योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ २६१
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब वहाँ से वे चले तो अस्ताचल पर्वत में जाकर रहे और उदयाचल, सुमेरु, कैलास इत्यादिक पर्वतों की कन्दराओं और वनों में रहे। कहीं एक मास, कहीं दस मास, कहीं पाँच दिन, कहीं सात दिन रहे। इसी तरह जब एक वन में आये, तब रानी ने विचार किया कि इतने स्थान राजा को दिखाये, तो भी इसका चित्त किसी में नहीं बँधा, इसमें अब और परीक्षा लूँ। ऐसे विचार-कर उसने अपनी ऐसी माया फैलाई कि तैंतीस कोटि देवता सहित इन्द्र के आगे किन्नर, गन्धर्व, सिद्ध और अपसरा नृत्य करती आईं। सर्वसामग्री संयुक्त इन्द्र को देखकर राजा उठा और बहुत प्रीति से उसकी पूजा करके बोला, हे त्रैलोक्य के पति ! तुम किस लिये वन में आये हो सो कहो ? इन्द्र ने कहा, हे राजन् ! जैसे पक्षी ऊपर आकाश में उड़ता है और उसकी पेटी में तागा होता है उससे उड़ता हुआ भी नीचे आता है, वैसे ही हम ऊर्ध्व के वासी तप और शुभ लक्षणों के तागेरूपी गुणों को श्रवण करके स्वर्ग से खिंचे चले आते हैं—इस प्रकार हमारा आना हुआ है। इससे हे राजन् ! तुम स्वर्ग को चलो और स्वर्ग में स्थित होकर दिव्य भोगों को भोगो। ऐरावत हाथी पर अथवा उच्चैःश्रवा घोड़ा, जो क्षीरसमुद्र के मथन से निकला है, उस पर सवार होकर चलो। अणिमा, महिमा, गरिमा आदि आठ सिद्धियाँ भी विद्यमान हैं। जो इच्छा हो, सो लो और स्वर्ग में चलो। हे राजन् ! तुम तत्त्ववेत्ता हो, तुमको ग्रहण या त्याग करना कुछ नहीं रहा। परन्तु जो अनिच्छित प्राप्त हो, उसका त्याग करना योग्य नहीं—इससे स्वर्ग में चलो।
राजा बोले, हे देवराज ! जाना वहाँ होता है, जहाँ आगे न गया हो, और जहाँ आगे ही गये हो, वहाँ कैसे जावें ? हे देवराज ! हमको सब जगह स्वर्ग ही देख पड़ता है। जो वहाँ स्वर्ग हो और यहाँ न हो, तो जाना भी उचित है; परन्तु जहाँ हम बैठे हैं, वहीं हमें स्वर्ग भासित होता है; इससे हम कहाँ जावें ? हमको तीनों लोक स्वर्ग ही दीखते हैं और सदा स्वर्गरूप जो आत्मा है हम उसी में स्थित हैं। हमको सर्वत्र
२६२ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
स्वर्ग है, हम सदा तृप्त और आनन्दरूप हैं। इन्द्र बोले, हे राजन्! जो विदित-वेद्य पूर्णबोध हैं, वे भी यथाप्राप्त भोगों को सेवते हैं तो तुम क्यों नहीं सेवते? इन्द्र ने ऐसा जब कहा, तब राजा इतना कहकर चुप हो गया। फिर इन्द्र ने कहा—भला जो तुम नहीं आते तो हमही जाते हैं। तुम्हारा और कुम्भज का कल्याण हो। हे राम! ऐसा कहकर इन्द्र उठ खड़ा हुआ और चला, पर जब तक वह देख पड़ता था, तब तक देवता भी साथ दीखते थे, फिर जब दृष्टि से अगोचर हुए तब अन्तर्धान हो गये। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर फिर लीन हो जाते हैं और जाना नहीं जाता कि कहाँ गये, वैसे ही इन्द्र अन्तर्धान हो गया। वह इन्द्र कुम्भजरूप चूडाला के सङ्कल्प से उठा था। जब सङ्कल्प लीन हुआ, तब अन्तर्धान हो गया। चूडाला ने देखा कि ऐसे ऐश्वर्य, सिद्धि और अप्सराओं के प्राप्त होने पर भी राजा का चित्त समता में रहा और किसी पदार्थ में नहीं बँधा।
इति श्री० नि० मायाशक्रागमनवर्णनं नाम चतुरशीतितमस्सर्गः ॥ ८४ ॥
वसिष्ठजी बोले, हे राम! जब चूडाला इन्द्र का छल कर चुकी, तब विचारने लगी कि ऐसा चरित्र मैंने राजा को मोहने के निमित्त किया तो भी राजा किसी में नहीं बँधा और ज्यों का त्यों ही रहा। बड़ा कल्याण हुआ कि राजा सत्तासमान में स्थित रहा—इससे बड़ा आनन्द हुआ। अब और चरित्र करूँ, जिसमें इसको क्रोध और खेद दोनों हों। ऐसे विचारकर राजा की परीक्षा के निमित्त उसने यह चरित्र किया कि जब सायंकाल का समय हुआ, तब गङ्गा के किनारे राजा संध्या करने लगा और कुम्भज वन में रहा। उसने वहाँ सङ्कल्प का मन्दिर रचा। जैसी देवताओं की रचना होती है, वैसी ही मन्दिर के पास फूलों की एक बाड़ी लगाई और उसमें कल्पवृक्ष आदि नाना प्रकार के फूल-फल-संयुक्त वृक्ष रचे। फिर सङ्कल्प से शय्या रचकर एक सङ्कल्प का महासुन्दर पुरुष रचा और उसके साथ अङ्ग से अङ्ग लगा और गले में फूलों की माला डाल कामचेष्टा करने लगी। जब राजा सन्ध्या कर चुका तो रानी को देखने लगा, पर वह न देख पड़ी। निदान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते
निर्वाण प्रकरण २६३
उस मन्दिर के निकट आया तो क्या देखा कि एक कामी पुरुष के साथ मदनिका सोई हुई है और दोनों कामचेष्टा करते हैं। तब राजा ने विचारा कि भले आराम से दोनों सो रहे हैं, इनके आनन्द में विघ्न क्यों कीजिये।
हे राम ! इस प्रकार राजा ने अपनी स्त्री को देखा तो भी शोकवान् न हुआ और क्रोध भी न किया, ज्यों का त्यों शान्तपद में स्थित रहा। मन्दिर के बाहर निकल के वहाँ एक सुवर्ण की शिला पड़ी थी उस पर आकर बैठा और आधे नेत्र मूँदकर समाधि में स्थित हुआ। दो घड़ी के उपरान्त मदनिका कामी पुरुष को त्यागकर बाहर आई और राजा के निकट आकर अङ्गों को नग्न किया और फिर वस्त्रों से ढका। जैसे और स्त्रियाँ काम से व्याकुल होती हैं, वैसे ही चुडाला को देखकर राजा ने कहा; हे मदनिका ! तू ऐसे सुख को त्यागकर क्यों आई है ? तू तो बड़े आनन्द में मग्न थी। अब वहीं फिर जा। मुझे तो हर्प या शोक कुछ नहीं। मैं ज्यों का त्यों हूँ। परन्तु तेरी और कामी पुरुष की प्रीति परस्पर देखी है । जगत् में परस्पर ऐसी प्रीति नहीं होती। इससे तू उसको सुख दे, वह तुझे सुख दे । तब मदनिका लज्जा से सिर को नीचे करके बोली, हे भगवन् ! क्षमा करो। मुझ पर क्रोध न करो। मुझसे बड़ी अवज्ञा हुई है, परन्तु मैंने जानकर नहीं की। सारा वृत्तान्त सुनो। जब तुम सन्ध्या करने लगे, तब मैं बन में आई तो वहाँ एक कामी पुरुष का मिलाप हुआ। मैं निर्बल थी और वह बली था। उसने पकड़कर मुझे गोद में बैठा लिया और जो कुछ इच्छा थी सो किया। मैंने जो पतिव्रता स्त्री की मर्यादा थी, उसके अनुसार उस पर क्रोध किया और उसका निरादर किया और पुकार भी की—ये तीनों पतिव्रता की मर्यादा हैं सो मैंने की—परन्तु तुम दूर थे और वह बली था, मुझसे उसने बलात्कार किया। हे भगवन् ! मुझमें कुछ दोष नहीं, इससे तुम क्षमा करके क्रोध न करो।
राजा बोले, हे मदनिका ! मुझे कभी क्रोध नहीं होता। आत्मा ही सर्वत्र दीखता है, तब क्रोध किस पर करूँ। मुझे न कुछ ग्रहण करना
२६४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है और न त्याग करना है, तथापि यह कर्म साधुओं में निन्दित है। इससे मैंने अब तेरा त्याग किया है। अब सुख से विचरूँगा। मेरा गुरु जो कुम्भज है, वह मेरे पास ही है। वह और मैं सदा बीतराग हैं। तू तो दुर्वासा के शाप से उपजी है। तुझसे मुझे क्या प्रयोजन है, तू अब ऊर्मी के पास जा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मायापिञ्जरवर्णनं नाम पञ्चाशीतितमस्सर्गः ॥ ८५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तब मदनिका नाम की चूडाला ने विचार किया कि बड़ा कार्य हुआ, जो राजा आत्मपद को प्राप्त हुआ। ऐसी सिद्धि और ऐश्वर्य दिखाये और कठिन क्रूर स्थान भी दिखाये, तो भी राजा शुभ-अशुभ में ज्यों का त्यों रहा। इससे बड़ा कल्याण हुआ कि राजा को शान्ति प्राप्त हुई और वह रागद्वेष से रहित हुआ। अब मैं इसे अपना चूडाला का पूर्वरूप दिखाऊँ और सम्पूर्ण वृत्तान्त जताऊँ। ऐसे विचार कर जब मदनिका शरीर से चूडालारूप में भूषण और वस्त्रसहित प्रकट हुई, तब राजा उसे देखकर महाआश्चर्य को प्राप्त हुआ और ध्यान में स्थित होकर देखा कि यह चूडाला कहाँ से आई है। फिर पूछा, हे देवि ! तू कहाँ से आई है ? तुझे देखकर तो मैं आश्चर्य को प्राप्त हुआ हूँ; क्योंकि ऐसी तो मेरी स्त्री चूडाला थी। तू यहाँ किस निमित्त आई है और कब की आई है ? चूडाला बोली, हे भगवन् ! मैं तुम्हारी स्त्री चूडाला ही हूँ और तुम मेरे स्वामी हो। हे राजन् ! कुम्भज से लेकर इस चूडाला शरीर तक सब चरित्र मैंने तुम्हें जगाने के निमित्त किये हैं। तुम ध्यान में स्थित होकर देखो कि ये चरित्र किसने किये हैं ? मैंने अब पूर्व का चूडाला का शरीर रचा है। हे राम ! जब ऐसे चूडाला ने कहा, तब राजा ध्यान में स्थित होकर देखने लगा और एक मुहूर्त तक ध्यानस्थ रहकर सब वृत्तान्त जान लिया। उसके उपरान्त राजा ने आश्चर्य को प्राप्त होकर नेत्र खोले और रानी को कण्ठ में लगा लिया। निदान दोनों ऐसे हर्ष को प्राप्त हुए जो सहस्र वर्ष पर्यन्त शेषनाग उस सुख को वर्णन करें तो भी न
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कह सकेंगे। वे ऐसे सत्तासमान में स्थित होकर शान्ति को प्राप्त हुए, जिसमें क्षोभ कभी नहीं होता।
राजा और रानी दोनों कण्ठ लगकर मिले थे, इससे अङ्गों में उष्णता उपजी थी, इस कारण धीरे-धीरे उन्होंने अंग खोले। हर्षित होकर राजा की रोमावलि खड़ी हो आई और नेत्रों में आँसू बहने लगे। ऐसी अवस्था में राजा बोला, हे देवि! मुझ पर तुमने बड़ा अनुग्रह किया है। तुम्हारी स्तुति मैं नहीं कर सकता। जो कुछ संसार के पदार्थ हैं, वे सब मायामय और मिथ्या हैं। तुमने मुझे सत्पद को पहुँचाया है, इससे मैं तुम्हारी कहाँ तक प्रशंसा करूँ। हे देवि! मैंने अब जाना कि मैंने जो राज्य का त्याग किया, वह और इस चुड़ाला के शरीर पर्यन्त सब तुम्हारे ही चरित्र हैं। तुमने मेरे वास्ते बड़े कष्ट सहे और बड़े यत्न किये। आना और जाना, शरीर का स्वाँग भरना और उड़ना इत्यादि में तुमने बड़ा कष्ट पाया है और बड़े यत्न से मुझे संसार-समुद्र से पार करके बड़ा उपकार किया है। तुम धन्य हो। जितनी देवियाँ अरुन्धती, ब्रह्माणी, इन्द्राणी, पार्वती, सरस्वती और श्रेष्ठ कुल की कन्या और पतिव्रता हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ हो। जिस पुरुष को पतिव्रता प्राप्त होती है, उसके सब कार्य सिद्ध होकर उसे बुद्धि, शान्ति, दया, शक्ति, कोमलता और मैत्री प्राप्त होती है। हे देवि! मैं तुम्हारे प्रसाद से शान्त-पद को प्राप्त हुआ हूँ। अब मुझे कोई क्षोभ नहीं है। ऐसा पद शास्त्रों और तप से भी नहीं मिलता।
चुड़ाला बोली, हे राजन्! तुम काहे को मेरी स्तुति करते हो? मैंने तो अपना कर्त्तव्य किया है। हे राजन्! तुम राज्य का त्याग कर बन में मोह अर्थात् अज्ञान को साथ ही लिये आये थे, इससे नीच स्थान में पड़े। जैसे कोई गङ्गाजल त्यागकर कीचड़ के जल को अङ्गीकार करे, वैसे ही तुमने आत्मज्ञान और अक्रियपद का त्यागकर तप को अङ्गीकार किया था। जब मैंने देखा कि तुम कीचड़ में गिरे हो तो मैंने तुम्हें निकालने के लिए इतने यत्न किये हैं। हे राजन्! मैंने अपना कर्त्तव्य किया है। राजा बोले, हे देवि! मेरा यही आशीर्वाद है कि
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जो कोई पतिव्रता स्त्री हों वे सब ऐसे कार्य करें, जैसे तुमने किये हैं। जो पतिव्रता स्त्री में कार्य होता है; वह और में नहीं होता। हे देवि! अरुन्धती आदि जितनी पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, उनमें तुम प्रथम गिनी जाओगी। मैं जानता हूँ कि ब्रह्माजी ने क्रोधकर तुम्हें इस निमित्त उपजाया है कि अरुन्धती आदि देवियों ने जो गर्व किया होगा, उस गर्व को मिटावें। इससे हे देवि! तुम धन्य हो। तुमने मेरे ऊपर बड़ा उपकार किया है। हे देवि! तुम मेरे अङ्ग में लगो। तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है। हे राम! ऐसे कहकर राजा ने रानी को फिर कण्ठ से लगाया, जैसे नेवला और नेवली मिलें और मूर्ति की नाईं लिखे हों।
चूड़ाला बोली, हे भगवन्! एक तो मुझसे यह कहो कि ज्ञानरूप आत्मा के एक अंश में जगत लीन हो जाते हैं; ऐसे तुम हो। अपने को अब तुम क्या जानते हो? अब तुम कहाँ स्थित हो? राज्य तुम्हें कुछ दिखाई देता है या नहीं और अब तुम्हारी क्या इच्छा है? शिखिध्वज बोले, हे देवि! जो स्वरूप तुमने-ज्ञान से निश्चित किया है, वही मैं अपने को जानता हूँ और शान्तरूप हूँ। इच्छा-अनिच्छा मुझको कोई नहीं रही—केवल शान्तरूप हूँ। हे देवि! जिस पद की अपेक्षा करके ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की मूर्तियाँ भी शोकसंयुक्त लगती हैं, उस पद को मैं प्राप्त हुआ हूँ, जहाँ कोई उत्थान नहीं; जो निष्किञ्चन है और जिसमें किञ्चिन्मात्र भी जगत नहीं। मैं जो था वही हुआ हूँ, इससे अधिक और क्या कहें। हे देवि! तुमने संसारसमुद्र से मुझे पार किया है, इससे तुम मेरी गुरु हो। ऐसे कहकर राजा चूड़ाला के चरणों पर गिर पड़ा और बोला—मुझे अज्ञान कभी स्पर्श नहीं करेगा। जैसे ताँबा पारस के संग में सुवर्ण होकर फिर ताँबा नहीं होता, वैसे ही मैं तुम्हारे प्रसाद से मोहरूपी कीचड़ से निकला हूँ और फिर कभी न गिरूँगा। अब मैं इस गत के सुख-दुःख से संतुष्ट हुआ। ज्यों का त्यों स्थित हूँ और राग-द्वेष को उठानेवाला मेरा चित्त नष्ट हो गया है। अब मैं प्रकाशरूप अपने आपमें स्थित हूँ। जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है और जल के नष्ट होने पर प्रतिबिम्ब भी सूर्यरूप होना
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है, वैसे ही मेरा चित्त भी आत्मरूप हुआ है। अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त हो सबसे अतीत हुआ हूँ और सबमें स्थित हूँ। जैसे आकाश सब पदार्थों में स्थित है और सब पदार्थों से अतीत है, वैसे ही मैं भी हूँ। मेरे 'अहं' 'त्वं' आदिक शब्द नष्ट हुए हैं और मैं शान्ति को प्राप्त हुआ हूँ। अब मुझमें ऐसा-वैसा शब्द कोई नहीं। मैं अद्वैत और चिन्मात्र हूँ और न सूक्ष्म हूँ, न स्थूल हूँ।
चुड़ाला बोली, हे राजन्! जो तुम ऐसे स्थित हुए तो अब क्या करोगे और अब तुम्हें क्या इच्छा है? राजा बोले, हे देवि! न मुझे कुछ अङ्गीकार करने की इच्छा है और न त्याग करने की। जो कुछ तुम कहोगी सो करूँगा। तुम्हारे कहने को अङ्गीकार करूँगा। जैसे मणि प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, वैसे ही मैं तुम्हारे वचनों को ग्रहण करूँगा। चुड़ाला बोली, हे प्राणपति हृदय के प्रियतम राजा! अब तुम विष्णु हुए हो। यह बड़ा उत्तम हुआ कि तुम्हारी इच्छा नष्ट हुई है। हे राजन्! अब उचित है कि तुम और मैं मोह से रहित होकर अपने प्राकृत आचार में विचरें। हम अखेद जीवन्मुक्त होकर अपने प्राकृत आचार को क्यों त्यागें? हे राजन्! जो अपने आचार को त्यागेंगे तो और किसी को ग्रहण करेंगे। इससे अपने ही आचार में विचरते हैं और भोग-मोक्ष दोनों को भोगते हैं। हे राम! ऐसे परस्पर विचार करते दिन व्यतीत हुआ और सायंकाल की सन्ध्या राजा ने की। फिर शय्या का आरम्भ किया। उस पर दोनों सोये और रात्रिभर परस्पर चर्चा ही करते एकक्षण की नाईं रात्रि बिताई।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पददर्शितसन्मार्गः ॥ ८६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब ऐसे रात्रि बीती और सूर्य की किरणें फैलीं; सूर्यमुखी कमल खिल आये, तब राजा ने स्नान किया। चुड़ाला ने मन के संकल्प से रत्नों की मटकी रच हाथ में ली, उसमें गङ्गादिक सम्पूर्ण तीर्थों का जल डाला और राजा को स्नान कराके शुद्ध किया। तब राजा ने संध्यादिक सब कर्म किये। तब चुड़ाला ने कहा, हे राजन्! मोह का नाश करके सुखपूर्वक अपने राज-काज करने चाहिये
२६८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
जिसमे सुख भोगें । राजा बोले, हे देवि ! जो तुम्हें सुख भोगने की इच्छा हो तो स्वर्ग में भी हमारा राज्य है और सिद्धलोक में भी हमारा राज्य है । इसमें स्वर्ग में विचरें ! चूडाला बोली, हे राजन ! हमको न सुख भोगने की इच्छा है, न त्यागने की इच्छा है । हम तो ज्यों के त्यों हैं । इच्छा और अनिच्छा तब होती है, जब आगे कुछ पदार्थ भासित होता है । पर हमको तो केवल आत्मा दीखता है; स्वर्ग कहाँ और नरक कहाँ—हम सर्वदा एकरस स्थित हैं । हे राजन ! यद्यपि हमको कुछ भेद नहीं, तो भी जब तक शरीर का प्रारब्ध है, तब तक शरीर रहता है, इससे चेष्टा भी होना चाहिए । और की चेष्टा करने में अपन प्राकृत आचार को क्यों न कीजिये, जिसमें रागद्वेष में रहित होकर अपने राज्य को भोगें ? इससे अब उठो और अष्टवसु के तेज को धारण कर राज्य करने को सावधान हो ।
राजा ने कहा बहुत अच्छा, और अष्टवसु के तेजसंयुक्त हो बोला, हे देवि ! तुम मेरी पटरानी हो और मैं तुम्हारा भर्ता हूँ, तो भी तुम और मैं एक ही हैं । राज्य तब होता है, जब सेना भी हो, इससे सेना भी रचो । तब उस चूडाला ने सम्पूर्ण सेना और हाथी, घोड़े, रथ, नौबत, नगारे, निशान इत्यादिक राज्य की सामग्री रची और सब प्रत्यक्ष आगे आकर स्थित हुई । नौबत, नगारे, तुरही और शहनाई बजने लगा और जो कुछ राज्य की सामग्री है; वे अपने अपने स्थान में स्थित हुई । राजा के सिर पर छत्र फिरने लगा और राजा और रानी हाथी पर सवार होकर मन्दराचल पर्वत के ऊपर चले । आगे पीछे सब सेना हुई । राजा ने जिस जिस जगह पर तप किया था सो रानी को दिखाता गया कि इस स्थान में मैं इतने काल रहा हूँ; इसमें इतना रहा हूँ । ऐसे दिखाते दिखाते बड़े वेग से चले । मन्त्री, पुरवासी और नगर-वासी राजा को लेने आये और बड़े आदर से नमन किया । इस प्रकार दोनों अपने मन्दिर पहुँचे । आठ दिन तक राजा से लोकपाल और मण्डलेश्वर मिलने को आते रहे । इसके उपरान्त राजसिंहासन पर बैठकर दोनों राज्य करने लगे । समदृष्टि को लिये दशसहस्र वर्ष तक
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २६६
राज्य किया। फिर चुड़ाला संयुक्त जीवन्मुक्त होकर विचरे और दोनों विदेह मुक्त हुए। हे राम! दशसहस्र वर्ष पर्यन्त राजा और चुड़ाला ने राज्य किया और दोनों समसमान में स्थित रहे। किमी पदार्थ में वे रागवान् न हुए और किमी में द्वेष भी न किया ज्यों के त्यों शान्त-पद में स्थित रहे। जितनी राज्य की चेष्टा है, सो करते रहे, परन्तु भीतर से किसी में बँधे नहीं—केवल आत्मपद में अचल रहे। फिर राजा और चुड़ाला विदेह मुक्त हुए—जैसे अपने को जानते थे, उसी ज्ञान के बल से परमाकाश अक्षोभपद में जाकर स्थित हुए और जैसे तेल बिना दीपक निर्वाण होता है, वैसे ही प्रारब्धवेग का क्षय होने पर निर्वाणपद को प्राप्त हुए। हे राम! जैसे शिखिध्वज और चुड़ाला जीवन्मुक्त होकर भोगों को भोगते विचरे हैं, वैसे ही तुम भी रागद्वेष से रहित होकर विचरो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजचुड़ालाख्यान-समाप्तिर्नाम सप्तशीतितमस्सर्गः ॥ ८७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिखिध्वज का सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। ऐसी दृष्टि का आश्रय करो, जो पाप का नाश करती है। उस दृष्टि के आश्रय से जिस मार्ग के द्वारा शिखिध्वज तत्पद को प्राप्त हुआ और जीवन्मुक्त होकर राज्य-व्यवहार करता रहा, वैसे ही तुम भी तत्पद का आश्रय करो और उसी के परायण हो आत्मपद को पाकर भोग और मोक्ष दोनों भोगो। इसी प्रकार बृहस्पति का पुत्र कच ने भी बोध पाया है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जिस प्रकार बृहस्पति का पुत्र कच बोध को प्राप्त हुआ, सो भी संक्षेप में कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! कच बालक जब अज्ञान अवस्था को त्यागकर पद-पदार्थ को जानने लगा, तब उसने अपने पिता बृहस्पति से प्रश्न किया कि हे पिता! इस संसार के पिंजरे में से में कैसे निकलूँ? जितना संसार है, वह जीवत्व से बँधा हुआ है। अनात्मदेहादिकों में मिथ्या अभिमान करने को जीवत्व कहते हैं। जिसमें 'अहं', 'त्वं' माना जाता है, उस संसार से कैसे मुक्त होऊँ? बृहस्पति बोले, हे तात! इस अनर्थरूप संसार में जीव
२७० * योगवाशिष्ठ *
तब मुक्त होता है, जब सबका त्याग करता है। सर्वत्याग किये बिना मुक्ति नहीं होती। इससे तू सर्वत्याग कर जिससे मुक्त हो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब इस प्रकार बृहस्पति ने कहा, तब कच ऐसे पावन वचनों को सुन ऐश्वर्य का त्याग कर वन को गया और एक कन्दरा में स्थित होकर तप करने लगा।
हे राम! बृहस्पति को कच के जाने से कुछ खेद न हुआ; क्योंकि ज्ञानवान पुरुष संयोग-वियोग में सम रहते हैं और हर्ष-शोक को कभी प्राप्त नहीं होते। जब आठ वर्ष पर्यन्त कच ने तप किया, तब बृहस्पति ने जाकर देखा कि वह एक कन्दरा में बैठा है। तब वह कच के पास आ गये। कच ने पिता का पूजन गुरु की भाँति किया। बृहस्पति ने कच को गले लगाया। तब कच ने गद्गदवाणी से प्रश्न किया-हे पिता! आठ वर्ष बीते मैंने सर्वत्याग किया है, तो भी शान्ति को नहीं प्राप्त हुआ? जिसमें मुझे शान्ति हो, सो कहो। बृहस्पति ने कहा हे तात! सर्वत्याग कर, जिससे तुझे शान्ति हो। ऐसे कहकर बृहस्पति उठ खड़े हुए और आकाश को चले गये। हे राम! जब बृहस्पति ऐसे कहकर चले गये, तब कच आसन और मृगछाला को त्याग कर और वन को चला और एक कन्दरा में जाकर स्थित हुआ। तीन वर्ष वहाँ व्यतीत हुए तो फिर बृहस्पति आये और देखा कि कच स्थित बैठा है। तब कच ने भली प्रकार गुरु की तरह उनका पूजन किया और बृहस्पति ने कच को गले लगाया। तब कच ने कहा, हे पिता! अब तक मुझे शान्ति नहीं हुई। मैंने सर्वत्याग भी किया; क्योंकि अपने पास कुछ नहीं रखता। इससे जिसमें मेरा कल्याण हो, वही कहो। बृहस्पति ने कहा, हे तात! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ; सब के कारण चित्त का जब त्याग करेगा, तब सर्वत्याग होगा; इससे चित्त का त्याग कर।
वशिष्ठजी बोले, हे राम! ऐसे कहकर जब बृहस्पति आकाश को चले गये, तब कच विचारने लगा कि पिता ने सर्वपद चित्त को कहा है, वह चित्त क्या है? प्रथम वन के पदार्थों को देखकर विचारने लगा
⚙ निर्वाण प्रकरण ⚙ २७१
कि यह चित्त है। फिर देखा कि ये भिन्न-भिन्न हैं, इसमें ये चित्त नहीं और नेत्र भी चित्त नहीं; क्योंकि नेत्र श्रवण नहीं। और श्रवण नेत्रों से भिन्न है। श्रवण भी चित्त नहीं इसी प्रकार सब इन्द्रियाँ चित्त नहीं; क्योंकि एक में दूसरे का अभाव है। फिर चित्त क्या है, जिसको जान कर त्याग करूँ? फिर विचार किया कि पिता के पास स्वर्ग में जाऊँ। हे राम! ऐसे विचारकर कच उठ खड़ा हुआ और दिगम्बर होकर आकाश को चला। जब पिता के पास पहुँचा, तब पिता का पूजन करके बोला, हे तैंतीस कोटि देवताओं के गुरु! चित्त का रूप क्या है? उसका रूप कहिये, जिससे मैं उसका त्याग करूँ। बृहस्पति बोले, हे पुत्र! चित्त अहंकार का नाम है। वह अज्ञान से उपजा है और आत्मज्ञान से इसका नाश होता है। जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प दिखता है और रस्सी के जानने से सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है। इससे अहंभाव का त्याग कर और स्वरूप में स्थित हो। कच बोले, हे पिता! अहंभाव का त्याग कैसे करूँ? 'अहं', तो मैं ही हूँ, फिर अपना त्याग करके स्थित कैसे होऊँ? इसका त्याग करना तो महाकठिन है।
बृहस्पति बोले, हे तात! अहंकार का त्याग करना तो महासुगम है। फूल के मलने में और नेत्रों के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न है, परन्तु अहंकार के त्यागने में कुछ यत्न नहीं। हे पुत्र! अहंकार कुछ वस्तु नहीं; भ्रम से उत्पन्न है। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में बेताल की कल्पना करता है, रस्सी में सर्प दिखता है; मरुस्थल में जल की कल्पना होती है और आकाश में भ्रम से दो चन्द्रमा दीखते हैं, वैसे ही परिच्छिन्न अहंकार अपने प्रमाद से उपजा है। आत्मा शुद्ध आकाश से भी निर्मल है और देश-काल-वस्तु के परिच्छेद से रहित सत्ता सामान्य चिन्मात्र है। उसमें स्थित हो, जो तेरा स्वरूप है। तू आत्मा है। तुझमें अहंकार कभी नहीं है। हे साधु! आत्मा सर्वदा, सब प्रकार सबमें स्थित है। उसमें अहंभाव किंचित् भी नहीं है। जैसे समुद्र में धूल कभी नहीं होती, वैसे ही आत्मा में अहंकार कभी नहीं है। आत्मा में न एकत्व है, और न द्वैत। वह केवल अपने आपमें स्थित है। और जो
२७२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
नाना आकार देख पड़ते हैं, वे चित्त के स्फुरण में हैं। चित्त के नष्ट होने पर आत्मा ही शेष रहता है। इससे अपने स्वरूप में स्थित हो जिससे तेरा दुःख नष्ट हो जावे। जो कुछ यह देख पड़ता है, इसमें भी आत्मा है। जैसे पत्र, फूल, फल सब बीज से उत्पन्न होते हैं, वैसे ही सब आत्मा का चमत्कार है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिसंबोधन- नामाष्टाशीतितमस्सर्गः ॥ ८८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार बृहस्पति ने उत्तम उपदेश किया तब कच उसे सुनकर स्वरूप में स्थित हुआ और जीवन्मुक्त होकर विचरा। हे राम ! जैसे कच जीवन्मुक्त होकर विचरा और निरहंकार हुआ, वैसे ही तुम भी निष्काम होकर विचरो और केवल अद्वैतपद को प्राप्त हो, जो निर्मल और शुद्ध है। जिसमें अद्वैत या द्वैत कुछ नहीं, तुम उसी पद में स्थित हो। तुममें दुःख कोई नहीं। तुम आत्मा हो और तुममें अहंकार नहीं। तुम ग्रहण या त्याग किसका करोगे। जो पदार्थ ही ही नहीं तो ग्रहण या त्याग किसका हो ? हे राम ! जैसे आकाश में फूल नहीं तो उसका ग्रहण क्या और त्याग क्या, वैसे ही आत्मा में अहंकार नहीं। जो ज्ञानवान पुरुष है, वे अहंकार का ग्रहण और त्याग नहीं करते। मूर्ख को एक आत्मा में नाना आकार दीखते हैं, इससे किसी का शोक करता है और कहीं हर्ष करता है। तुम कस दुःख
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २७३
उस वर्षा से मैं अघा गया हूँ। अब मैं शान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ। मेरे तीनों ताप मिट गये हैं और कोई वासना मुझ में नहीं रही। तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को सुनकर मेरा जी नहीं भरता। जैसे चकोर चन्द्रमा को देखकर किरणों से तृप्त नहीं होता, वैसे ही तुम्हारे अमृतरूपी वचनों से मैं तृप्त नहीं होता। इससे एक प्रश्न करता हूँ, उसका उत्तर कृपा करके दीजिये। हे भगवन् ! मिथ्या क्या है और सत् क्या है, जिसकी रक्षा करते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस पर एक आख्यान है सो कहता हूँ, जिसके सुनने से हँसी आवेगी। आकाश में एक शून्य वन है और उसमें एक मूर्ख बालक है, जो आप मिथ्या है और सत्य के रखने की इच्छा करता है कि मैं इसकी रक्षा करूँगा। अधिष्ठान जो सत्य है, उसको वह नहीं जानता। मूर्खता करके दुःख पाता है और जानता है कि यह आकाश है; मैं भी आकाश हूँ; मेरा आकाश है; और मैं आकाश की रक्षा करूँगा। ऐसे विचारकर उसने एक दृढ़ गृह इस अभिप्राय से बनाया कि इसके द्वारा आकाश की रक्षा करूँगा।
हे राम ! ऐसे विचार करके उसने गृह की बहुत बनावट की। वह जो किसी जगह से टूटता-फूटता तो वह उसे फिर बना लेता। जब कुछ काल इस प्रकार बीता तो वह गृह गिर पड़ा। तब वह रुदन करने लगा कि हाय मेरा आकाश नष्ट हो गया। जैसे एक ऋतु व्यतीत हो और दूसरी आवे वैसे ही काल पाकर जब वह गृह गिर गया तो उसके उपरान्त उसने कुआँ बनाया और कहने लगा कि यह न गिरेगा; क्योंकि मैं इसकी भली प्रकार रक्षा करूँगा। हे राम ! इस प्रकार कुएँ को बनाकर उसने सुख माना। जब कुछ काल बीता तो जैसे सूखा पत्ता वृक्ष से गिरता है, वैसे ही वह कुआँ भी गिर पड़ा। तब वह बड़े शोक को प्राप्त हुआ कि मेरा आकाश गिर पड़ा और नष्ट हो गया, अब मैं क्या करूँगा ? ऐसे शोक से जब कुछ काल बीता, तब उसने एक खाई बनाई—जैसे अनाज रखने के लिए बनाते हैं—और कहने लगा कि अब मेरा आकाश कहाँ जावेगा ? मैं अब इसकी भली प्रकार रक्षा करूँगा। ऐसी खाई बनाकर उसने बहुत सुख माना और अति-
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- योगवासिष्ठ *
प्रसन्न हुआ । पर जब कुछ काल पाकर वह खाई भी टूट पड़ी-क्योंकि उपजी वस्तु का विनाश होना अवश्य है-तो फिर वह रुदन करने लगा कि मेरा आकाश नष्ट हो गया । जब कुछ काल शोक में बीता, तब उसने एक घट बनाया और घटाकाश की रक्षा करने लगा । कुछ काल में वह घट भी जब नष्ट हो गया, तब उसने एक कुण्ड बनाया और कुण्डाकाश की रक्षा करने लगा । कुछ काल के उपरान्त कुण्ड भी नष्ट हो गया, तब शोकवान् हो उसने एक हवेली बनाई और कहने लगा कि अब मेरा आकाश कहाँ जावेगा में अब इसकी भली प्रकार रक्षा करूँगा । ऐसा विचारकर वह बड़े हर्ष को प्राप्त हुआ । पर जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब वह हवेली भी गिर पड़ी । तब वह दुःख को प्राप्त हो कहने लगा कि हाय ! हाय ! मेरा आकाश नष्ट हो गया और मुझे बड़ा कष्ट हुआ है । हे राम ! आत्मा और आकाश के ज्ञान बिना वह मूर्ख बालक इसी प्रकार दुःख पाता रहा । जो अपने यथार्थ रूप को जानता और आकाश को भी ज्यों का त्यों जानता तो यह कष्ट काहे को पाता ?
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मिथ्यापुरुषाकाशरक्षाकरणं नामैकोननवतितमस्सर्गः ॥ ८९ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह मिथ्यापुरुष कौन था; जिसकी रक्षा करता था, वह आकाश क्या था; और जो गृह, कूप आदिक बनाता था सो क्या थे; यह प्रकट करके कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मिथ्यापुरुष तो अहंकार है, जो संवेदन के चेतने से उपजा है । आकाश चिदाकाश है, उसे वह उपजा जानता है कि में आकाश की रक्षा करूँ । और गृह, घटादिक जो कहे सो विविध देह हैं । उनमें आत्मा अधिष्ठान है, उस आत्मा की रक्षा करने की इच्छा वह मूर्खता से करता है और अपने को नहीं जानता कि मेरा स्वरूप क्या है । उस अपने स्वरूप को न जानने से वह दुःख पाता है । आप मिथ्या है और मिथ्या होकर आकाश को कल्पित कर रखने की इच्छा करता है अर्थात देह में देही के रखने की इच्छा करता है कि वह जीता रहे । पर देह तो काल
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से उपजा है। फिर देह के नष्ट होने से शोकवान् होता है और अपने वास्तव स्वरूप को नहीं जानता, जिसका नाश कदापि नहीं होता। ऐसे विचार से रहित होकर जीव क्लेश पाता है। हे राम ! जिसमें भ्रम उपजा है, वह अधिष्ठान असत् नहीं होता। सबका अपना आप आत्मा है। उसका भी नाश नहीं होता। उसमें मूर्खता से अहंकारादि संसार की जीव कल्पना करता है। अहंकार, मन, जीव, बुद्धि, चित्त, माया प्रकृति और दृश्य आदि सब इसके नाम हैं। पर मिथ्या हैं। इसका अत्यन्त अभाव है। यह न होता ही उदय हुआ है और क्षत्रिय, ब्राह्मण इत्यादि वर्ण और गृहस्थादि आश्रम, मनुष्य, देवता, दैत्य इत्यादि की कल्पना करता है।
हे राम ! यह कभी हुआ ही नहीं, न होगा और न किसी काल में किसी को है। यह केवल अविचार से सिद्ध है, और विचार किये से नहीं रहता। जैसे रस्सी के अज्ञान से जीव सर्प की कल्पना करता है और जानने से अज्ञान नष्ट हो जाता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से अहंकार उदय हुआ है। तुम्हारा स्वरूप आत्मा है, जो प्रकाशरूप, निर्मल, विद्या-अविद्या के कार्यों से रहित, चैतन्यमात्र और निर्विकल्प है। वह ज्यों का त्यों स्थित है, अद्वैत है। परिणाम को कभी नहीं प्राप्त होता। आत्मतत्त्वमात्र है। उसमें संसार और अहंकार कैसे हो ? सम्यक्-दर्शी को आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता और असम्यक्दर्शी को संसार भासित होता है। वह पदार्थों को सत् जानता है, संसार को वास्तव जानता है और अपने वास्तव स्वरूप को नहीं जानता कि मैं कौन हूँ, जिसके जानने से अहंकार नष्ट हो जाता है। जितनी कुछ आपदा है, जिनकी खान अहंकार है। सब ताप अहंकार से ही उत्पन्न होते हैं। इसके नष्ट होने पर जीव अपने स्वरूप में स्थित होता है। यह विश्व भी आत्मा का चमत्कार है—भिन्न नहीं। जैसे समुद्र में पवन से नाना प्रकार के तरङ्ग और सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण जो भासित होते हैं, सो वही सागर और सुवर्ण हैं, उनसे भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से विश्व भिन्न नहीं। सुवर्ण परिणाम से भूषण और समुद्र
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परिणाम में तरङ्ग होता है। पर आत्मा अच्युत है और परिणाम को नहीं प्राप्त होता। इससे वह समुद्र और सुवर्ण से भी विलक्षण है।
आत्मा में संवेदन से चमत्कारमात्र विश्व भी आत्मस्वरूप है। वह न कभी जन्मता है, न मृत्यु को प्राप्त होता है; न किसी काल में और न किसी के हाथ से वह मरता है, ज्यों का त्यों स्थित है। जन्ममृत्यु तो तब हो जब दूसरा हो, आत्मा तो अद्वैत है। जिसको एक नहीं कह सकते तो दूसरा कहाँ से हो? इससे प्रत्यक् आत्मा अपना अनुभवरूप है। उसमें स्थित हो, जिसमें सब दुःख और ताप नष्ट हो जावें। वह आत्मा शुद्ध और निराकार है। हे राम! जो निराकार और शुद्ध है, उसे किसमें ग्रहण कीजिये, कैसे रक्षा करिये और किसकी सामर्थ्य है कि उसकी रक्षा करे। जैसे घट के नष्ट होने पर घटाकाश नहीं नष्ट होता, वैसे ही देह के नष्ट होने पर देही आत्मा का नाश नहीं होता। आत्म-सत्ता ज्यों की त्यों है और जन्ममरण पुर्यष्टका से भासित होते हैं। जब पुर्यष्टका देह से निकल जाती है, तब मृतक दीखता है और जब पुर्यष्टका से युक्त होता है, तब जीवित दीख पड़ता है। आत्मा सूक्ष्म में सूक्ष्म और स्थूल में स्थूल है। उसका ग्रहण कैसे हो और रक्षा कैसे करिये? स्थूल तो उपदेश के निमित्त कहते हैं। आत्मा तो अनिर्वचनीय और भाव अभावरूप संसार से रहित है। वह सबका अनुभवरूप है। उसमें स्थित होकर अहंकार का त्याग करो और अपने स्वरूप प्रत्यक् आत्मा में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मिथ्यापुरुषोपाख्यान-समाप्तिर्नाम नवतितमस्सर्गः ॥६०॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार आत्मरूप है। जैसे इसकी उत्पत्ति हुई है, सो सुनो। निर्विकल्प शुद्ध आत्मा में चेतन लक्षण मनरूप में स्थित हुआ है और आगे उसने जगत् की कल्पना की है। जैसे समुद्र में तरङ्ग, सुवर्ण में भूषण, रज्जू में सर्प और सूर्य की किरणों में जल का आभास होता है, वैसे ही आत्मा का विवर्त मन है; पर वह आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे जिसको तरङ्ग का ज्ञान है, उसको समुद्र
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बुद्धि नहीं होती, वह तरङ्ग को और जानता है; जिसको भूषण का ज्ञान है, वह सुवर्ण नहीं जानता; सर्प के ज्ञान से रज्जू को नहीं जानता, वैसे ही नाना प्रकार के विश्व के ज्ञान से जीव परमात्मा को नहीं जानता। जैसे जिस पुरुष ने समुद्र को जाना है कि जल है, उमको तरङ्ग और बुलबुले भी जल ही भासित होते हैं, जल से भिन्न कुछ नहीं भासित होता; और जिसको रज्जी का ज्ञान हुआ है, उसको सर्पबुद्धि नहीं होती; जिसको सुवर्ण का ज्ञान हुआ है, उसको भूषण-बुद्धि नहीं होती; और जिसको किरणों का ज्ञान हुआ है, उसको जलबुद्धि नहीं होती—ऐसा पुरुष निर्विकल्प है, वैसे ही जिस पुरुष को निर्विकल्प आत्मा का ज्ञान हुआ है, उमको संसार की भावना नहीं होती—ब्रह्म ही भासित होता है। ऐसा जो मुनीश्वर है, वह ज्ञानवान् है।
हे राम ! मन भी आत्मा से भिन्न नहीं। आदि में परमात्मा से 'अहं' 'त्वं' आदिक मन प्रकट हुआ, उममें जो अहंभाव हुआ, वह उत्थान है। बहिर्मुख होने से जीव को अपने निर्विकल्प चिन्मात्र आत्मस्वरूप का प्रमाद हुआ है और उम प्रमाद से आगे विश्व हुआ है। वास्तव में मन भी कभी उदय नहीं हुआ; आत्मस्वरूप होने के कारण उदय हुए की तरह भासित होता है। मन और संसार सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। जो दूसरी वस्तु हो तो सत् अथवा असत् कहिये, पर आत्मा तो अद्वैत ज्यों का त्यों स्थित है और उसका विवर्त मन होकर स्फुरित हुआ है। वही मन कीट है, और वही ब्रह्मा है। फिर ब्रह्मा ने मनोराज्य से स्थावर-जङ्गम सृष्टि रची है। वह सृष्टि न सत्य है और न असत्य। हे राम ! सब प्रपञ्च मन ने रचा है और उसी ने नाना प्रकार के विचार भी रचे हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, जीव आदि सब मन के ही नाम हैं। जब मन नष्ट हो जावे, तब न संसार है और न कोई विकार। यदि मन दृश्य से मिलकर कहे कि में संसार का अन्त लूँ तो कदाचित् अन्त न पावेगा क्योंकि संसरण ( जन्म-मरण ) ही संसार है, तो फिर मंसरण-संयुक्त संसार का अन्त कहाँ ? अन्त लेनेवाला वाणी से आगे उठकर देखता है। जैसे कोई
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पुरुष दौड़ता जाय और कहे कि मैं अपनी परछाहीं का अन्त लूँ कि कहाँ तक जाती है, तो हे राम! जब तक वह पुरुष चला जायगा, तब तक परछाहीं का अन्त नहीं होगा और जब ठहर जायगा, तब परछाहीं का अन्त हो जायगा, वैसे ही जब तक वासना है, तब तक संसार का अन्त नहीं होता और जब वासना नष्ट हो जाती है, तब संसार का भी अन्त होता है और आत्मा ही दृष्टिगोचर होता है और संसार का अत्यन्त अभाव हो जाता है। पर जो स्फूर्ति-संयुक्त देखेगा, तो संसार ही भासित होगा।
हे राम! जिस पदार्थ को मन देखता है, वह पदार्थ पहले कोई नहीं, चित्त के चेतने से उदय होता है। जब चित्त चेता कि यह पदार्थ है, तब आगे पदार्थ हुआ। चित्त यदि स्फूर्ति या वासना से रहित होकर देखे तो कोई पदार्थ नहीं भासित होता, केवल शान्तपद है। हे राम! तुम अहंकार का त्याग करके, इस नाना प्रकार की कल्पना से रहित निर्विकल्प ब्रह्मपद में स्थित हो। अहंकार नामरूपात्मक है और देह तथा वर्णाश्रम में माया से कल्पित है। जब अहंकार से रहित होकर देखोगे, तब केवल सचिदानन्द आत्म-पद शेष रहेगा। और जब उस पद को अपना रूप जानोगे, तब तुमही सर्वात्मा होकर विचरोगे और तुमको कोई दुःख न रहेगा। हे राम! मन ही संसार है। ब्रह्मा से कीट पर्यन्त सब मन की ही रचना है। मन ही सुमेरु है और मन ही तृण है। मन ही विश्वरूप होकर स्थित हुआ है। वह मन भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे फल ही में समूचा वृक्ष होता है, वैसे ही मन आत्मस्वरूप है; आत्मा से भिन्न मन कुछ वस्तु नहीं। ऐसे जानकर आत्मस्वरूप होओगे। यह जो बन्धन और मोक्ष संज्ञा है, इनका त्याग करो, न बन्धन की वाञ्छा करो और न मोक्ष की इच्छा करो। इस कल्पना से रहित हो; ऐसे न सोचो कि तुम मुक्त हो और यह बन्धन है, केवल सत्तासमान आत्मपद में स्थित होओ। वही भावना करो, जिससे तुम्हारा सब दुःख नष्ट हो जाय। ऐसा जो पुरुष हो जाता है, उसका चित्तभाव नहीं रहता। उसको
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सर्वत्रआत्मा देख पड़ता है । जैसे जिस पुरुष ने सूर्य को जाना है, उसको किरणें भी सूर्य ही दीखती हैं, वैसे ही जिसको आत्मा का साक्षात्कार हुआ है, उसको जगत् भी आत्मस्वरूप देख पड़ता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशो- नामैकनवतितमसर्गः ॥ ९१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी होकर रहो और सब शङ्काओं को त्यागकर निरन्तर धैर्य धारण कर स्थित होओ । राम ने पूछा, हे भगवन् ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी किसे कहते हैं, सो कृपा करके कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम्हारे प्रश्न पर एक आख्यान है, सो सुनिये । एक समय सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा के शिखर में सदाशिवजी आये । वह चन्द्रमा को मस्तक में धारण किये थे । गणों सहित गौरी बायें अङ्ग में उनके साथ थीं । तब भृङ्गीगण ने, जो महातेजस्वी था और जिसे आत्म-जिज्ञासा उपजी थी, हाथ जोड़कर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! देवों के देव ! यह संसार मिथ्या भ्रम है; इसमें में सत्य पदार्थ कोई नहीं देखता । यह सदा चलरूप भासित होता है । जो सत् पदार्थ है, उसको मैं नहीं जानता । मेरे ताप नष्ट नहीं हुए और मैं शान्त नहीं हुआ, इसमें अपने को दुःखी देखता हूँ । जिससे शान्ति हो सो कृपा करके कहो, जिसमें खेद से रहित होकर मैं चेष्टा में विचरूँ । पर खेद से रहित तो तब होता है, जब कोई आश्रय होता है । संसार तो मिथ्या है, मैं किसका आश्रय करूँ ? इससे मुझसे यह कहिये कि किसका आश्रय करने से मेरे दुःख नष्ट होंगे ?
ईश्वर बोले, हे भृङ्गिन् ! तुम महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी हो रहो और सब शङ्काओं को त्यागकर निरन्तर धैर्य का आश्रय करो; इससे तुम्हारे दुःख नष्ट होंगे । हे राम ! भृङ्गीगण ने, जिसको शिवजी ने पुत्र करके रखा है, यह सुनकर प्रश्न किया कि हे परम-ेश्वर ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी किसे कहते हैं; सो कृपा करके मुझसे कहिये ? ईश्वर बोले, हे पुत्र ! सर्वात्मा, जो अनुभवरूप
२८० * योगवासिष्ठ *
है, उसका आश्रय करके विचरो। तब दुःख से रहित होगे। इन तीनों वृत्तियों में तुम्हारे दुःख नष्ट हो जायेंगे। जो कुछ शुभ क्रिया आकर प्राप्त हो, उसकी शङ्का त्याग कर जो करे, वह पुरुष महाकर्ता है। धर्म-अधर्म क्रिया जो अनिच्छित प्राप्त हो, उसको रागद्वेष से रहित होकर जो करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुरुष मौनी, निरहंकार, निर्मल और मत्सर से रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जो अनिच्छित प्राप्त हुए का त्याग न करे और जो नहीं प्राप्त हुआ उसकी वाञ्छा न करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुण्य-पाप क्रियाएँ अनिच्छित प्राप्त हों उनको अहंकार से रहित होकर करे, पुण्यक्रिया करने से अपने को पुण्यवान् न माने और पाप करने में पापी न माने; सदा अपने को अकर्ता जाने, वह पुरुष महाकर्ता है जो सर्वत्र विगतस्नेह है, सत्यवत् स्थित है और इच्छा को त्यागकर बरतता है, वह महाकर्ता है। जो दुःख के प्राप्त होने पर शोक नहीं करता और सुख के प्राप्त होने पर जिसे हर्ष नहीं होता, स्वाभाविक चित्त समता को देखता है, वह कभी विषमता को नहीं प्राप्त होता। सुख की भिन्न-भिन्न विषमताओं में जो रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जिस पुरुष ने सुख-दुःख का त्याग किया है वह पुरुष महाकर्ता है।
हे बुद्धिन्! जो पुरुष प्राप्त हुई वस्तु को रागद्वेष से रहित होकर भोगता है, वह महाभोक्ता है। जो बड़ा कष्ट प्राप्त होने पर भी द्वेष नहीं करता और बड़े सुख की प्राप्ति में जिसे हर्ष नहीं होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो बड़े राज्य के सुख भोगने में अपने को सुखी नहीं मानता, राज्य के अभाव में और भिक्षा माँगने में अपने को दुःखी नहीं मानता, सदा स्वरूप में स्थिर रहता है, वह महाभोक्ता है। जो मान, अहंकार और चिन्तना से रहित केवल समता में स्थित है, वह महाभोक्ता है। जो कोई कुछ दे तो अपने को लेनेवाला नहीं मानता और शुभ क्रिया में भोगता हुआ अपने में कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं मानता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो मीठा, खट्टा, कषाय, तीक्ष्ण, सलोना, कटु, इन छहों रसों के भोगने में समचित्त रहता है और सम जानता है, वह महाभोक्ता