योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
२७४
- योगवासिष्ठ *
प्रसन्न हुआ । पर जब कुछ काल पाकर वह खाई भी टूट पड़ी-क्योंकि उपजी वस्तु का विनाश होना अवश्य है-तो फिर वह रुदन करने लगा कि मेरा आकाश नष्ट हो गया । जब कुछ काल शोक में बीता, तब उसने एक घट बनाया और घटाकाश की रक्षा करने लगा । कुछ काल में वह घट भी जब नष्ट हो गया, तब उसने एक कुण्ड बनाया और कुण्डाकाश की रक्षा करने लगा । कुछ काल के उपरान्त कुण्ड भी नष्ट हो गया, तब शोकवान् हो उसने एक हवेली बनाई और कहने लगा कि अब मेरा आकाश कहाँ जावेगा में अब इसकी भली प्रकार रक्षा करूँगा । ऐसा विचारकर वह बड़े हर्ष को प्राप्त हुआ । पर जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब वह हवेली भी गिर पड़ी । तब वह दुःख को प्राप्त हो कहने लगा कि हाय ! हाय ! मेरा आकाश नष्ट हो गया और मुझे बड़ा कष्ट हुआ है । हे राम ! आत्मा और आकाश के ज्ञान बिना वह मूर्ख बालक इसी प्रकार दुःख पाता रहा । जो अपने यथार्थ रूप को जानता और आकाश को भी ज्यों का त्यों जानता तो यह कष्ट काहे को पाता ?
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मिथ्यापुरुषाकाशरक्षाकरणं नामैकोननवतितमस्सर्गः ॥ ८९ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह मिथ्यापुरुष कौन था; जिसकी रक्षा करता था, वह आकाश क्या था; और जो गृह, कूप आदिक बनाता था सो क्या थे; यह प्रकट करके कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मिथ्यापुरुष तो अहंकार है, जो संवेदन के चेतने से उपजा है । आकाश चिदाकाश है, उसे वह उपजा जानता है कि में आकाश की रक्षा करूँ । और गृह, घटादिक जो कहे सो विविध देह हैं । उनमें आत्मा अधिष्ठान है, उस आत्मा की रक्षा करने की इच्छा वह मूर्खता से करता है और अपने को नहीं जानता कि मेरा स्वरूप क्या है । उस अपने स्वरूप को न जानने से वह दुःख पाता है । आप मिथ्या है और मिथ्या होकर आकाश को कल्पित कर रखने की इच्छा करता है अर्थात देह में देही के रखने की इच्छा करता है कि वह जीता रहे । पर देह तो काल
* निर्वाण प्रकरण *
२७५
से उपजा है। फिर देह के नष्ट होने से शोकवान् होता है और अपने वास्तव स्वरूप को नहीं जानता, जिसका नाश कदापि नहीं होता। ऐसे विचार से रहित होकर जीव क्लेश पाता है। हे राम ! जिसमें भ्रम उपजा है, वह अधिष्ठान असत् नहीं होता। सबका अपना आप आत्मा है। उसका भी नाश नहीं होता। उसमें मूर्खता से अहंकारादि संसार की जीव कल्पना करता है। अहंकार, मन, जीव, बुद्धि, चित्त, माया प्रकृति और दृश्य आदि सब इसके नाम हैं। पर मिथ्या हैं। इसका अत्यन्त अभाव है। यह न होता ही उदय हुआ है और क्षत्रिय, ब्राह्मण इत्यादि वर्ण और गृहस्थादि आश्रम, मनुष्य, देवता, दैत्य इत्यादि की कल्पना करता है।
हे राम ! यह कभी हुआ ही नहीं, न होगा और न किसी काल में किसी को है। यह केवल अविचार से सिद्ध है, और विचार किये से नहीं रहता। जैसे रस्सी के अज्ञान से जीव सर्प की कल्पना करता है और जानने से अज्ञान नष्ट हो जाता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से अहंकार उदय हुआ है। तुम्हारा स्वरूप आत्मा है, जो प्रकाशरूप, निर्मल, विद्या-अविद्या के कार्यों से रहित, चैतन्यमात्र और निर्विकल्प है। वह ज्यों का त्यों स्थित है, अद्वैत है। परिणाम को कभी नहीं प्राप्त होता। आत्मतत्त्वमात्र है। उसमें संसार और अहंकार कैसे हो ? सम्यक्-दर्शी को आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता और असम्यक्दर्शी को संसार भासित होता है। वह पदार्थों को सत् जानता है, संसार को वास्तव जानता है और अपने वास्तव स्वरूप को नहीं जानता कि मैं कौन हूँ, जिसके जानने से अहंकार नष्ट हो जाता है। जितनी कुछ आपदा है, जिनकी खान अहंकार है। सब ताप अहंकार से ही उत्पन्न होते हैं। इसके नष्ट होने पर जीव अपने स्वरूप में स्थित होता है। यह विश्व भी आत्मा का चमत्कार है—भिन्न नहीं। जैसे समुद्र में पवन से नाना प्रकार के तरङ्ग और सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण जो भासित होते हैं, सो वही सागर और सुवर्ण हैं, उनसे भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से विश्व भिन्न नहीं। सुवर्ण परिणाम से भूषण और समुद्र
२७६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
परिणाम में तरङ्ग होता है। पर आत्मा अच्युत है और परिणाम को नहीं प्राप्त होता। इससे वह समुद्र और सुवर्ण से भी विलक्षण है।
आत्मा में संवेदन से चमत्कारमात्र विश्व भी आत्मस्वरूप है। वह न कभी जन्मता है, न मृत्यु को प्राप्त होता है; न किसी काल में और न किसी के हाथ से वह मरता है, ज्यों का त्यों स्थित है। जन्ममृत्यु तो तब हो जब दूसरा हो, आत्मा तो अद्वैत है। जिसको एक नहीं कह सकते तो दूसरा कहाँ से हो? इससे प्रत्यक् आत्मा अपना अनुभवरूप है। उसमें स्थित हो, जिसमें सब दुःख और ताप नष्ट हो जावें। वह आत्मा शुद्ध और निराकार है। हे राम! जो निराकार और शुद्ध है, उसे किसमें ग्रहण कीजिये, कैसे रक्षा करिये और किसकी सामर्थ्य है कि उसकी रक्षा करे। जैसे घट के नष्ट होने पर घटाकाश नहीं नष्ट होता, वैसे ही देह के नष्ट होने पर देही आत्मा का नाश नहीं होता। आत्म-सत्ता ज्यों की त्यों है और जन्ममरण पुर्यष्टका से भासित होते हैं। जब पुर्यष्टका देह से निकल जाती है, तब मृतक दीखता है और जब पुर्यष्टका से युक्त होता है, तब जीवित दीख पड़ता है। आत्मा सूक्ष्म में सूक्ष्म और स्थूल में स्थूल है। उसका ग्रहण कैसे हो और रक्षा कैसे करिये? स्थूल तो उपदेश के निमित्त कहते हैं। आत्मा तो अनिर्वचनीय और भाव अभावरूप संसार से रहित है। वह सबका अनुभवरूप है। उसमें स्थित होकर अहंकार का त्याग करो और अपने स्वरूप प्रत्यक् आत्मा में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मिथ्यापुरुषोपाख्यान-समाप्तिर्नाम नवतितमस्सर्गः ॥६०॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार आत्मरूप है। जैसे इसकी उत्पत्ति हुई है, सो सुनो। निर्विकल्प शुद्ध आत्मा में चेतन लक्षण मनरूप में स्थित हुआ है और आगे उसने जगत् की कल्पना की है। जैसे समुद्र में तरङ्ग, सुवर्ण में भूषण, रज्जू में सर्प और सूर्य की किरणों में जल का आभास होता है, वैसे ही आत्मा का विवर्त मन है; पर वह आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे जिसको तरङ्ग का ज्ञान है, उसको समुद्र
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ <span style="float:right;">२७७</span>
बुद्धि नहीं होती, वह तरङ्ग को और जानता है; जिसको भूषण का ज्ञान है, वह सुवर्ण नहीं जानता; सर्प के ज्ञान से रज्जू को नहीं जानता, वैसे ही नाना प्रकार के विश्व के ज्ञान से जीव परमात्मा को नहीं जानता। जैसे जिस पुरुष ने समुद्र को जाना है कि जल है, उमको तरङ्ग और बुलबुले भी जल ही भासित होते हैं, जल से भिन्न कुछ नहीं भासित होता; और जिसको रज्जी का ज्ञान हुआ है, उसको सर्पबुद्धि नहीं होती; जिसको सुवर्ण का ज्ञान हुआ है, उसको भूषण-बुद्धि नहीं होती; और जिसको किरणों का ज्ञान हुआ है, उसको जलबुद्धि नहीं होती—ऐसा पुरुष निर्विकल्प है, वैसे ही जिस पुरुष को निर्विकल्प आत्मा का ज्ञान हुआ है, उमको संसार की भावना नहीं होती—ब्रह्म ही भासित होता है। ऐसा जो मुनीश्वर है, वह ज्ञानवान् है।
हे राम ! मन भी आत्मा से भिन्न नहीं। आदि में परमात्मा से 'अहं' 'त्वं' आदिक मन प्रकट हुआ, उममें जो अहंभाव हुआ, वह उत्थान है। बहिर्मुख होने से जीव को अपने निर्विकल्प चिन्मात्र आत्मस्वरूप का प्रमाद हुआ है और उम प्रमाद से आगे विश्व हुआ है। वास्तव में मन भी कभी उदय नहीं हुआ; आत्मस्वरूप होने के कारण उदय हुए की तरह भासित होता है। मन और संसार सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। जो दूसरी वस्तु हो तो सत् अथवा असत् कहिये, पर आत्मा तो अद्वैत ज्यों का त्यों स्थित है और उसका विवर्त मन होकर स्फुरित हुआ है। वही मन कीट है, और वही ब्रह्मा है। फिर ब्रह्मा ने मनोराज्य से स्थावर-जङ्गम सृष्टि रची है। वह सृष्टि न सत्य है और न असत्य। हे राम ! सब प्रपञ्च मन ने रचा है और उसी ने नाना प्रकार के विचार भी रचे हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, जीव आदि सब मन के ही नाम हैं। जब मन नष्ट हो जावे, तब न संसार है और न कोई विकार। यदि मन दृश्य से मिलकर कहे कि में संसार का अन्त लूँ तो कदाचित् अन्त न पावेगा क्योंकि संसरण ( जन्म-मरण ) ही संसार है, तो फिर मंसरण-संयुक्त संसार का अन्त कहाँ ? अन्त लेनेवाला वाणी से आगे उठकर देखता है। जैसे कोई
२७८ योगवाशिष्ठ
पुरुष दौड़ता जाय और कहे कि मैं अपनी परछाहीं का अन्त लूँ कि कहाँ तक जाती है, तो हे राम! जब तक वह पुरुष चला जायगा, तब तक परछाहीं का अन्त नहीं होगा और जब ठहर जायगा, तब परछाहीं का अन्त हो जायगा, वैसे ही जब तक वासना है, तब तक संसार का अन्त नहीं होता और जब वासना नष्ट हो जाती है, तब संसार का भी अन्त होता है और आत्मा ही दृष्टिगोचर होता है और संसार का अत्यन्त अभाव हो जाता है। पर जो स्फूर्ति-संयुक्त देखेगा, तो संसार ही भासित होगा।
हे राम! जिस पदार्थ को मन देखता है, वह पदार्थ पहले कोई नहीं, चित्त के चेतने से उदय होता है। जब चित्त चेता कि यह पदार्थ है, तब आगे पदार्थ हुआ। चित्त यदि स्फूर्ति या वासना से रहित होकर देखे तो कोई पदार्थ नहीं भासित होता, केवल शान्तपद है। हे राम! तुम अहंकार का त्याग करके, इस नाना प्रकार की कल्पना से रहित निर्विकल्प ब्रह्मपद में स्थित हो। अहंकार नामरूपात्मक है और देह तथा वर्णाश्रम में माया से कल्पित है। जब अहंकार से रहित होकर देखोगे, तब केवल सचिदानन्द आत्म-पद शेष रहेगा। और जब उस पद को अपना रूप जानोगे, तब तुमही सर्वात्मा होकर विचरोगे और तुमको कोई दुःख न रहेगा। हे राम! मन ही संसार है। ब्रह्मा से कीट पर्यन्त सब मन की ही रचना है। मन ही सुमेरु है और मन ही तृण है। मन ही विश्वरूप होकर स्थित हुआ है। वह मन भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे फल ही में समूचा वृक्ष होता है, वैसे ही मन आत्मस्वरूप है; आत्मा से भिन्न मन कुछ वस्तु नहीं। ऐसे जानकर आत्मस्वरूप होओगे। यह जो बन्धन और मोक्ष संज्ञा है, इनका त्याग करो, न बन्धन की वाञ्छा करो और न मोक्ष की इच्छा करो। इस कल्पना से रहित हो; ऐसे न सोचो कि तुम मुक्त हो और यह बन्धन है, केवल सत्तासमान आत्मपद में स्थित होओ। वही भावना करो, जिससे तुम्हारा सब दुःख नष्ट हो जाय। ऐसा जो पुरुष हो जाता है, उसका चित्तभाव नहीं रहता। उसको
* निर्वाण प्रकरण *
२७६
सर्वत्रआत्मा देख पड़ता है । जैसे जिस पुरुष ने सूर्य को जाना है, उसको किरणें भी सूर्य ही दीखती हैं, वैसे ही जिसको आत्मा का साक्षात्कार हुआ है, उसको जगत् भी आत्मस्वरूप देख पड़ता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशो- नामैकनवतितमसर्गः ॥ ९१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी होकर रहो और सब शङ्काओं को त्यागकर निरन्तर धैर्य धारण कर स्थित होओ । राम ने पूछा, हे भगवन् ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी किसे कहते हैं, सो कृपा करके कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम्हारे प्रश्न पर एक आख्यान है, सो सुनिये । एक समय सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा के शिखर में सदाशिवजी आये । वह चन्द्रमा को मस्तक में धारण किये थे । गणों सहित गौरी बायें अङ्ग में उनके साथ थीं । तब भृङ्गीगण ने, जो महातेजस्वी था और जिसे आत्म-जिज्ञासा उपजी थी, हाथ जोड़कर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! देवों के देव ! यह संसार मिथ्या भ्रम है; इसमें में सत्य पदार्थ कोई नहीं देखता । यह सदा चलरूप भासित होता है । जो सत् पदार्थ है, उसको मैं नहीं जानता । मेरे ताप नष्ट नहीं हुए और मैं शान्त नहीं हुआ, इसमें अपने को दुःखी देखता हूँ । जिससे शान्ति हो सो कृपा करके कहो, जिसमें खेद से रहित होकर मैं चेष्टा में विचरूँ । पर खेद से रहित तो तब होता है, जब कोई आश्रय होता है । संसार तो मिथ्या है, मैं किसका आश्रय करूँ ? इससे मुझसे यह कहिये कि किसका आश्रय करने से मेरे दुःख नष्ट होंगे ?
ईश्वर बोले, हे भृङ्गिन् ! तुम महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी हो रहो और सब शङ्काओं को त्यागकर निरन्तर धैर्य का आश्रय करो; इससे तुम्हारे दुःख नष्ट होंगे । हे राम ! भृङ्गीगण ने, जिसको शिवजी ने पुत्र करके रखा है, यह सुनकर प्रश्न किया कि हे परम-ेश्वर ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी किसे कहते हैं; सो कृपा करके मुझसे कहिये ? ईश्वर बोले, हे पुत्र ! सर्वात्मा, जो अनुभवरूप
२८० * योगवासिष्ठ *
है, उसका आश्रय करके विचरो। तब दुःख से रहित होगे। इन तीनों वृत्तियों में तुम्हारे दुःख नष्ट हो जायेंगे। जो कुछ शुभ क्रिया आकर प्राप्त हो, उसकी शङ्का त्याग कर जो करे, वह पुरुष महाकर्ता है। धर्म-अधर्म क्रिया जो अनिच्छित प्राप्त हो, उसको रागद्वेष से रहित होकर जो करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुरुष मौनी, निरहंकार, निर्मल और मत्सर से रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जो अनिच्छित प्राप्त हुए का त्याग न करे और जो नहीं प्राप्त हुआ उसकी वाञ्छा न करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुण्य-पाप क्रियाएँ अनिच्छित प्राप्त हों उनको अहंकार से रहित होकर करे, पुण्यक्रिया करने से अपने को पुण्यवान् न माने और पाप करने में पापी न माने; सदा अपने को अकर्ता जाने, वह पुरुष महाकर्ता है जो सर्वत्र विगतस्नेह है, सत्यवत् स्थित है और इच्छा को त्यागकर बरतता है, वह महाकर्ता है। जो दुःख के प्राप्त होने पर शोक नहीं करता और सुख के प्राप्त होने पर जिसे हर्ष नहीं होता, स्वाभाविक चित्त समता को देखता है, वह कभी विषमता को नहीं प्राप्त होता। सुख की भिन्न-भिन्न विषमताओं में जो रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जिस पुरुष ने सुख-दुःख का त्याग किया है वह पुरुष महाकर्ता है।
हे बुद्धिन्! जो पुरुष प्राप्त हुई वस्तु को रागद्वेष से रहित होकर भोगता है, वह महाभोक्ता है। जो बड़ा कष्ट प्राप्त होने पर भी द्वेष नहीं करता और बड़े सुख की प्राप्ति में जिसे हर्ष नहीं होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो बड़े राज्य के सुख भोगने में अपने को सुखी नहीं मानता, राज्य के अभाव में और भिक्षा माँगने में अपने को दुःखी नहीं मानता, सदा स्वरूप में स्थिर रहता है, वह महाभोक्ता है। जो मान, अहंकार और चिन्तना से रहित केवल समता में स्थित है, वह महाभोक्ता है। जो कोई कुछ दे तो अपने को लेनेवाला नहीं मानता और शुभ क्रिया में भोगता हुआ अपने में कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं मानता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो मीठा, खट्टा, कषाय, तीक्ष्ण, सलोना, कटु, इन छहों रसों के भोगने में समचित्त रहता है और सम जानता है, वह महाभोक्ता
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २८१
है। जिसे रसवाले पदार्थ प्राप्त होने पर हर्ष नहीं होता और विरस के प्राप्त होने पर द्वेष नहीं होता, ज्यों का त्यों रहता है, और जैसा बुरा-भला प्राप्त हो उसको दुःख से रहित होकर भोगता है, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो कुछ शुभ-अशुभ, भाव-अभाव क्रियाएँ हैं, उनके सुख-दुःख से जो चलायमान नहीं होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जिसको मृत्यु का भय नहीं और जीने की आस्था नहीं, जो उदय-अस्त में समान है, वह महाभोक्ता है। जिसे बड़े सुख की प्राप्ति में हर्ष नहीं होता और दुःख की प्राप्ति में शोक नहीं होता, ज्यों का त्यों रहता है, वह महाभोक्ता है। जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो उसको करता हुआ अहंकार से रहित है, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो पुरुष शत्रु, मित्र और सुहृद् में समबुद्धि रखता है और विषमता को कभी नहीं प्राप्त होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो कुछ शुभ, अशुभ, दुःख सुख प्राप्त हो, उसको जो धारण कर लेता है, कभी विषमता को नहीं प्राप्त होता—जैसे समुद्र में नदियाँ प्राप्त होती हैं और वह उनको धारण कर सम रहता है—वह ज्ञानवान् शुभ-अशुभ को ग्रहण कर सम रहता है।
जो संसार, देह, इन्द्रियाँ और अहंकार की सत्ता त्यागकर स्थित हुआ है और जानता है कि 'न मैं देह हूँ,' 'न मेरी देह,' मैं इनका साक्षी हूँ, ऐसी वृत्ति को धारण करनेवाला महात्यागी है। जो सब चेष्टा करता है और रागद्वेष से रहित है, वह महात्यागी है। जो प्राप्त हुए शुभ-अशुभ को अहंकार से रहित होकर करता है, वह महात्यागी है। जो मन, इन्द्रिय और देह की भी इच्छा से रहित है, वह सब चेष्टाएँ करने पर भी महात्यागी है। जो पुरुष समचित्त, इन्द्रियजित और क्षमावान् है, वह महात्यागी है। हे राम! जिस पुरुष ने धर्म-अधर्म की देह और संसार के मद, मान, मनन इत्यादिक कल्पना का त्याग किया है, वह महात्यागी है। हे राम! इस प्रकार सदाशिव ने—जो हाथ में खप्पर लिये, बाघम्बर ओढ़े और चन्द्रमा मस्तक में धारे हुए परम प्रकाशरूप हैं—भृङ्गीगण को उपदेश किया। जैसे भृङ्गीगण
२८२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
विचरो, वैसे ही तुम भी विचरो तो तुम्हारे सब दुःख नष्ट होंगे । इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महाकर्ताद्युपदेशो नाम द्विनवतितमसर्गः ॥ ९२ ॥
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आपने जो उपदेश किया, वह मैं समझ गया । आपने पहले उपशम प्रकरण में उपदेश किया था कि आत्मा अनन्त और शुद्ध है । तब मैंने प्रश्न किया था कि जो आत्मा अनन्त और शुद्ध है तो यह कल्पना कैसे उपजी है—जैसे समुद्र निर्मल है उसमें धूल कैसे हो—तब आपने प्रतिज्ञा की थी कि इस प्रश्न का उत्तर सिद्धान्त-काल में कहेंगे । सो में अब सिद्धान्त का पात्र हूँ मुझसे कहिये । जैसे स्त्री भर्त्ता से प्रश्न करती है और भर्त्ता कृपा करके उपदेश करता है, वैसे ही में आपकी शरण हूँ । कृपा करके मुझे उत्तर दीजिये; क्योंकि आशा और तृष्णा के फाँसे मेरे टूटे हैं और आशारूपी जाल से मैं निकल गया हूँ । मेरे हृदय में संशयरूपी धूल उठ रही है । उसको वचनरूपी वर्षा से शान्त करो । मेरे हृदय में अन्धकार है, उसे वचनरूपी क्रीड़ा से निवृत्त करो । आपके वचनरूपी अमृत से में तृप्त नहीं होता । हे भगवन् ! गुरु के उपदेश किये बिना अपने विचार ज्ञान में नहीं शोभते । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष शान्त, क्षमावान् और इन्द्रियजित है, जिसने मन के संकल्प-विकल्प को जीता है, वह सिद्धान्त का पात्र है । हे राम ! तुम अब सिद्धान्त के पात्र हो, इससे उपदेश करता हूँ ।
जो पुरुष राग-द्वेष सहित क्रिया में स्थित है और जिसकी इन्द्रियों के सुख से आसक्ति है, वह सिद्धान्त के वाक्य "अहं ब्रह्मास्मि" और "सर्वंब्रह्म" को सुनकर भोगों में स्थित होता है और अधोगति पाता है, क्योंकि उसको निश्चय नहीं होता और उसका हृदय मलिन है । इससे इन्द्रियों के सुख से वह अपने को सुखी मानता है और नीच स्थानों को प्राप्त होता है । जो पुरुष क्षमा आदिक साधनों से पवित्र हुआ है, उसको "अहं ब्रह्मास्मि" और "सर्वं ब्रह्म" के सुनने से शीघ्र ही भावना में आत्मपद की प्राप्ति होती है । तुम जैसे पुरुष, जो क्षमा आदि साधनों से पवित्र हुए हैं, उनको स्वरूप की प्राप्ति सुगम होती है । और जिनका
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
अन्तःकरण मलिन है, उनको वह बहुत कठिन है। जैसे भुने बीज को पृथ्वी में बोइये तो उसका अंकुर नहीं उगता, वैसे ही इन्द्रियारामी पुरुष को आत्मा की प्राप्ति नहीं होती। तुम सरीखे जिनका हृदय शुद्ध है, उनको ज्ञान की प्राप्ति होती है। वे ही इन वचनों को पाकर सोहते हैं। जैसे वर्षाकाल में धान पृथ्वी में वर्षा से शोभा पाते हैं, वैसे ही सिद्धान्त के वचनों को पाकर व ज्ञानरूपी दीपक मे प्रकाशित होते हैं। जिन्हें ज्ञानवान् पुरुष ऊँची बाँह करके कहते हैं और सब शास्त्र भी कहते हैं, उन सब शास्त्रों के सिद्धान्तों को और उनके दृष्टान्तों को मैं जानता हूँ। इससे सब सिद्धान्तों का सार कहता हूँ, तुम सुनो। तब अपने स्वरूप को जानोगे।
हे राम! जिसको अभ्यास से एक क्षण भी अपने रूप का साक्षात्कार हुआ है, वह फिर गर्भ में नहीं आता। उसको सत्-असत् में कुछ भेद नहीं होता। संवेदन में भेद होता है। जैसे जाग्रत् और स्वप्न के सूर्य के दोनों प्रकाश समान हैं; जाग्रत् में जाग्रत् सूर्य का प्रकाश अर्थाकार होता है और स्वप्न में स्वप्न का सूर्य अर्थाकार होता है, पर प्रकाश दोनों का सम और संवित् भिन्न है। मनुष्य स्वप्न को मिथ्या और जाग्रत् को सत् जानता है तो संवेदन में भेद हुआ, स्वरूप से भेद कुछ न हुआ। जैसे मन में एक बड़ा पर्वत रचिये तो संकल्प से दीखता है और एक पर्वत बाहर प्रत्यक्ष दीखता है तो संवित् का भेद हुआ; स्वरूप दोनों का तुल्य है। जैसे समुद्र में तरङ्ग है तो स्वरूप से जल और तरङ्गों का भेद कुछ नहीं, पर जिसको जल का ज्ञान नहीं, वह जल से अलग तरङ्ग ही जानता है, इससे संवित् में भेद है। वैसे ही स्वरूप में सत्-असत् तुल्य हैं। वास्तव में कुछ भेद नहीं। केवल शान्तरूप आत्मा है। शब्द का अर्थ संवेदन में है। शब्द अर्थात् नाम और अर्थ याने नामी संवेदन (स्फुरण) से है। जब संवेदन नष्ट हो जायगा, तब सब अर्थ भी आत्मा ही भासित होगा। जगत् की सत्ता तब तक है, जब तक आत्मा का प्रमाद है, और प्रमाद तब तक है, जब तक अहंभाव है। जब अहंभाव नष्ट होगा, तब केवल
२८४ ❇ योगवाशिष्ट ❇
आत्मा शेष रहेगा । आत्मा शुद्ध, विद्या-अविद्या के कार्य से रहित और कभी अविद्या या माया को स्पर्श नहीं करता । हे राम ! अविद्या की दो शक्तियाँ हैं; एक आवरण और दूसरी विक्षेप । आत्मा के न जानने का नाम आवरण है, और कुछ जानने को विक्षेप कहते हैं । वह आत्मा सदा ज्ञानरूप है, उसको आवरण कभी नहीं होता । वह अद्वैत है, उसमें कुछ भिन्न नहीं बना-इसी से वह शुद्ध, केवल और ज्ञानमात्र है । हे राम ! वह आत्ममात्र और चिन्मात्र है । उसमें अहं का उत्थान नहीं, केवल निर्वाणपद है । वहाँ एक और द्वैत कहना भी नहीं है । वह केवल अपने आपमें स्थित है । उसमें कल्पनारूपी धूल कहाँ से हो ?
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो सब ब्रह्म है तो मन, बुद्धि आदिक क्या हैं, जिनमें आप यह शास्त्र का उपदेश करते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! व्यवहार के अर्थ शब्द हैं; परमार्थ में कोई कल्पना नहीं । ये मन, बुद्धि आदिक कुछ वस्तु नहीं; ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जैसे तरङ्ग जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही मन आदि हैं । आत्मतत्त्व नित्य, शुद्ध और सन्मात्र है; नाहं की नाईं स्थित है । हे राम ! ऐसे आत्मा में संसार, अविद्या आदिक नाम कैसे हों ? आत्मा ब्रह्म है, उसमें भिन्न कुछ नहीं । वह सबका अधिष्ठान, अविनाशी और देशकाल-वस्तु के परिच्छेद से रहित है । इसी से ब्रह्म है । हे राम ! ऐसा जो अपना आप आत्मा है, उसी में स्थित होओ । यह जगत् जो देख पड़ता है, वह चिदाकाश है, भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न में जो विश्व दीखता है, सो अनुभवमात्र है; वैसे ही यह जाग्रत विश्व भी आत्मरूप है । ऐसा जो तुम्हारा शुद्ध, नित्य उदित और अविनाशिरूप है, उसमें जब स्थित होगे, तब कल्पना जो तुमको भासित होती है वह नष्ट हो जायगी ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे कल्पनानिषेधो नाम त्रिनवतितमसर्गः ॥ ६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! संसार का बीज अहंकार है । जब अहं-भाव होता है, तब संसार होता है । पर अहंकार वस्तु कुछ नहीं, भ्रम
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
२८५
मे सिद्ध हुआ है। जैसे मूर्ख बालक परछाहीं में पिशाच की कल्पना करता है; पर पिशाच कुछ वस्तु नहीं, उसके भ्रम से होता है, वैसे ही अहंकार कुछ वस्तु नहीं, स्वरूप के भ्रम से होता है। हे राम! जो वास्तव में कुछ वस्तु नहीं तो उसके त्यागने में क्या कठिनाई है? तुममें अहंकार वास्तव में नहीं है, तुम केवल शान्तरूप चैतन्यमात्र हो। उसमें अहंभाव होना उपाधि है। उससे सुमेरु पर्वत आदि जगत बन जाता है, जो संवेदनरूप है। चित्तरूपी पुरुष चैतन्य के आश्रय से चेतता है और विश्व की कल्पना करता है। जैसे रस्सी के आश्रय सर्प दीखता है, वैसे ही चैतन्य के आश्रय विश्व और चित्त का उदय होता है। पर ये आत्मा से भिन्न नहीं। 'मैं हूँ' ऐसा जो अहंभाव है, सो दुःख की खान है। सब आपदाएँ अहंकार से होती हैं। जब अहंकार नष्ट होगा, तब सब दुःख भी नष्ट होंगे। हे राम! जैसे सूर्य के आगे बादल होते हैं तो प्रकाश नहीं होता। जब बादल दूर होते हैं, तब प्रकाश भासित होता है और कमल प्रफुल्लित होते हैं। वैसे ही आत्मरूपी सूर्य को अहंकाररूपी बादल का आवरण हुआ है। माया के किसी गुण में मिलकर अपने को कुछ मानने को अहंकार कहते हैं। जब अहंकार रूपी बादल नष्ट होगा, तब आत्मरूपी सूर्य का प्रकाश होगा, और ज्ञानवानरूपी कमल उस प्रकाश को पाकर बड़े आनन्द को प्राप्त होंगे।
हे राम! इसमें अहंकार के नाश का उपाय करो तो तुम्हारे दुःख नष्ट हो जावें। वह कौन काम है, जो उपाय करने से सिद्ध नहीं होता? अहंकार के नाश का उपाय करिये तो वह भी नष्ट हो जाता है। अहंकार के नष्ट करने का यह सरल उपाय है कि मन शास्त्रों अर्थात् ब्रह्मविद्या का सतत अभ्यास और सत्संग करे। ज्ञान की परस्पर चर्चा करने से अहंकार नष्ट हो जाता है। जैसे पानी भरने की रस्सी से पत्थर की शिला घिस जाती है, वैसे ही ब्रह्मविद्या के अभ्यास से अहंकार नष्ट होता है। बल्कि शिला के घिसने में तो कुछ यत्न भी है, पर अहंकार के त्यागने में कुछ यत्न नहीं। हे राम! सदा अनुभवरूप जो आत्मा है, उसका विचार करो में कौन हूँ? इन्द्रियाँ क्या हैं?
२८६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
गुण क्या है और संसार क्या है ? ऐसे विचार से समझो कि तुम इनके साक्षीभूत हो, तुममें 'अहं'-त्व कोई नहीं। इससे तुम अहंकार का नाश करो और शुद्ध हो। मेरा भी आशीर्वाद है कि तुम सुखी हो जाओ। जब अहंकार नष्ट होगा, तब कल्पना कोई न फुरेगी, केवल सुषुप्ति की नाईं स्थित होगे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आपका अहंकार नष्ट हुआ है तो प्रत्यक्ष उपदेश करते कैसे दिखते हो और जो अहंकार नहीं है तो सर्वशास्त्र और ब्रह्मविद्या कहाँ से उपजे हैं और उपदेश कैसे होता है ? उपदेश में तो चारों अन्तःकरण सिद्ध होते हैं। प्रथम जब उपदेश करने की इच्छा होती है, तब अहंकार सिद्ध होता है। तब स्मरण होता है कि उपदेश करूँ, तब चित्त भी चैत्य से सिद्ध होता है। फिर यह उपदेश करिये, यह न करिये, ऐसे संकल्प से मन की सिद्धि होती है। फिर जब निश्चय किया कि यह उपदेश करिये, तब बुद्धि की सिद्धि होती है। इससे चारों अन्तःकरण सिद्ध होते हैं। आप कैसे कहते हैं कि अहंकार नष्ट हो जाता है और सब चेष्टाएँ होती हैं ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मस्वरूप में अहंकार आदि अन्तःकरण और इन्द्रियाँ कल्पित हैं, वास्तव में कुछ नहीं। शास्त्र का उपदेश भी कल्पना है। आत्मा केवल आत्मतत्त्वमात्र है। उसमें संवेदन करके अहं-कार आदिक दृश्य उपजे हैं। उनके निवृत्त करने को वृत्त होते हैं। जैसे रज्जू में भ्रम से सर्प दिखता है तो उसके भय से आदमी दुःख पाता है, पर जब कोई कहे कि यह सर्प नहीं, रज्जू है, तू भय मत कर; इसको भली प्रकार देख, तो उसके उपदेश से वह भली प्रकार देखता है; तब उसका भय और शोक निवृत्त हो जाता है, क्योंकि इसको भ्रम से सर्प का भान हुआ था। वह भान भी मिथ्या है और उसकी रज्जू का उपदेश करना भी मिथ्या है; क्योंकि रज्जू तो आगे से सिद्ध है, उपदेश से सिद्ध नहीं होता । ऐसे ही रज्जू की भाँति आत्मा है ! उसका विक्षेप जो चेतनरूप स्फुरण है, उसको अहंभाव कहते हैं, और उसी अहंकार के निवृत्त करने को शास्त्र है। आत्मरूपी रज्जू के अज्ञान से अहंकाररूपी सर्प प्रकट हुआ है और उसके निवृत्त करने को
❉ निर्वाण प्रकरण ❉ २८७
शास्त्र के उपदेश हुए हैं, जो आत्मा को जगा देते हैं । जब भली प्रकार- रश्मी की तरह- आत्मा को जाना, तब सर्प के सदृश जो परिच्छिन्न अहंकार है, वह नष्ट हो जाता है । जैसे नेत्र का मल जब अञ्जन के लगाने में नष्ट हो जाता है, तब नेत्र ज्यों के त्यों निर्मल होते हैं, वैसे ही अज्ञानरूपी मैल गुरु और शास्त्र के उपदेशरूपी सुरमे से नष्ट हो जाता है । वास्तव में न कोई अहंकार है और न शास्त्र है; क्योंकि आत्मा सर्वदा सब समय उदयरूप है । परन्तु तो भी गुरु और शास्त्र से जाना जाता है ।
हे राम ! ज्ञानवान् के साथ चारों अन्तःकरण और इन्द्रियाँ भी देख पड़ती हैं, पर उनमें सत्यता नहीं होती । जैसे भुना हुआ बीज दिखाई देता है, पर उगने की सत्यता नहीं रखता, जैसे जला वस्त्र देखनेमात्र को है, पर उसमें सत्यता कुछ नहीं होती; वैसे ही ज्ञानवान को अभि- लाषारूप अहंकार नहीं होता और उससे वह कष्ट नहीं पाता । जैसे सूर्य की किरणों से मरुस्थल में जलाभास होता है और उसको देखकर पीने के लिए मृग दौड़ता और दुःखी होता है, वैसे ही दृश्यरूपी मरुस्थल में पदार्थरूपी जलाभास को देखकर अज्ञानरूपी मृग दौड़ते हैं और दुःख पाते हैं । जब ज्ञानरूपी वर्षा से आत्मरूपी जल चढ़ा, तब चित्तरूपी मृग कहाँ दौड़े ? जब ज्ञानरूपी वर्षा होती है और अनुभवरूपी जल चढ़ता है, तब चित्तरूपी मृग में यहरूपी जो स्फुरण था, वह नष्ट हो जाता है । हे राम ! अहंकार अविचार से सिद्ध है और विचार से क्षीण हो जाता है । जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों से क्षीण होती है और जब अधिक तेज होता है तब जलरूप हो जाती है, बर्फ की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही अहंकाररूपी बर्फ विचाररूपी किरणों से क्षीण हो जाती है । जब दृढ़ विचार होता है, तब अहंकार-संज्ञा नष्ट हो जाती है और केवल आत्मा ही रहती है । राम ने पूछा; हे सर्वतत्त्वज्ञ भगवन् ! जिनका अहंकार नष्ट होता है, उनका लक्षण क्या है, सो कहिये ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानरूपी गढ़ा संसार है, उसमें पदार्थ की सत् भावना से वह नहीं गिरता, जिसका अहंकार नष्ट हो जाता है । जैसे समुद्र में नदियाँ स्वाभाविक रूप से आकर मिलती हैं, वैसे ही
२८८
# * योगवाशिष्ठ *
उसको क्षमा, शान्ति आदिक शुभगुण स्वाभाविकरूप से प्राप्त होते हैं। उसका क्रोध भी नष्ट हो जाता है और देखनेमात्र यदि भासता भी है तो अर्थकार नहीं होता; विषमता करके भिन्न भावना हृदय में नहीं स्फुरती और केवल सत्तासमान में स्थित होता है। जैसे शरदकाल का मेघ गर्जता है; पर वर्षा से रहित होता है वैसे ही इन्द्रियों की चेष्टा वह अभिमान से रहित होकर करता है। जैसे वर्षाऋतु के जाने से कुदिग नहीं रहता, वैसे ही उसकी अभिमान चेष्टा नष्ट हो जाती है और लोभ भी मन से जाता रहता है। जैसे वन में अग्नि लगती है तो मृग और पक्षी उस वन को त्याग जाते हैं, वैसे ही लोभरूपी मृग उसको त्याग जाते हैं और उसके मन में कोई कामना नहीं रहती। जैसे दिन में उल्लूक और पिशाच नहीं विचरते, वैसे ही जहाँ ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है वहाँ सम्पूर्ण कामनारूपी तम नष्ट हो जाता है और शान्तरूप आत्मा में स्थित रहता है। जैसे मजदूर दो पोटों को ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप में उठाता है और गर्मी से थकता है तो उसको डालके वृक्ष के नीचे सुख में स्थित होता है, वैसे ही वासनारूपी पोट है और अज्ञानरूपी धूप है उसमें दुःखी होता है; पर ज्ञानरूपी यत्न करके वासनारूपी पोट को डाल कर सुख में स्थित होता है।
हे रामजी! उस पुरुष की भोगवासना नष्ट हो जाती है और फिर उसे दुःख नहीं देती। जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भागता है और फिर निकट नहीं आता, वैसे ही ज्ञानरूपी गरुड़ को देखकर भोगरूपी सर्प भागते हैं और फिर निकट नहीं आते। आत्मपद को पाकर ज्ञानी शान्तिरूपी दीपकवत् प्रकाशवान् होता है और भाव-अभाव पदार्थ उसको स्पर्श नहीं करते और संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है। ज्ञान समझनेमात्र है, कुछ यत्न नहीं। सन्तों के पास जाकर प्रश्न करना कि मैं कौन हूँ? जगत् क्या है? परमात्मा क्या है? भोग क्या है? और इनसे मुक्त होकर कैसे परमपद को प्राप्त होऊँ। फिर जो ज्ञानवान् उपदेश करे, उसके अभ्यास से आत्मपद को प्राप्त होगा, अन्यथा न होगा।
इति श्री० नि० सन्तलक्षण माहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्णवतितमस्सर्गः ॥४४॥
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २८६
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिस प्रकार तुम्हारे पूर्वज इक्ष्वाकुनामक बड़े राजा जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं, वैसे ही तुम भी विचरोगे; क्योंकि तुम भी उसी कुल में उपजे हो। हे राम! वह सब राजाओं में श्रेष्ठ सूर्यवंशी इक्ष्वाकु राजा मनु का पुत्र और सूर्य का पौत्र था। जैसे पितरों का राजा धर्म है। उसका स्वभाव शीतल था। जैसे सूर्य को देखकर मणि में तेज प्रकट होता है, वैसे ही उसको देखकर शत्रु संतप्त होते थे। पर साधु, मित्र और प्रजा को वह रमणीय लगता था और वे सब उसको देखकर शान्ति पाते थे। जैसे चन्द्रमा को देखकर चन्द्रमुखी कुमुद प्रसन्न होते हैं, वैसे ही उसको देखकर सब प्रसन्न होते थे। वह पापरूपी वृक्षों का काटनेवाला कुल्हाड़ा और मित्रों को सुखदायक था—जैसे मोरों को मेघ सुखदायक होता है। सुन्दर वह ऐसा था कि उसको देख-कर उसके पास लक्ष्मी स्थिर हो रही थी। उसके यश से सम्पूर्ण पृथ्वी भर रही थी। वह राजा भली प्रकार प्रजा का पालन करता था। एक समय उसके मन में विचार उपजा कि संसार में जग, मरण आदि बड़े कष्ट हैं। इस संसार-दुःख के तरने का क्या उपाय है।
ऐसे वह विचार रहा था कि इतने में शम्भु मुनि ब्रह्मलोक से आये। उसने उनका भली प्रकार पूजन करके पूछा, हे भगवन्! आपकी कृपा का प्रताप मेरे हृदय में बैठकर प्रश्न करने को प्रेरित करता है, इससे मैं प्रश्न करता हूँ। हे भगवन्! मेरे हृदय में संसार बलता है और जैसे समुद्र को बड़वाग्नि जलाती है, वैसे ही मुझको जलाता है। इससे आप वही उपाय कहिये, जिससे मुझको शान्ति हो। हे भगवन्! यह संसार कहाँ से उपजा; दृश्य का स्वरूप क्या है और वह कैसे निवृत्त होता है? जैसे जाल से पक्षी निकल जाता है, वैसे ही जन्म, मरणरूप संसार महाजाल से मैं निकलना चाहता हूँ। जैसे वरुण समुद्र के सब स्थान जानता है, वैसे ही तुम जगत् के सब व्यवहारों को जानते हो और संशय के निवृत्त करनेवाले हो। अज्ञानरूपी तम के नाशकर्ता तुम सूर्य हो; तुम्हारे अमृतरूपी वचनों से मैं शान्ति को प्राप्त हूँगा। मुनि बोले हे साधो! मैं चिरकाल पर्यन्त जगत् में विचरता रहा हूँ, परन्तु ऐसा प्रश्न
२६० * योगवाशिष्ठ *
मुझसे किसी ने नहीं किया । तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है ? यह प्रश्न अनर्थ का नाश करनेवाला है । तेरी बुद्धि विवेक में विकासमान हुई देख पडती है । हे राजन् ! जो कुछ जगत तुमको भासित होता है, सो सब असत है । जैसे रस्सी में सर्प, स्वप्न में गन्धर्वनगर, मरुस्थल में जल, सीपी में रूपा, आकाश में नीलापन और दूसरा चन्द्रमा भ्रम में दिखते हैं, वैसे ही यह जगत असतरूप है; जैसे जल में चक्र और तरङ्ग असतरूप हैं, वैसे ही जगत असतरूप है । जो मन सहित षट् इन्द्रियों से अतीत है और शून्य भी नहीं, सो मन और अविनाशी आत्मा कहलाता है । वह निर्मल परब्रह्म सर्व ओर से पूर्ण और अनन्त है, उसी में जगत कल्पित है ।
हे राजन् ! जैसे सब वृक्षों में एक ही रस व्यापक है, वैसे ही सब पदार्थों में एक चिन्मात्रसत्ता व्यापक है । जैसे अचल समुद्र में द्रवता से तरंग उठते हैं, वैसे ही परमात्मा में जगत प्रकट होते हैं । उस महादर्पण में सब वस्तुएँ प्रतिबिम्बित होती हैं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले, चक्रादिक होते हैं; वैसे ही आत्मा में जीवादिक का आभास होता है । प्रथम स्फुरणरूप होते हैं और पीछे कारणकार्यरूप होते हैं । चित्तशक्ति अपने संकल्प से भूतादिक देह रचती है, उसमें स्वरूप के प्रमाद से आत्मा अभिमान करता है । जैसे कुमवारी की क्रिया अपने बन्धन का कारण होती है, वैसे ही जीव को अपना संकल्प बन्धन का कारण होता है । हे राजन् ! जीवकला को स्वरूप का अज्ञान हुआ है । इससे जैसे बालक को अपनी परछाईं यक्षरूप होकर डराती है, वैसे ही यह नाना प्रकार के आरम्भ को प्राप्त हुआ है, और अकारण ही ब्रह्मशक्ति फुरने से कारणभाव को प्राप्त हुआ है । उसमें बन्धन और मोक्ष भासित होते हैं । पर वास्तव में न बन्धन है और न मोक्ष है । निरामय ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । उसमें एक और अनेक कुछ नहीं कह सकते । इससे बन्धन-मोक्ष की कल्पना को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।
इति श्रीयो० नि० इक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चनवतितमस्सर्गः ॥९५॥
* निर्वाण प्रकरण * २६१
मुनि बोले, हे राजन्! जैसे द्रवता से जल ही तरंगभाव को प्राप्त होता है, तैसे ही चिन्मात्र ही संकल्प के स्फुरण से जीव होता है। और वह जीव संसार में कर्मों के वश भ्रमता हुआ भी अपने को कर्ता देखता है। पर सर्वात्मा परब्रह्म करता हुआ कुछ नहीं करता। जैसे सूर्य के प्रकाश से सब चेष्टाएँ होती हैं, पर सूर्य अकर्ता है, तैसे ही आत्मा की शक्ति से जगत् चेष्टा करता है। जैसे चुम्बक पत्थर के निकट लोहा चेष्टा करता है, तैसे ही आत्मा की चेतनता से सब देहादिक चेष्टा करते हैं। पर आत्मा सदा अकर्ता है। जैसे जल में तरंग उठते हैं, तैसे ही आत्मा में देहादिक प्रकट होते हैं। जैसे सुवर्ण में भूषणों की कल्पना होती है, तैसे ही आत्मा में मोह से सुख-दुःख कल्पित होते हैं, पर आत्मा में कुछ कल्पना नहीं। शुद्ध आत्मा में मूढ़ों ने सुख-दुःख की कल्पना की है। पर जो ज्ञानवान् हैं, उनको मन, चित्त, सुख-दुःख सब आकाशरूप शून्य हैं। वे देह से रहित केवल चिदाकाशभाव को नहीं प्राप्त होते हैं। वे जरा-मरण को नहीं प्राप्त होते और सब कार्य करते देख पड़ते हैं, पर हृदय से सदा अकर्तारूप हैं। जैसे जल और दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब पड़ता है, परन्तु उसे स्पर्श नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् को क्रिया नहीं स्पर्श करती। शरीर के व्यवहार में भी वह सदा निर्मल है।
हे राजन्! आत्मा स्थिररूप है, परन्तु भ्रम से चञ्चल भासित होता है। जैसे जल की चञ्चलता से पर्वत का प्रतिबिम्ब भी चञ्चल होता है, तैसे ही देहादिक से आत्मा चलता भासित होता है। पर आत्मा नित्य शुद्ध और अपने आपमें स्थित है। जैसे घट के नाश से मिट्टी का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे शुद्ध मणि में नाना प्रकार के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं, पर उनमें वह रञ्जित नहीं होती, तैसे ही आत्मा में मन, इन्द्रियाँ और देह दिखते हैं, पर उसे स्पर्श नहीं करते। जैसे सब मिष्ट पदार्थों में एक ही मिठाई व्यापी है तैसे ही सब पदार्थों में एक आत्मसत्ता व्यापी है। हे राजन्! आत्मा सदा अचलरूप है। परन्तु अज्ञान से चलरूप भासित होता है। जैसे दौड़ते हुए बालक को सूर्य दौड़ता लगता है, तैसे
२४२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
आत्मा देह संग में अज्ञानवश विकारवान भासित होता है । जैसे प्रतिबिम्ब का विकार आदर्श को नहीं स्पर्श करता, वैसे ही देह का विकार आत्मा को नहीं स्पर्श करता । जैसे अग्नि में सुवर्ण डालिये तो मैल जल जाता है, पर सुवर्ण का नाश नहीं होता, वैसे ही देह के नाश में आत्मा का नाश नहीं होता । वह तो नित्य शुद्ध, अवाच्य और अचिन्त्यरूप है ।
हे राजन् ! वह देखने में नहीं आता, परन्तु चेतनवृत्ति से सब देखता है । जैसे राहु अदृष्ट है, परन्तु चन्द्रमा के संयोग से दिखता है, वैसे ही आत्मा अदृष्ट है, परन्तु चेतनवृत्ति से जाना जाता है । जैसे शुद्ध दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही निर्मल बुद्धि से आत्मा का साक्षात्कार होता है । वह संकल्प से रहित अपने आपमें स्थित है ! जब बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने में आप उसको पाती है । हे राजन् ! जब तक अपनी बुद्धि निर्मल न हो, तब तक शास्त्र और गुरु से ईश्वर नहीं मिलता । जब अपनी बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने आप वह दिखता है । जब संसार की सत्यता हृदय से दूर हो और आत्मा का अभ्यास हो तब बुद्धि निर्मल होती है । हे राजन् ! सब भाव-अभावरूप जो देहादिक पदार्थ हैं, वे असत् और केवल भ्रममात्र हैं । उनकी आस्था का त्याग करो । जैसे कोई मार्ग में चलता है तो अनेक पदार्थ मिलते हैं, परन्तु उनमें वह कुछ रागद्वेष नहीं करता, वैसे ही देह और इन्द्रियों के स्नेह से रहित आत्मतत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है । उसमें देहादिक इन्द्रजाल की तरह मिथ्या है । उनकी भावना दूर से त्यागकर नित्य आत्मा में स्थित होओ ।
हे राजन् ! जीव आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु भी है, क्योंकि आत्मा में ओर का सद्भाव नहीं-आत्मा में आत्मा का ही भाव है-द्वैत नहीं । जो दृश्य पदार्थ और अनात्मधर्म विषय से खींचकर चित्त को अपने रूप में स्थित करता है, वह अपना मित्र है । और जो अनात्मधर्म में पदार्थों की ओर चित्त लगाता है, वह अपना शत्रु है । वास्तव में जो कुछ दृश्य प्रपंच है, वह भी आत्मरूप है । आत्मा में
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २६३
भिन्न कोई वस्तु नहीं। जैसे समुद्र में जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, सब जल ही जल है, वैसे ही आत्मा से भिन्न जगत् कोई वस्तु नहीं—सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त एक आत्मसत्ता ही स्थित है। जैसे अनेक घटों के जल में एक ही सूर्य का प्रकाश प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही अनेक देहों में एक ही आत्मा व्याप रहा है। वह न अस्त होता है और न उदय होता है; सदा एकरस अविनाशी पुरुष ज्यों का त्यों स्थित है। उसमें अहंभावना से संसार भासित होता है। जैसे सीपी में चाँदी की बुद्धि होती है वैसे ही आत्मा में अहंबुद्धि संसार का कारण है। जीव इसी बुद्धि से सब दुःखों का भागी होता है। जैसे वर्षाकाल में सब नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही अनात्म के अभिमान से सब आपदाएँ प्राप्त होती हैं। वास्तव में चिन्मात्र ब्रह्म और जीव में रञ्चक भी भेद नहीं। दोनों एक रूप ही हैं। ऐसी बुद्धि ही बन्धन से मुक्ति का कारण है। आत्मा सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त है। जैसे सूर्य का प्रकाश सब स्थानों में होता है, परन्तु जहाँ शुद्ध जल है वहाँ स्पष्ट दिखता है, वैसे ही आत्मा सब जगह पूर्ण रूप से व्याप्त है, परन्तु शुद्ध बुद्धि में ही भासित होता है। जैसे तरङ्ग और बुलबुलों में जल ही व्याप रहा है, वैसे ही अविनाशी आत्मा सर्वत्र व्यापा है। पर जैसे सुवर्ण में भूषण नहीं, वैसे ही आत्मा में जगत् का अभाव है।
हे राजन् ! यह संसार आत्मा में नहीं है; केवल आत्मा ही है। जो एक वस्तु पात्र की तरह आधार होता है, उसमें दूसरी वस्तु होती है। पर आत्मा तो अद्वैत है, उसमें दूसरी वस्तु संसार कहाँ से हो ? जैसे सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं—वास्तव में कुछ नहीं, वैसे ही आत्मा में संसार अज्ञान से कल्पित है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल चिदाकाश है। जैसे नदियाँ और समुद्र नाममात्र भिन्न हैं, वास्तव में जल ही है, वैसे ही केवल चिदाकाश में विश्व नाममात्र का है। जितने आकार दीखते हैं, उनको काल खा जाता है। जैसे नदियों का भक्षण करके समुद्र नहीं अघाता, वैसे ही पदार्थ-समूहों का काल भक्षण करके नहीं अघाता। हे राजन् ! ऐसे पदार्थों में क्या अभिलाषा करनी है ? कई