योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
२८० * योगवासिष्ठ *
है, उसका आश्रय करके विचरो। तब दुःख से रहित होगे। इन तीनों वृत्तियों में तुम्हारे दुःख नष्ट हो जायेंगे। जो कुछ शुभ क्रिया आकर प्राप्त हो, उसकी शङ्का त्याग कर जो करे, वह पुरुष महाकर्ता है। धर्म-अधर्म क्रिया जो अनिच्छित प्राप्त हो, उसको रागद्वेष से रहित होकर जो करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुरुष मौनी, निरहंकार, निर्मल और मत्सर से रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जो अनिच्छित प्राप्त हुए का त्याग न करे और जो नहीं प्राप्त हुआ उसकी वाञ्छा न करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुण्य-पाप क्रियाएँ अनिच्छित प्राप्त हों उनको अहंकार से रहित होकर करे, पुण्यक्रिया करने से अपने को पुण्यवान् न माने और पाप करने में पापी न माने; सदा अपने को अकर्ता जाने, वह पुरुष महाकर्ता है जो सर्वत्र विगतस्नेह है, सत्यवत् स्थित है और इच्छा को त्यागकर बरतता है, वह महाकर्ता है। जो दुःख के प्राप्त होने पर शोक नहीं करता और सुख के प्राप्त होने पर जिसे हर्ष नहीं होता, स्वाभाविक चित्त समता को देखता है, वह कभी विषमता को नहीं प्राप्त होता। सुख की भिन्न-भिन्न विषमताओं में जो रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जिस पुरुष ने सुख-दुःख का त्याग किया है वह पुरुष महाकर्ता है।
हे बुद्धिन्! जो पुरुष प्राप्त हुई वस्तु को रागद्वेष से रहित होकर भोगता है, वह महाभोक्ता है। जो बड़ा कष्ट प्राप्त होने पर भी द्वेष नहीं करता और बड़े सुख की प्राप्ति में जिसे हर्ष नहीं होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो बड़े राज्य के सुख भोगने में अपने को सुखी नहीं मानता, राज्य के अभाव में और भिक्षा माँगने में अपने को दुःखी नहीं मानता, सदा स्वरूप में स्थिर रहता है, वह महाभोक्ता है। जो मान, अहंकार और चिन्तना से रहित केवल समता में स्थित है, वह महाभोक्ता है। जो कोई कुछ दे तो अपने को लेनेवाला नहीं मानता और शुभ क्रिया में भोगता हुआ अपने में कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं मानता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो मीठा, खट्टा, कषाय, तीक्ष्ण, सलोना, कटु, इन छहों रसों के भोगने में समचित्त रहता है और सम जानता है, वह महाभोक्ता
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २८१
है। जिसे रसवाले पदार्थ प्राप्त होने पर हर्ष नहीं होता और विरस के प्राप्त होने पर द्वेष नहीं होता, ज्यों का त्यों रहता है, और जैसा बुरा-भला प्राप्त हो उसको दुःख से रहित होकर भोगता है, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो कुछ शुभ-अशुभ, भाव-अभाव क्रियाएँ हैं, उनके सुख-दुःख से जो चलायमान नहीं होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जिसको मृत्यु का भय नहीं और जीने की आस्था नहीं, जो उदय-अस्त में समान है, वह महाभोक्ता है। जिसे बड़े सुख की प्राप्ति में हर्ष नहीं होता और दुःख की प्राप्ति में शोक नहीं होता, ज्यों का त्यों रहता है, वह महाभोक्ता है। जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो उसको करता हुआ अहंकार से रहित है, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो पुरुष शत्रु, मित्र और सुहृद् में समबुद्धि रखता है और विषमता को कभी नहीं प्राप्त होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो कुछ शुभ, अशुभ, दुःख सुख प्राप्त हो, उसको जो धारण कर लेता है, कभी विषमता को नहीं प्राप्त होता—जैसे समुद्र में नदियाँ प्राप्त होती हैं और वह उनको धारण कर सम रहता है—वह ज्ञानवान् शुभ-अशुभ को ग्रहण कर सम रहता है।
जो संसार, देह, इन्द्रियाँ और अहंकार की सत्ता त्यागकर स्थित हुआ है और जानता है कि 'न मैं देह हूँ,' 'न मेरी देह,' मैं इनका साक्षी हूँ, ऐसी वृत्ति को धारण करनेवाला महात्यागी है। जो सब चेष्टा करता है और रागद्वेष से रहित है, वह महात्यागी है। जो प्राप्त हुए शुभ-अशुभ को अहंकार से रहित होकर करता है, वह महात्यागी है। जो मन, इन्द्रिय और देह की भी इच्छा से रहित है, वह सब चेष्टाएँ करने पर भी महात्यागी है। जो पुरुष समचित्त, इन्द्रियजित और क्षमावान् है, वह महात्यागी है। हे राम! जिस पुरुष ने धर्म-अधर्म की देह और संसार के मद, मान, मनन इत्यादिक कल्पना का त्याग किया है, वह महात्यागी है। हे राम! इस प्रकार सदाशिव ने—जो हाथ में खप्पर लिये, बाघम्बर ओढ़े और चन्द्रमा मस्तक में धारे हुए परम प्रकाशरूप हैं—भृङ्गीगण को उपदेश किया। जैसे भृङ्गीगण
२८२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
विचरो, वैसे ही तुम भी विचरो तो तुम्हारे सब दुःख नष्ट होंगे । इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महाकर्ताद्युपदेशो नाम द्विनवतितमसर्गः ॥ ९२ ॥
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आपने जो उपदेश किया, वह मैं समझ गया । आपने पहले उपशम प्रकरण में उपदेश किया था कि आत्मा अनन्त और शुद्ध है । तब मैंने प्रश्न किया था कि जो आत्मा अनन्त और शुद्ध है तो यह कल्पना कैसे उपजी है—जैसे समुद्र निर्मल है उसमें धूल कैसे हो—तब आपने प्रतिज्ञा की थी कि इस प्रश्न का उत्तर सिद्धान्त-काल में कहेंगे । सो में अब सिद्धान्त का पात्र हूँ मुझसे कहिये । जैसे स्त्री भर्त्ता से प्रश्न करती है और भर्त्ता कृपा करके उपदेश करता है, वैसे ही में आपकी शरण हूँ । कृपा करके मुझे उत्तर दीजिये; क्योंकि आशा और तृष्णा के फाँसे मेरे टूटे हैं और आशारूपी जाल से मैं निकल गया हूँ । मेरे हृदय में संशयरूपी धूल उठ रही है । उसको वचनरूपी वर्षा से शान्त करो । मेरे हृदय में अन्धकार है, उसे वचनरूपी क्रीड़ा से निवृत्त करो । आपके वचनरूपी अमृत से में तृप्त नहीं होता । हे भगवन् ! गुरु के उपदेश किये बिना अपने विचार ज्ञान में नहीं शोभते । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष शान्त, क्षमावान् और इन्द्रियजित है, जिसने मन के संकल्प-विकल्प को जीता है, वह सिद्धान्त का पात्र है । हे राम ! तुम अब सिद्धान्त के पात्र हो, इससे उपदेश करता हूँ ।
जो पुरुष राग-द्वेष सहित क्रिया में स्थित है और जिसकी इन्द्रियों के सुख से आसक्ति है, वह सिद्धान्त के वाक्य "अहं ब्रह्मास्मि" और "सर्वंब्रह्म" को सुनकर भोगों में स्थित होता है और अधोगति पाता है, क्योंकि उसको निश्चय नहीं होता और उसका हृदय मलिन है । इससे इन्द्रियों के सुख से वह अपने को सुखी मानता है और नीच स्थानों को प्राप्त होता है । जो पुरुष क्षमा आदिक साधनों से पवित्र हुआ है, उसको "अहं ब्रह्मास्मि" और "सर्वं ब्रह्म" के सुनने से शीघ्र ही भावना में आत्मपद की प्राप्ति होती है । तुम जैसे पुरुष, जो क्षमा आदि साधनों से पवित्र हुए हैं, उनको स्वरूप की प्राप्ति सुगम होती है । और जिनका
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
अन्तःकरण मलिन है, उनको वह बहुत कठिन है। जैसे भुने बीज को पृथ्वी में बोइये तो उसका अंकुर नहीं उगता, वैसे ही इन्द्रियारामी पुरुष को आत्मा की प्राप्ति नहीं होती। तुम सरीखे जिनका हृदय शुद्ध है, उनको ज्ञान की प्राप्ति होती है। वे ही इन वचनों को पाकर सोहते हैं। जैसे वर्षाकाल में धान पृथ्वी में वर्षा से शोभा पाते हैं, वैसे ही सिद्धान्त के वचनों को पाकर व ज्ञानरूपी दीपक मे प्रकाशित होते हैं। जिन्हें ज्ञानवान् पुरुष ऊँची बाँह करके कहते हैं और सब शास्त्र भी कहते हैं, उन सब शास्त्रों के सिद्धान्तों को और उनके दृष्टान्तों को मैं जानता हूँ। इससे सब सिद्धान्तों का सार कहता हूँ, तुम सुनो। तब अपने स्वरूप को जानोगे।
हे राम! जिसको अभ्यास से एक क्षण भी अपने रूप का साक्षात्कार हुआ है, वह फिर गर्भ में नहीं आता। उसको सत्-असत् में कुछ भेद नहीं होता। संवेदन में भेद होता है। जैसे जाग्रत् और स्वप्न के सूर्य के दोनों प्रकाश समान हैं; जाग्रत् में जाग्रत् सूर्य का प्रकाश अर्थाकार होता है और स्वप्न में स्वप्न का सूर्य अर्थाकार होता है, पर प्रकाश दोनों का सम और संवित् भिन्न है। मनुष्य स्वप्न को मिथ्या और जाग्रत् को सत् जानता है तो संवेदन में भेद हुआ, स्वरूप से भेद कुछ न हुआ। जैसे मन में एक बड़ा पर्वत रचिये तो संकल्प से दीखता है और एक पर्वत बाहर प्रत्यक्ष दीखता है तो संवित् का भेद हुआ; स्वरूप दोनों का तुल्य है। जैसे समुद्र में तरङ्ग है तो स्वरूप से जल और तरङ्गों का भेद कुछ नहीं, पर जिसको जल का ज्ञान नहीं, वह जल से अलग तरङ्ग ही जानता है, इससे संवित् में भेद है। वैसे ही स्वरूप में सत्-असत् तुल्य हैं। वास्तव में कुछ भेद नहीं। केवल शान्तरूप आत्मा है। शब्द का अर्थ संवेदन में है। शब्द अर्थात् नाम और अर्थ याने नामी संवेदन (स्फुरण) से है। जब संवेदन नष्ट हो जायगा, तब सब अर्थ भी आत्मा ही भासित होगा। जगत् की सत्ता तब तक है, जब तक आत्मा का प्रमाद है, और प्रमाद तब तक है, जब तक अहंभाव है। जब अहंभाव नष्ट होगा, तब केवल
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आत्मा शेष रहेगा । आत्मा शुद्ध, विद्या-अविद्या के कार्य से रहित और कभी अविद्या या माया को स्पर्श नहीं करता । हे राम ! अविद्या की दो शक्तियाँ हैं; एक आवरण और दूसरी विक्षेप । आत्मा के न जानने का नाम आवरण है, और कुछ जानने को विक्षेप कहते हैं । वह आत्मा सदा ज्ञानरूप है, उसको आवरण कभी नहीं होता । वह अद्वैत है, उसमें कुछ भिन्न नहीं बना-इसी से वह शुद्ध, केवल और ज्ञानमात्र है । हे राम ! वह आत्ममात्र और चिन्मात्र है । उसमें अहं का उत्थान नहीं, केवल निर्वाणपद है । वहाँ एक और द्वैत कहना भी नहीं है । वह केवल अपने आपमें स्थित है । उसमें कल्पनारूपी धूल कहाँ से हो ?
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो सब ब्रह्म है तो मन, बुद्धि आदिक क्या हैं, जिनमें आप यह शास्त्र का उपदेश करते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! व्यवहार के अर्थ शब्द हैं; परमार्थ में कोई कल्पना नहीं । ये मन, बुद्धि आदिक कुछ वस्तु नहीं; ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जैसे तरङ्ग जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही मन आदि हैं । आत्मतत्त्व नित्य, शुद्ध और सन्मात्र है; नाहं की नाईं स्थित है । हे राम ! ऐसे आत्मा में संसार, अविद्या आदिक नाम कैसे हों ? आत्मा ब्रह्म है, उसमें भिन्न कुछ नहीं । वह सबका अधिष्ठान, अविनाशी और देशकाल-वस्तु के परिच्छेद से रहित है । इसी से ब्रह्म है । हे राम ! ऐसा जो अपना आप आत्मा है, उसी में स्थित होओ । यह जगत् जो देख पड़ता है, वह चिदाकाश है, भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न में जो विश्व दीखता है, सो अनुभवमात्र है; वैसे ही यह जाग्रत विश्व भी आत्मरूप है । ऐसा जो तुम्हारा शुद्ध, नित्य उदित और अविनाशिरूप है, उसमें जब स्थित होगे, तब कल्पना जो तुमको भासित होती है वह नष्ट हो जायगी ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे कल्पनानिषेधो नाम त्रिनवतितमसर्गः ॥ ६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! संसार का बीज अहंकार है । जब अहं-भाव होता है, तब संसार होता है । पर अहंकार वस्तु कुछ नहीं, भ्रम
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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मे सिद्ध हुआ है। जैसे मूर्ख बालक परछाहीं में पिशाच की कल्पना करता है; पर पिशाच कुछ वस्तु नहीं, उसके भ्रम से होता है, वैसे ही अहंकार कुछ वस्तु नहीं, स्वरूप के भ्रम से होता है। हे राम! जो वास्तव में कुछ वस्तु नहीं तो उसके त्यागने में क्या कठिनाई है? तुममें अहंकार वास्तव में नहीं है, तुम केवल शान्तरूप चैतन्यमात्र हो। उसमें अहंभाव होना उपाधि है। उससे सुमेरु पर्वत आदि जगत बन जाता है, जो संवेदनरूप है। चित्तरूपी पुरुष चैतन्य के आश्रय से चेतता है और विश्व की कल्पना करता है। जैसे रस्सी के आश्रय सर्प दीखता है, वैसे ही चैतन्य के आश्रय विश्व और चित्त का उदय होता है। पर ये आत्मा से भिन्न नहीं। 'मैं हूँ' ऐसा जो अहंभाव है, सो दुःख की खान है। सब आपदाएँ अहंकार से होती हैं। जब अहंकार नष्ट होगा, तब सब दुःख भी नष्ट होंगे। हे राम! जैसे सूर्य के आगे बादल होते हैं तो प्रकाश नहीं होता। जब बादल दूर होते हैं, तब प्रकाश भासित होता है और कमल प्रफुल्लित होते हैं। वैसे ही आत्मरूपी सूर्य को अहंकाररूपी बादल का आवरण हुआ है। माया के किसी गुण में मिलकर अपने को कुछ मानने को अहंकार कहते हैं। जब अहंकार रूपी बादल नष्ट होगा, तब आत्मरूपी सूर्य का प्रकाश होगा, और ज्ञानवानरूपी कमल उस प्रकाश को पाकर बड़े आनन्द को प्राप्त होंगे।
हे राम! इसमें अहंकार के नाश का उपाय करो तो तुम्हारे दुःख नष्ट हो जावें। वह कौन काम है, जो उपाय करने से सिद्ध नहीं होता? अहंकार के नाश का उपाय करिये तो वह भी नष्ट हो जाता है। अहंकार के नष्ट करने का यह सरल उपाय है कि मन शास्त्रों अर्थात् ब्रह्मविद्या का सतत अभ्यास और सत्संग करे। ज्ञान की परस्पर चर्चा करने से अहंकार नष्ट हो जाता है। जैसे पानी भरने की रस्सी से पत्थर की शिला घिस जाती है, वैसे ही ब्रह्मविद्या के अभ्यास से अहंकार नष्ट होता है। बल्कि शिला के घिसने में तो कुछ यत्न भी है, पर अहंकार के त्यागने में कुछ यत्न नहीं। हे राम! सदा अनुभवरूप जो आत्मा है, उसका विचार करो में कौन हूँ? इन्द्रियाँ क्या हैं?
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गुण क्या है और संसार क्या है ? ऐसे विचार से समझो कि तुम इनके साक्षीभूत हो, तुममें 'अहं'-त्व कोई नहीं। इससे तुम अहंकार का नाश करो और शुद्ध हो। मेरा भी आशीर्वाद है कि तुम सुखी हो जाओ। जब अहंकार नष्ट होगा, तब कल्पना कोई न फुरेगी, केवल सुषुप्ति की नाईं स्थित होगे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आपका अहंकार नष्ट हुआ है तो प्रत्यक्ष उपदेश करते कैसे दिखते हो और जो अहंकार नहीं है तो सर्वशास्त्र और ब्रह्मविद्या कहाँ से उपजे हैं और उपदेश कैसे होता है ? उपदेश में तो चारों अन्तःकरण सिद्ध होते हैं। प्रथम जब उपदेश करने की इच्छा होती है, तब अहंकार सिद्ध होता है। तब स्मरण होता है कि उपदेश करूँ, तब चित्त भी चैत्य से सिद्ध होता है। फिर यह उपदेश करिये, यह न करिये, ऐसे संकल्प से मन की सिद्धि होती है। फिर जब निश्चय किया कि यह उपदेश करिये, तब बुद्धि की सिद्धि होती है। इससे चारों अन्तःकरण सिद्ध होते हैं। आप कैसे कहते हैं कि अहंकार नष्ट हो जाता है और सब चेष्टाएँ होती हैं ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मस्वरूप में अहंकार आदि अन्तःकरण और इन्द्रियाँ कल्पित हैं, वास्तव में कुछ नहीं। शास्त्र का उपदेश भी कल्पना है। आत्मा केवल आत्मतत्त्वमात्र है। उसमें संवेदन करके अहं-कार आदिक दृश्य उपजे हैं। उनके निवृत्त करने को वृत्त होते हैं। जैसे रज्जू में भ्रम से सर्प दिखता है तो उसके भय से आदमी दुःख पाता है, पर जब कोई कहे कि यह सर्प नहीं, रज्जू है, तू भय मत कर; इसको भली प्रकार देख, तो उसके उपदेश से वह भली प्रकार देखता है; तब उसका भय और शोक निवृत्त हो जाता है, क्योंकि इसको भ्रम से सर्प का भान हुआ था। वह भान भी मिथ्या है और उसकी रज्जू का उपदेश करना भी मिथ्या है; क्योंकि रज्जू तो आगे से सिद्ध है, उपदेश से सिद्ध नहीं होता । ऐसे ही रज्जू की भाँति आत्मा है ! उसका विक्षेप जो चेतनरूप स्फुरण है, उसको अहंभाव कहते हैं, और उसी अहंकार के निवृत्त करने को शास्त्र है। आत्मरूपी रज्जू के अज्ञान से अहंकाररूपी सर्प प्रकट हुआ है और उसके निवृत्त करने को
❉ निर्वाण प्रकरण ❉ २८७
शास्त्र के उपदेश हुए हैं, जो आत्मा को जगा देते हैं । जब भली प्रकार- रश्मी की तरह- आत्मा को जाना, तब सर्प के सदृश जो परिच्छिन्न अहंकार है, वह नष्ट हो जाता है । जैसे नेत्र का मल जब अञ्जन के लगाने में नष्ट हो जाता है, तब नेत्र ज्यों के त्यों निर्मल होते हैं, वैसे ही अज्ञानरूपी मैल गुरु और शास्त्र के उपदेशरूपी सुरमे से नष्ट हो जाता है । वास्तव में न कोई अहंकार है और न शास्त्र है; क्योंकि आत्मा सर्वदा सब समय उदयरूप है । परन्तु तो भी गुरु और शास्त्र से जाना जाता है ।
हे राम ! ज्ञानवान् के साथ चारों अन्तःकरण और इन्द्रियाँ भी देख पड़ती हैं, पर उनमें सत्यता नहीं होती । जैसे भुना हुआ बीज दिखाई देता है, पर उगने की सत्यता नहीं रखता, जैसे जला वस्त्र देखनेमात्र को है, पर उसमें सत्यता कुछ नहीं होती; वैसे ही ज्ञानवान को अभि- लाषारूप अहंकार नहीं होता और उससे वह कष्ट नहीं पाता । जैसे सूर्य की किरणों से मरुस्थल में जलाभास होता है और उसको देखकर पीने के लिए मृग दौड़ता और दुःखी होता है, वैसे ही दृश्यरूपी मरुस्थल में पदार्थरूपी जलाभास को देखकर अज्ञानरूपी मृग दौड़ते हैं और दुःख पाते हैं । जब ज्ञानरूपी वर्षा से आत्मरूपी जल चढ़ा, तब चित्तरूपी मृग कहाँ दौड़े ? जब ज्ञानरूपी वर्षा होती है और अनुभवरूपी जल चढ़ता है, तब चित्तरूपी मृग में यहरूपी जो स्फुरण था, वह नष्ट हो जाता है । हे राम ! अहंकार अविचार से सिद्ध है और विचार से क्षीण हो जाता है । जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों से क्षीण होती है और जब अधिक तेज होता है तब जलरूप हो जाती है, बर्फ की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही अहंकाररूपी बर्फ विचाररूपी किरणों से क्षीण हो जाती है । जब दृढ़ विचार होता है, तब अहंकार-संज्ञा नष्ट हो जाती है और केवल आत्मा ही रहती है । राम ने पूछा; हे सर्वतत्त्वज्ञ भगवन् ! जिनका अहंकार नष्ट होता है, उनका लक्षण क्या है, सो कहिये ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानरूपी गढ़ा संसार है, उसमें पदार्थ की सत् भावना से वह नहीं गिरता, जिसका अहंकार नष्ट हो जाता है । जैसे समुद्र में नदियाँ स्वाभाविक रूप से आकर मिलती हैं, वैसे ही
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# * योगवाशिष्ठ *
उसको क्षमा, शान्ति आदिक शुभगुण स्वाभाविकरूप से प्राप्त होते हैं। उसका क्रोध भी नष्ट हो जाता है और देखनेमात्र यदि भासता भी है तो अर्थकार नहीं होता; विषमता करके भिन्न भावना हृदय में नहीं स्फुरती और केवल सत्तासमान में स्थित होता है। जैसे शरदकाल का मेघ गर्जता है; पर वर्षा से रहित होता है वैसे ही इन्द्रियों की चेष्टा वह अभिमान से रहित होकर करता है। जैसे वर्षाऋतु के जाने से कुदिग नहीं रहता, वैसे ही उसकी अभिमान चेष्टा नष्ट हो जाती है और लोभ भी मन से जाता रहता है। जैसे वन में अग्नि लगती है तो मृग और पक्षी उस वन को त्याग जाते हैं, वैसे ही लोभरूपी मृग उसको त्याग जाते हैं और उसके मन में कोई कामना नहीं रहती। जैसे दिन में उल्लूक और पिशाच नहीं विचरते, वैसे ही जहाँ ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है वहाँ सम्पूर्ण कामनारूपी तम नष्ट हो जाता है और शान्तरूप आत्मा में स्थित रहता है। जैसे मजदूर दो पोटों को ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप में उठाता है और गर्मी से थकता है तो उसको डालके वृक्ष के नीचे सुख में स्थित होता है, वैसे ही वासनारूपी पोट है और अज्ञानरूपी धूप है उसमें दुःखी होता है; पर ज्ञानरूपी यत्न करके वासनारूपी पोट को डाल कर सुख में स्थित होता है।
हे रामजी! उस पुरुष की भोगवासना नष्ट हो जाती है और फिर उसे दुःख नहीं देती। जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भागता है और फिर निकट नहीं आता, वैसे ही ज्ञानरूपी गरुड़ को देखकर भोगरूपी सर्प भागते हैं और फिर निकट नहीं आते। आत्मपद को पाकर ज्ञानी शान्तिरूपी दीपकवत् प्रकाशवान् होता है और भाव-अभाव पदार्थ उसको स्पर्श नहीं करते और संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है। ज्ञान समझनेमात्र है, कुछ यत्न नहीं। सन्तों के पास जाकर प्रश्न करना कि मैं कौन हूँ? जगत् क्या है? परमात्मा क्या है? भोग क्या है? और इनसे मुक्त होकर कैसे परमपद को प्राप्त होऊँ। फिर जो ज्ञानवान् उपदेश करे, उसके अभ्यास से आत्मपद को प्राप्त होगा, अन्यथा न होगा।
इति श्री० नि० सन्तलक्षण माहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्णवतितमस्सर्गः ॥४४॥
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २८६
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिस प्रकार तुम्हारे पूर्वज इक्ष्वाकुनामक बड़े राजा जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं, वैसे ही तुम भी विचरोगे; क्योंकि तुम भी उसी कुल में उपजे हो। हे राम! वह सब राजाओं में श्रेष्ठ सूर्यवंशी इक्ष्वाकु राजा मनु का पुत्र और सूर्य का पौत्र था। जैसे पितरों का राजा धर्म है। उसका स्वभाव शीतल था। जैसे सूर्य को देखकर मणि में तेज प्रकट होता है, वैसे ही उसको देखकर शत्रु संतप्त होते थे। पर साधु, मित्र और प्रजा को वह रमणीय लगता था और वे सब उसको देखकर शान्ति पाते थे। जैसे चन्द्रमा को देखकर चन्द्रमुखी कुमुद प्रसन्न होते हैं, वैसे ही उसको देखकर सब प्रसन्न होते थे। वह पापरूपी वृक्षों का काटनेवाला कुल्हाड़ा और मित्रों को सुखदायक था—जैसे मोरों को मेघ सुखदायक होता है। सुन्दर वह ऐसा था कि उसको देख-कर उसके पास लक्ष्मी स्थिर हो रही थी। उसके यश से सम्पूर्ण पृथ्वी भर रही थी। वह राजा भली प्रकार प्रजा का पालन करता था। एक समय उसके मन में विचार उपजा कि संसार में जग, मरण आदि बड़े कष्ट हैं। इस संसार-दुःख के तरने का क्या उपाय है।
ऐसे वह विचार रहा था कि इतने में शम्भु मुनि ब्रह्मलोक से आये। उसने उनका भली प्रकार पूजन करके पूछा, हे भगवन्! आपकी कृपा का प्रताप मेरे हृदय में बैठकर प्रश्न करने को प्रेरित करता है, इससे मैं प्रश्न करता हूँ। हे भगवन्! मेरे हृदय में संसार बलता है और जैसे समुद्र को बड़वाग्नि जलाती है, वैसे ही मुझको जलाता है। इससे आप वही उपाय कहिये, जिससे मुझको शान्ति हो। हे भगवन्! यह संसार कहाँ से उपजा; दृश्य का स्वरूप क्या है और वह कैसे निवृत्त होता है? जैसे जाल से पक्षी निकल जाता है, वैसे ही जन्म, मरणरूप संसार महाजाल से मैं निकलना चाहता हूँ। जैसे वरुण समुद्र के सब स्थान जानता है, वैसे ही तुम जगत् के सब व्यवहारों को जानते हो और संशय के निवृत्त करनेवाले हो। अज्ञानरूपी तम के नाशकर्ता तुम सूर्य हो; तुम्हारे अमृतरूपी वचनों से मैं शान्ति को प्राप्त हूँगा। मुनि बोले हे साधो! मैं चिरकाल पर्यन्त जगत् में विचरता रहा हूँ, परन्तु ऐसा प्रश्न
२६० * योगवाशिष्ठ *
मुझसे किसी ने नहीं किया । तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है ? यह प्रश्न अनर्थ का नाश करनेवाला है । तेरी बुद्धि विवेक में विकासमान हुई देख पडती है । हे राजन् ! जो कुछ जगत तुमको भासित होता है, सो सब असत है । जैसे रस्सी में सर्प, स्वप्न में गन्धर्वनगर, मरुस्थल में जल, सीपी में रूपा, आकाश में नीलापन और दूसरा चन्द्रमा भ्रम में दिखते हैं, वैसे ही यह जगत असतरूप है; जैसे जल में चक्र और तरङ्ग असतरूप हैं, वैसे ही जगत असतरूप है । जो मन सहित षट् इन्द्रियों से अतीत है और शून्य भी नहीं, सो मन और अविनाशी आत्मा कहलाता है । वह निर्मल परब्रह्म सर्व ओर से पूर्ण और अनन्त है, उसी में जगत कल्पित है ।
हे राजन् ! जैसे सब वृक्षों में एक ही रस व्यापक है, वैसे ही सब पदार्थों में एक चिन्मात्रसत्ता व्यापक है । जैसे अचल समुद्र में द्रवता से तरंग उठते हैं, वैसे ही परमात्मा में जगत प्रकट होते हैं । उस महादर्पण में सब वस्तुएँ प्रतिबिम्बित होती हैं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले, चक्रादिक होते हैं; वैसे ही आत्मा में जीवादिक का आभास होता है । प्रथम स्फुरणरूप होते हैं और पीछे कारणकार्यरूप होते हैं । चित्तशक्ति अपने संकल्प से भूतादिक देह रचती है, उसमें स्वरूप के प्रमाद से आत्मा अभिमान करता है । जैसे कुमवारी की क्रिया अपने बन्धन का कारण होती है, वैसे ही जीव को अपना संकल्प बन्धन का कारण होता है । हे राजन् ! जीवकला को स्वरूप का अज्ञान हुआ है । इससे जैसे बालक को अपनी परछाईं यक्षरूप होकर डराती है, वैसे ही यह नाना प्रकार के आरम्भ को प्राप्त हुआ है, और अकारण ही ब्रह्मशक्ति फुरने से कारणभाव को प्राप्त हुआ है । उसमें बन्धन और मोक्ष भासित होते हैं । पर वास्तव में न बन्धन है और न मोक्ष है । निरामय ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । उसमें एक और अनेक कुछ नहीं कह सकते । इससे बन्धन-मोक्ष की कल्पना को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।
इति श्रीयो० नि० इक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चनवतितमस्सर्गः ॥९५॥
* निर्वाण प्रकरण * २६१
मुनि बोले, हे राजन्! जैसे द्रवता से जल ही तरंगभाव को प्राप्त होता है, तैसे ही चिन्मात्र ही संकल्प के स्फुरण से जीव होता है। और वह जीव संसार में कर्मों के वश भ्रमता हुआ भी अपने को कर्ता देखता है। पर सर्वात्मा परब्रह्म करता हुआ कुछ नहीं करता। जैसे सूर्य के प्रकाश से सब चेष्टाएँ होती हैं, पर सूर्य अकर्ता है, तैसे ही आत्मा की शक्ति से जगत् चेष्टा करता है। जैसे चुम्बक पत्थर के निकट लोहा चेष्टा करता है, तैसे ही आत्मा की चेतनता से सब देहादिक चेष्टा करते हैं। पर आत्मा सदा अकर्ता है। जैसे जल में तरंग उठते हैं, तैसे ही आत्मा में देहादिक प्रकट होते हैं। जैसे सुवर्ण में भूषणों की कल्पना होती है, तैसे ही आत्मा में मोह से सुख-दुःख कल्पित होते हैं, पर आत्मा में कुछ कल्पना नहीं। शुद्ध आत्मा में मूढ़ों ने सुख-दुःख की कल्पना की है। पर जो ज्ञानवान् हैं, उनको मन, चित्त, सुख-दुःख सब आकाशरूप शून्य हैं। वे देह से रहित केवल चिदाकाशभाव को नहीं प्राप्त होते हैं। वे जरा-मरण को नहीं प्राप्त होते और सब कार्य करते देख पड़ते हैं, पर हृदय से सदा अकर्तारूप हैं। जैसे जल और दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब पड़ता है, परन्तु उसे स्पर्श नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् को क्रिया नहीं स्पर्श करती। शरीर के व्यवहार में भी वह सदा निर्मल है।
हे राजन्! आत्मा स्थिररूप है, परन्तु भ्रम से चञ्चल भासित होता है। जैसे जल की चञ्चलता से पर्वत का प्रतिबिम्ब भी चञ्चल होता है, तैसे ही देहादिक से आत्मा चलता भासित होता है। पर आत्मा नित्य शुद्ध और अपने आपमें स्थित है। जैसे घट के नाश से मिट्टी का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे शुद्ध मणि में नाना प्रकार के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं, पर उनमें वह रञ्जित नहीं होती, तैसे ही आत्मा में मन, इन्द्रियाँ और देह दिखते हैं, पर उसे स्पर्श नहीं करते। जैसे सब मिष्ट पदार्थों में एक ही मिठाई व्यापी है तैसे ही सब पदार्थों में एक आत्मसत्ता व्यापी है। हे राजन्! आत्मा सदा अचलरूप है। परन्तु अज्ञान से चलरूप भासित होता है। जैसे दौड़ते हुए बालक को सूर्य दौड़ता लगता है, तैसे
२४२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
आत्मा देह संग में अज्ञानवश विकारवान भासित होता है । जैसे प्रतिबिम्ब का विकार आदर्श को नहीं स्पर्श करता, वैसे ही देह का विकार आत्मा को नहीं स्पर्श करता । जैसे अग्नि में सुवर्ण डालिये तो मैल जल जाता है, पर सुवर्ण का नाश नहीं होता, वैसे ही देह के नाश में आत्मा का नाश नहीं होता । वह तो नित्य शुद्ध, अवाच्य और अचिन्त्यरूप है ।
हे राजन् ! वह देखने में नहीं आता, परन्तु चेतनवृत्ति से सब देखता है । जैसे राहु अदृष्ट है, परन्तु चन्द्रमा के संयोग से दिखता है, वैसे ही आत्मा अदृष्ट है, परन्तु चेतनवृत्ति से जाना जाता है । जैसे शुद्ध दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही निर्मल बुद्धि से आत्मा का साक्षात्कार होता है । वह संकल्प से रहित अपने आपमें स्थित है ! जब बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने में आप उसको पाती है । हे राजन् ! जब तक अपनी बुद्धि निर्मल न हो, तब तक शास्त्र और गुरु से ईश्वर नहीं मिलता । जब अपनी बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने आप वह दिखता है । जब संसार की सत्यता हृदय से दूर हो और आत्मा का अभ्यास हो तब बुद्धि निर्मल होती है । हे राजन् ! सब भाव-अभावरूप जो देहादिक पदार्थ हैं, वे असत् और केवल भ्रममात्र हैं । उनकी आस्था का त्याग करो । जैसे कोई मार्ग में चलता है तो अनेक पदार्थ मिलते हैं, परन्तु उनमें वह कुछ रागद्वेष नहीं करता, वैसे ही देह और इन्द्रियों के स्नेह से रहित आत्मतत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है । उसमें देहादिक इन्द्रजाल की तरह मिथ्या है । उनकी भावना दूर से त्यागकर नित्य आत्मा में स्थित होओ ।
हे राजन् ! जीव आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु भी है, क्योंकि आत्मा में ओर का सद्भाव नहीं-आत्मा में आत्मा का ही भाव है-द्वैत नहीं । जो दृश्य पदार्थ और अनात्मधर्म विषय से खींचकर चित्त को अपने रूप में स्थित करता है, वह अपना मित्र है । और जो अनात्मधर्म में पदार्थों की ओर चित्त लगाता है, वह अपना शत्रु है । वास्तव में जो कुछ दृश्य प्रपंच है, वह भी आत्मरूप है । आत्मा में
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २६३
भिन्न कोई वस्तु नहीं। जैसे समुद्र में जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, सब जल ही जल है, वैसे ही आत्मा से भिन्न जगत् कोई वस्तु नहीं—सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त एक आत्मसत्ता ही स्थित है। जैसे अनेक घटों के जल में एक ही सूर्य का प्रकाश प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही अनेक देहों में एक ही आत्मा व्याप रहा है। वह न अस्त होता है और न उदय होता है; सदा एकरस अविनाशी पुरुष ज्यों का त्यों स्थित है। उसमें अहंभावना से संसार भासित होता है। जैसे सीपी में चाँदी की बुद्धि होती है वैसे ही आत्मा में अहंबुद्धि संसार का कारण है। जीव इसी बुद्धि से सब दुःखों का भागी होता है। जैसे वर्षाकाल में सब नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही अनात्म के अभिमान से सब आपदाएँ प्राप्त होती हैं। वास्तव में चिन्मात्र ब्रह्म और जीव में रञ्चक भी भेद नहीं। दोनों एक रूप ही हैं। ऐसी बुद्धि ही बन्धन से मुक्ति का कारण है। आत्मा सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त है। जैसे सूर्य का प्रकाश सब स्थानों में होता है, परन्तु जहाँ शुद्ध जल है वहाँ स्पष्ट दिखता है, वैसे ही आत्मा सब जगह पूर्ण रूप से व्याप्त है, परन्तु शुद्ध बुद्धि में ही भासित होता है। जैसे तरङ्ग और बुलबुलों में जल ही व्याप रहा है, वैसे ही अविनाशी आत्मा सर्वत्र व्यापा है। पर जैसे सुवर्ण में भूषण नहीं, वैसे ही आत्मा में जगत् का अभाव है।
हे राजन् ! यह संसार आत्मा में नहीं है; केवल आत्मा ही है। जो एक वस्तु पात्र की तरह आधार होता है, उसमें दूसरी वस्तु होती है। पर आत्मा तो अद्वैत है, उसमें दूसरी वस्तु संसार कहाँ से हो ? जैसे सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं—वास्तव में कुछ नहीं, वैसे ही आत्मा में संसार अज्ञान से कल्पित है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल चिदाकाश है। जैसे नदियाँ और समुद्र नाममात्र भिन्न हैं, वास्तव में जल ही है, वैसे ही केवल चिदाकाश में विश्व नाममात्र का है। जितने आकार दीखते हैं, उनको काल खा जाता है। जैसे नदियों का भक्षण करके समुद्र नहीं अघाता, वैसे ही पदार्थ-समूहों का काल भक्षण करके नहीं अघाता। हे राजन् ! ऐसे पदार्थों में क्या अभिलाषा करनी है ? कई
२६४ * योगवासिष्ठ *
कोटि प्राणियों की सृष्टि उत्पन्न होती है और उसको काल खा जाता है-कोई पदार्थ काल में मुक्त नहीं होता, जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुल-बुले उपजते हैं और नष्ट हो जाते हैं। इससे तू काल में अतीतपद की भावना कर, जिसमें काल का भी भक्षण कर सके। कैसे भावना करिये और कैसे भक्षण करिये, सो भी सुन। जैसे मन्दराचल ने अगस्त्यमुनि के आने की भावना की है वैसे ही तू भी अपने स्वरूप की भावना कर, तब काल का भक्षण करेगा। जैसे अगस्त्यमुनि ने समुद्र को पी लिया था, वैसे ही आत्मारूपी अगस्त्य कालरूपी समुद्र को खा जायगा।
हे राजन् ! जन्म-मरणादिक विकार भ्रम से है और आत्मा के प्रमाद से भासित होते हैं। जब आत्मा को निश्चय करके जानोगे तब कोई विकार न भासित होगा; क्योंकि ये अज्ञान से रचे हैं-आकाश में कोई विकार नहीं। जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प दिखता है, सो तब तक है, जब तक रस्सी को नहीं जाना, और जब रस्सी को जाना, तब सर्प का भ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही जन्म-मरणादिक विकार आत्मा में तब तक दिखते हैं, जब तक आत्मा को नहीं जाना। जब आत्मा को जानोगे तब सब विकार नष्ट हो जावेंगे। हे राजन् ! विकार से रहित आत्मा तेरा स्वरूप है। उसकी भावना कर, जिसमें तेरे दुःख नष्ट हो जावें। आत्मपद को कहीं खोजने नहीं जाना है; न किसी वस्तु को जानकर ग्रहण करना है कि यह आत्मा है; और न किसी काल की अपेक्षा ही है। आत्मा तेरा अपना स्वरूप है और सर्वदा अनुभवरूप है। तुझसे भिन्न कुछ वस्तु नहीं। तू अपने यथार्थ रूप को जान। आत्मा के न जानने से मनुष्य अपने को दुःखी जानता है। मैं मरूँगा, मैं दरिद्री हूँ, मैं दास हूँ इत्यादि दुःख तब तक होते हैं, जब तक आत्मा को नहीं जाना। जब आत्मा को जानोगे, तब आनन्दरूप हो जाओगे।
जैसे किसी स्त्री की गोद में पुत्र हो और वह स्वप्न में देखे कि बालक मेरे पास नहीं है तो बड़े दुःख को प्राप्त हो और रुदन करने लगे, पर जब स्वप्न से जागे और देखे कि बालक उसकी गोद में है तो बड़े आनन्द को प्राप्त हो और उसके दुःख-शोक नष्ट हो जावें। हे राजन् !
❈ निर्वाण प्रकरण ❈ २६५
वैसे ही तेरा आत्मा तेरे पास और सदा अनुभवरूप है। उसके प्रमाद से तू अपने को दुःखी जानता है। जब अज्ञानरूपी निद्रा से तू जागेगा, तब अपने को जानेगा और तेरे दुःख और शोक नष्ट हो जावेंगे। देह और इन्द्रियादिक जो दृश्य हैं, उनसे मिलकर अपने को यह जानना कि मैं हूँ, यही अज्ञाननिद्रा है। इससे रहित होकर देख, जिसमें आनन्द को प्राप्त हो। ये जो पदार्थ दिखते हैं, सब मिथ्या हैं। जैसे बालक मृत्तिका में राजा, मेना, हाथी और घोड़े की कल्पना करता है, किन्तु वास्तव में उनमें न कोई राजा होता है, न मेना होती है, न कोई हाथी-घोड़ा होता है एक मृत्तिका ही होती है, वैसे ही चित्तरूपी बालक ने आत्मरूपी मृत्तिका में जो राजा और मेना आदिक सम्पूर्ण विश्व की कल्पना की है, सो सब मिथ्या है। हे राजन् ! एक उपाय तुझसे कहता हूँ, उसे कर, जिसमें तेरे दुःख नष्ट हो जावें। एक वस्तु जो 'अहं अभिलाषा सहित वासना है, उसका त्याग कर। फिर जहाँ इच्छा हो वहाँ विचर। तुझे दुःख का स्पर्श न होगा। संकल्प ही उपाधि है और कोई उपाधि नहीं। जैसे जब मणि तृण से ढकी होती है, तब नहीं देख पड़ती और जब तृण दूर करिये तब मणि प्रकट हो जाती है, वैसे ही आत्मारूपी मणि वासनारूपी तृण से ढकी है। जब वासनारूपी तृण दूर कीजिये, तब आत्मारूपी मणि प्रकट हो।
हे राजन् ! जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति से रहित जो आत्मपद है, उसको जब प्राप्त होगा, तब जानेगा कि मैं मुक्त हूँ। तेरा स्वरूप तो केवल आत्मरूप है, उस पद में स्थित हो। वह अजन्मा, नित्य, चैतन्य-मात्र और सबका अपना रूप है। उसी के प्रमाद से दुःख होता है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलौने बनाते हैं और हाथी, घोड़ा आदि उनके नाम कल्पित कर अभिमान करते हैं कि ये मेरे हैं और उनका नाश होने से दुःखी होते हैं, वैसे ही बालकरूप अज्ञानी स्वरूप के प्रमाद में अभिमान करता है कि ये मेरे हैं और मैं इनका हूँ, और उनका नाश होने से दुःखी होता है—यह नहीं जानता कि सत् का नाश नहीं होता। का असत् नाश होने में सत् का नाश मान बैठता है। जैसे घट का
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नाश होने से घटाकाश का नाश मानिये, वैसे ही मूर्खता से दुःख पाता है। हे राजन् ! तू अपनी आत्मा जान। आत्मादिक संज्ञा की शास्त्रों ने उपदेश के लिए कल्पित की है, नहीं तो आत्मा अनिर्वच-नीय पद है। उसमें वाणी की गति नहीं, पर इन्हीं से जाना जाता है, क्योंकि मन और वाणी में भी आत्मसत्ता है; उसी से आत्मादिक संज्ञा सिद्ध होती है। जैसे जितने स्वप्न के पदार्थ हैं; उनमें अनुभवसत्ता है, उससे वे पदार्थ सिद्ध होते हैं, वैसे ही जितनी कुछ अर्थ-संज्ञाएँ हैं, वे सब आत्मा से सिद्ध होती हैं। ऐसा जो तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो जिसमें जरा-मृत्यु आदि दुःख नष्ट हो जावें ।
हे राजन् ! निःस्पन्द होकर देखेगा तो स्पन्दन में भी वही भासित होगा, और स्पन्दन-निःस्पन्दन तुल्य ही जान पड़ेंगे । जो समाधि में होगा अथवा चेष्टा करेगा तो भी तुल्य होंगी। और न समाधि में शान्ति भासित होगी और न चेष्टा में दुःख होगा। दोनों में एकरस रहेगा। हे राजन् ! देना अथवा लेना, यज्ञ, दान आदिक क्रियाएँ, जो कुछ प्राकृत आचार प्राप्त हो, उसकी मर्यादा और शास्त्र की विधि से कर, पर निश्चय आत्मस्वरूप में ही रख। जैसे नट तरह-तरह के स्वाँग भरकर सम्पूर्ण चेष्टाएँ करता है, पर उसमें निश्चय नटत्व ही का रहता है, वैसे ही तू सब चेष्टाएँ कर, पर उसके अभिमान और संकल्प से रहित हो। ग्रहण अथवा त्याग, जो कुछ स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो, उसमें ज्यों का त्यों रह। जब निर्विकल्प होकर अपने स्वरूप को देखेगा, तब उत्थानकाल में भी तुझे आत्मा ही दिखेगा। जैसे जल के जानने से तरङ्ग, फेन, बुलबुले आदि सब जल ही भासित होते हैं, वैसे ही जब तू आत्मा को जानेगा, तब संसार भी आत्मरूप दिखेगा। जो आत्मा को नहीं जानता, उसको जगत् ही दिखता है और उससे वह दुःख पाता है। इससे तू अन्तर्मुख हो और संकल्प को त्यागकर परम निर्वाण अच्युतपद में स्थित हो।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे गजइक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६६ ॥
२६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है, न असत् है, न कोई देश है, न काल है, न कोई पदार्थ है। केवल चैतन्यमात्र गुणातीत है। उसमें न कोई गुण है, न माया है। केवल शान्तरूप आत्मा है।
हे राजन् ! वह शास्त्रों और गुरु के वचनों से पाया जाता है, कोरे तप से नहीं मिलता। केवल अपने आप जाना जाता है, शास्त्रादिक तो लखा देते हैं, परन्तु "यह है" ऐसा कहकर नहीं जनाते। द्रष्टा पुरुष अपने आप जानता है। जैसे नेत्रों में जो सूर्य की ज्योति है, वही सूर्य को देखती है; वैसे ही आत्मा ही आत्मा को देखता है। वह अन्तर्मुख और संकल्प से रहित होकर अपने को आप देखता है। जब संकल्प बहिर्मुख होता है, तब वही दृढ़ होकर स्थित होता है और फिर उसकी भावना होती है। तब संकल्परूप जगत् दृढ़ता से स्थित होता है, तब दुःखदायी होता है। हे राजन् ! जीव को और कोई दुःखदायी नहीं, अपने ही संकल्प से असम्यग्दर्शी दुःखी होता है। सम्यग्दर्शी को जगत् दृष्टिगोचर होने पर भी दुःखदायी नहीं होता। जैसे रम्मी में सर्प की भावना होती है तो भय प्राप्त होता है, फिर जब रम्मी को जान लेने से सर्प का भ्रम दूर होता है, तब भय भी जाता रहता है, वैसे ही पुरुष को जो संसार की भावना होती है, वह दुःखदायी है इससे आत्मा की भावना कर, जिससे तेरे सब दुःख नष्ट हो जावें। हे राजन् ! तू सर्वदा आनन्दरूप और अद्वैत है। तुझमें कोई कल्पना नहीं, तू आत्मस्वरूप है। आत्मा छहों काम, क्रोध आदि विकारों से रहित है। विकार मिथ्या देह के हैं, आत्मा शुद्ध है। आत्मा के प्रमाद से विकार भासित होते हैं। जब तू आत्मा को जानेगा, तब कोई विकार न देख पड़ेगा; क्योंकि आत्मा अद्वैत है।
राजा ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि आत्मा अद्वैत है। जो यह बात है तो पर्वत आदिक विश्व का कैसे भान होता है और पत्थररूप बड़े आकार बन के कहाँ से उपजे हैं ? इसका रूप क्या है, कृपा करके कहो। मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में संसार कोई नहीं। वह सदा शान्तरूप और निराकार है। उसमें स्पन्दन-निःस्पन्द दोनों शक्ति हैं। जब निःस्पन्द शक्ति होती है, तब केवल अद्वैत भासित होता
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है। और जब स्पन्दनशक्ति चेतती है, तब नाना प्रकार के जगत के आकार भासित होते हैं। पर वास्तव में आत्मा ही है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग कुछ और नहीं, वही है, पर पवन के संयोग से तरंग उठते हैं तो भिन्न भिन्न नजर आते हैं; वैसे ही स्फुरणशक्ति से भिन्न-भिन्न अहंकार भासित होते हैं—वास्तव में सब आत्मस्वरूप हैं—इतर कुछ नहीं। जैसे वट के बीज में पत्ते, डाल, फूल और फल अनेक देख पड़ते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता ने जो नाना प्रकार के आकार रखे हैं, वे यद्यपि देख पड़ते हैं, तो भी कुछ बना नहीं, केवल अद्वैत आत्मा ज्यों का त्यों स्थित है। वह सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है। पर्वत आदिक जो विश्व दिखता है, सो सब आत्मा का चमत्कार है। जैसे स्वप्न में पर्वत और वृक्ष आदिक नाना प्रकार के आकारों का जो भान होता है, वह केवल अनुभव है—उससे इतर कुछ नहीं, वैसे ही जाग्रत विश्व भी आत्मा का अनुभवरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं।
इक्ष्वाकु ने पूछा, हे भगवन् ! जो आत्मा सूक्ष्म है तो असतरूप पर्वतादिक स्थूल पदार्थ सत् होकर कैसे देख पड़ते हैं, यह कृपा करके कहो ? मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में अनन्त शक्ति है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं, सब उसी के रूप हैं। जैसे सूर्य की किरण सूर्य से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा की शक्ति आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे पवन में दो शक्तियाँ हैं—स्पन्दन और निःस्पन्द, सो उसी का रूप है—स्पन्दन-शक्ति से प्रकट भासित होता है और निःस्पन्द से प्रकट नहीं भासित होता, वैसे ही आत्मा में भी स्पन्दन तथा निःस्पन्द, दो शक्तियाँ हैं। जब स्पन्दनशक्ति उठती है, तब अहंभाव प्रकट होता है और जब अहं-भाव हुआ, तब चित्त का उदय होता है। अहं ही चित्त है। जब चित्त हुआ तब आकाश की भावना से आकाश बन जाता है। जब स्पर्श की भावना हुई, तब पवन उत्पन्न होता है। रूप की भावना से अग्नि बनती है। जब रस की भावना हुई, तब जल उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार चित्त की कल्पना से तत्त्व उपजे हैं। जब चारों तत्त्व इकट्ठे हुए, तब एक अण्ड बना। और जब दृढ़ संकल्प किया, तब स्वायंभुव मनु उत्पन्न
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हुआ। जब अण्ड फूटा, तब स्वर्ग, मध्य (पृथ्वी) और पाताल, तीन लोक हुए। ये तीनों लोक राजस, सात्त्विक और तामस तीनों गुण हुए। फिर पर्वत आदिक दृश्य पदार्थ हुए।
हे राजन् ! केवल संकल्पमात्र से ही सब हुआ है। जब स्पन्दनशक्ति स्फुरती है, तब ये प्रकार आत्मा में भासित होते हैं, परन्तु वास्तव में कुछ बना नहीं। जैसे समुद्र में फेन और बुलबुले जो उठते हैं, सो जल रूप हैं—जल से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। आदि मनु जो स्वायम्भुव हैं, उनके संकल्प ने आगे मन रचे हैं। इसी प्रकार त्रिगुणमय सृष्टि उत्पन्न होती है, सो केवल संकल्पमात्र है। जब तक चित्त है, तबतक विश्व है; जब चित्तस्फुरण से रहित हुआ, तब शक्ति निःस्पन्द होती है और जब शक्ति निःस्पन्द हुई तब फिर जगत् नहीं दिखाई देता है। हे राजन् ! यह विश्व मन के स्फुरण से है और सत्य की नाईं स्थित हुआ है। मन जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु वह नहीं भासित होता और असत्य की नाईं भासित होता है। वह सत् कैसे असत्य की तरह हुआ है और असत् कैसे मन की तरह हुआ है, यह सुन। सत् जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु सो नहीं भासित होता और असत्य जो परिच्छिन्नरूप देश-काल-वस्तु-परिच्छेद-संयुक्त है, वह मन जैसा भासित हुआ है। जहाँ देखिये, वहाँ दृश्य गुणमय संसार का भान होता है। यह माया महा आश्चर्यरूप है, जिसने सत्य में असत्य की और असत्य में सत्य की प्रतीति कराई है। चित्त के सम्बन्ध से ही संसार भासित होता है; आत्मा में संसार कदापि नहीं है। जब चित्त को स्थित करके देखोगे, तब तुम्हें संसार न भासित होगा।
जैसे गम्भीर जल होता है तो चलता नहीं दीखता, वैसे ही गम्भीर आत्मा में संसार नहीं जाना जाता कि कहाँ जगता है। संसार भी आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, आत्मस्वरूप ही है। जैसे अग्नि की चिनगारी और जल के तरङ्ग अग्नि और जल से भिन्न नहीं अथवा मणि का प्रकाश मणि से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से संसार भिन्न नहीं; केवल आत्मस्वरूप है। ऐसे आत्मा को जानकर शान्ति पाओ।