तो उसे सत्य और आत्मा जानिये; और जो विचार किये में नष्ट हो जावे तो उसको अनात्मा तथा मिथ्या जानिये। जैसे हीरा श्वेत होता है और बर्फ का कण भी श्वेत होता है, एक समान दोनों भासित होते हैं, पर उनकी परीक्षा के लिये सूर्य के सम्मुख दोनों को रखिये तो जो धूप में गल जाय उसे झूठा जानिये और जो ज्यों का त्यों रहे उसको सत जानिये, वैसे ही विचाररूपी सूर्य के सम्मुख करिये तो अहंकार बर्फ की नाईं नष्ट हो जाता है, क्योंकि जो अहंकार अनात्म अभिमान में होता है, वह तुच्छ है—सर्वव्यापी नहीं।

जीव इन्द्रियों की क्रिया जो अपने में मानता है और परमधर्म की

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३०७

अपने में कल्पना करता है, वह भी तुच्छ है। वह अपने को आत्मा से भिन्न जानता है और पदार्थों को अपने से भिन्न जानता है, इस कारण विचार करने पर वरफ के हीरे की नाईं मिथ्या हो जाता है, अतः अविचार में सिद्ध है, विचार करने में नष्ट हो जाता है। पर आत्मा सब का साक्षी ज्यों का त्यों रहता है। वह अहंकार और इन्द्रियों का भी साक्षी और सर्वव्यापी है। हे राजन्! जो सत् वस्तु है, उसकी भावना कर और सम्यक्दर्शी बन। सम्यक्दर्शी को कोई दुःख नहीं होता। जैसे मार्ग में पड़ी रस्सी को रस्सी जानिये तो कोई भय नहीं और सर्प जानिये तो भय होता है। इससे सम्यक्दर्शी हो—असम्यक्दर्शी मत बन। हे राजन्! जो कुछ दृश्य पदार्थ हैं, वे सुखदायी नहीं, दुःखदायी ही हैं। जबतक इनका संयोग है, तबतक सुख जान पड़ता है, पर जब उनका वियोग होता है तब दुःख मिलता है। इससे तू उदासीन हो; किसी दृश्य पदार्थ को सुखदायी न जान और दुःखदायी भी न जान। सुख और दुःख दोनों मिथ्या हैं। इनमें आस्था मत कर अहंकार से रहित जो तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो। जब अहंकार नष्ट होगा, तब अपने को जन्म-मरण विकारों से रहित आत्मा जानेगा कि मैं निरहंकार ब्रह्म चिन्मात्र हूँ। ऐसे अहंभाव से रहित होने पर अपना होना भी न रहेगा; केवल चिन्मात्र, आनन्द और राग-द्वेष के क्षोभ से रहित शान्त रूप होगा। जब अपने का ऐसा जाना, तब सोच किसका करेगा?

हे राजन्! इस दृश्य का त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो और इस मेरे उपदेश को विचार कि मैं सत्य कहता हूँ, अथवा असत्य। जो विचार में संसार सत्य हो संसार की भावना कर और जो आत्मा सत्य हो तो आत्मा की भावना कर। हे राजन्! सम्यक्दर्शी होकर सत् को सत् और असत् को असत् जान। जो असम्यक्दर्शी हैं, वे सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मानते हैं। यथार्थ न जानने से असत वस्तु स्थिर नहीं रहती, परन्तु अज्ञानी दुःख पाता है। जैसे कोई पुरुष एक कुटी रचकर सोचने लगे कि मैंने आकाश की रक्षा की है और फिर जब कुटी नष्ट हो तब शोक करे कि आकाश नष्ट हो गया, क्योंकि