योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २५३
हाथ लगाया और देह में देह का स्पर्श कर देखा कि राजा के शरीर में प्राण हैं। फिर भविष्य का विचार किया कि इसका सत्त्व शेष रहता है, इससे जीवन्मुक्त होकर राज्य में विचरेगा। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुमने कहा कि राजा काष्ठ और पाषाण की नाईं स्थित हुआ और फिर कहा कि कुम्भज ने हाथ लगाकर देखा कि इसमें प्राण हैं तो कुम्भज ने क्योंकर जाना ? यह मुझको संशय है, सो दूर करो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिस शरीर में पुर्यष्टका होती है, उसमें कान्ति होती है। हे राम! अज्ञानी का चित्त रहता है और ज्ञानी का सत्त्व रहता है, जो प्रारब्ध के वेग से जगता है और ब्रह्माकार वृत्ति जगने से फिर शरीर पाता है। ज्ञानी इष्ट-अनिष्ट में एक समान रहता है और अज्ञानी एक समान नहीं रहता; वह इष्ट में प्रसन्न और अनिष्ट की प्राप्ति में शोकवान् होता है।
हे राम! ज्ञानी जब शरीर को त्यागता है, तब ब्रह्मसमुद्र में स्थित होता है, और जब तक सत्त्व शेष है, तबतक चेतना काम करती है। अज्ञानी जब शरीर को त्यागता है, तब उसमें सूक्ष्म संसार होता है—जैसे बीज में वृक्ष, फूल और फल सूक्ष्मता से स्थित होता है और काल पाकर फिर निकलता है, उसी प्रकार राजा का सत्त्व शेष रहता था, इस कारण फिर वह जगेगा। तब कुम्भजरूप चूडाला ने विचार किया कि इसके भीतर प्रवेश करके जगाऊँ। जो मैं न जगाऊँगी तो भी नियति से इसे जागना है। ऐसे विचारकर उसने अपने शरीर को त्यागा और चेतनता में स्थित हो; चेतना को लेकर उसमें प्रवेश किया, और उसकी चेतनता का जो सत्त्व शेष था, उसको फोड़ा और बड़ा क्षोभ किया। जब राजा वहाँ मे हिला, तब आप निकल आई और अपने शरीर में प्रवेश किया। जैसे पखेरू आकाश में उड़ता है और फिर झाँझ में आकर प्रवेश करता है, वैसे ही वह अपने शरीर में आकर स्थित हुई और साम-वेद का गायन मधुर स्वर से करने लगी।
राजा यह सुनकर कि कोई सामवेद गाता है, जागा और देखा कि कुम्भज मुनि बैठे हैं। इन्हें देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और फूल और जल
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चढ़ाकर बोला, हे भगवन् ! मेरे बड़े भाग्य हैं-मैं आपका दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुआ । हे भगवन् ! कुम्भरूपी कुलाचल पर्वत है, उसमें जो देह-रूपी वृक्ष है, वह अब फूला है और तुमने हमको पावन किया है । हे भगवन् ! किसी की सामर्थ्य नहीं कि तुम जैसों के चित्त में प्रवेश करे । जिसमें सर्वदा आत्मा का निवास है, उस चित्त में मेरी स्मृति हुई है, जिससे आपका दर्शन पाया । इससे मेरे बड़े भाग्य हैं । हे भगवन् ! अमृतरूपी वचनों से तुमने प्रथम मुझे पवित्र किया था और अब स्मरण करके मुझे और पावन किया है । कुम्भज बोले, हे राजन् ! तुम्हार दर्शन करके में भी बहुत प्रसन्न हुआ हूँ और तुम्हारी जैसी प्रीति मैंने आगे किसी में नहीं देखी । हे राजन् ! तुम्हारे निमित्त मैं स्वर्ग में आया हूँ । स्वर्ग के सुख मुझे भले न लगे और तुम बहुत प्रियतम हो, इसी से मैं आया हूँ । अब में स्वर्ग को भी न जाऊूँगा, तुम्हारे ही पास रहूँगा । राजा बोले, हे भगवन् ! जिस पर तुम जैसों की कृपा होती है, उसको स्वर्ग आदिक सुख भले नहीं लगते तो तुम्हारी क्या बात है ? यह वन है और यह झोंपड़ी है, इसमें विश्राम करो; मेरे बड़े भाग्य हैं, जो तुम्हारा चित्त यहाँ लगता है ।
कुम्भज बोले, हे राजन् ! अब तुम्हें शान्ति प्राप्त हुई है और संकल्प-रूप बीज नष्ट हुआ है । जैसे नदी के किनारे पर की बेलि जल के प्रवाह से मूलसमेत गिरती है, वैसे ही तुम्हारे संकल्पबीज नष्ट हुए हैं । अब तुम यथाप्राप्ति में सन्तुष्ट हो कि नहीं और हेयोपादेय से रहित हुए हो कि नहीं और जो पाने योग्य पद है सो पाया है कि नहीं ? अपना अनुभव कहो । राजा बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से अब मैंने सबसे श्रेष्ठ पद पाया है, जहाँ संसारसीमा का अन्त है । अब मुझे उपदेश का अधिकार नहीं रहा; क्योंकि मेरे सम्पूर्ण संशय नष्ट हुए हैं और हेयोपादेय से रहित हूँ, इसमें सुखी विचड़ता है । जो कुछ जानना चाहिये था सो भी मैंने जाना है । अब मुझको कोई संशय नहीं रहा और में सब ठौर तृप्त, नित्य, नामरूप आत्मा अपने निर्मल स्वभाव में स्थित, सर्वात्मा और निर्विकल्प हूँ ।
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २५५
मुझमें कोई वासना नहीं; मैं शान्तरूप और चिरपर्यन्त सुखी हूँ।
इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार राजा और कुम्भज का तीन मुहूर्त्त संवाद हुआ। फिर उसके उपरान्त दोनों उठ खड़े हुए और चले। निकट एक तालाव था, जहाँ बहुत कमलिनी लगी थीं। वहाँ पहुँच दोनों ने स्नान करके गायत्रीजप और सन्ध्या की और पूजा करके फिर वहाँ से चले और वन कुञ्जों में आये। तब कुम्भज ने कहा, चलिये। राजा ने कहा, अच्छी बात है चलिये। निदान दोनों चले और बहुत नगरों, देशों, ग्रामों और तीर्थों को देखते हुए नाना प्रकार के वनों में, जो फूल और फलसंयुक्त थे, और मरुस्थल में विचरे। हे राम! ऐसे तीर्थ आदिक सात्त्विकी स्थानों, सुन्दर वन आदिक राजसी स्थानों और मरुस्थलादिक तापसी स्थानों में वे विचरे पर हर्ष या शोक को न प्राप्त हुए और समता में रहे। हे राम! कुम्भज के फिरने का यह प्रयोजन था कि देखें, राजा शुभ-अशुभ स्थानों को देखकर हर्ष-शोक करेगा अथवा न करेगा। पर राजा हर्ष-शोक को न प्राप्त हुआ। फिर उन्होंने बड़े पर्वतों की कन्दरा, वन कुञ्ज और बड़े दुर्गम स्थान देखे और एक बन में जा रहे। कुछ काल में राजा और कुम्भज एक ही में हो गये। दोनों इकट्ठे स्नान करें; एक ही में जप जपें; एक सी पूजा करें। दोनों एक से सुहृद् हुए। किसी ठौर वे शरीर में भस्म लगाते, किसी ठौर चन्दन का लेप करते, किसी ठौर शरीर में भस्म लगाते, किसी ठौर दिव्य वस्त्र पहिनते, किसी ठौर केले के पत्तों पर सोते, किसी ठौर फूल की शय्या पर और कभी कष्टदायक स्थानों में शयन करते।
हे राम! ऐसे शुभ-अशुभ ठौरों में भी वे ज्यों के त्यों रहे और हर्ष-शोक को न प्राप्त हुए। केवल शुद्ध सत्त्व में वे दोनों स्थित रहे और आत्मा के सिवा और कुछ न फुरा। एक बार रानी के मन में विचार हुआ कि यह मेरा भर्ता है, मैं इसको भोगूँ, क्योंकि हमारी यही अवस्था है। जो भले कुल की स्त्री हैं, वे भर्ता को प्रसन्न रखती हैं। राजा का शरीर भी देवता का सा हो गया है और स्थान भी शुभ है। जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी साथ हैं। फिर विचार किया कि राजा की
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परीक्षा भी करूँ कि क्या कहता है । इतना विचारकर कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! अब हम स्वर्ग में जाते हैं, क्योंकि चैत्रशुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्माजी ने सृष्टि उत्पन्न की है; इसी दिन वर्ष के वर्ष उत्सव होता है । और वहाँ नारदमुनि भी आवेंगे । मेरे आने तक तुम समाधि में रहना । जब समाधि से उतरोगे तो फूलों को देखना । ऐसे कहकर उसने फूलों की मञ्जरी राजा को दी और राजा ने भी कुम्भज को फूल की मञ्जरी दी । जैसे नन्दनवन में स्त्री भर्ता के हाथ में दे और भर्ता स्त्री के हाथ में दे, वैसे ही परस्पर दोनों ने दी । फिर कुम्भज आकाश को उड़ा और जैसे मेघ को मोर देखता है, वैसे ही राजा देखता रहा । जहाँ तक राजा की दृष्टि जाती थी, वहाँ तक रानी ने कुम्भज का शरीर रखा और जब दृष्टि से अगोचर हुई तब फूलों की माला जो गले में थी। तोड़कर राजा के ऊपर डाल दी और चुड़ाला का शरीर धारणकर आकाश को लाँघ अपने अन्तःपुर में पहुँची । निदान राजा के स्थान पर बैठकर सबको अपने-अपने स्थानों में स्थित किया और प्रजा की खबरें सुनकर फिर उड़ी । सूर्य की किरणों के मार्ग से मेघमण्डल को लाँघती हुई जहाँ राजा का स्थान था, वहाँ आकर देखा कि राजा वियोग से शोकवान् है, इसलिए आप भी कुम्भज के रूप में उदास राजा के आगे आई ।
राजा ने कहा, हे भगवन् ! तुमको शोक कैसे हुआ है ? ऐसा कौन कष्ट तुमको मार्ग में हुआ है ? सब दुःखों का नष्ट करनेवाला ज्ञान है । जो तुम ऐसे ज्ञानवानों को शोक हो तो औरों की क्या बात कहनी है । हे मुनि ! तुमको दुःख का कारण कोई नहीं, तुम क्यों शोकवान् होते हो, तुमको कौन अनिष्ट प्राप्त हुआ है ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! मुझको एक दुःख है, सो कहता हूँ । जो मित्र बूझे तो मन ही कहना चाहिए और दुःख भी नष्ट होता है जैसे मेघ जड़ और श्याम होता है और उसका स्वजन जो खेत और पृथ्वी हैं, उनके ऊपर वह वर्षा करता है तो उसकी जड़ता और श्यामता नष्ट होती है—इससे मैं तुमसे कहता हूँ । हे राजन् ! जबतक स्वर्ग में सभा स्थित थी, तबतक मैं नारद के पास
- निर्वाण प्रकरण * २५७
रहा । जब सभा उठी, तब नारदमुनि भी उठे और मुझसे कहा कि जहाँ तेरी इच्छा हो, वहाँ जा और मैं भी जाता हूँ । नारद एक ही जगह में नहीं ठहरते, विश्व में घूमते फिरते हैं । तब मैं आकाश को चला तो एक जगह सूर्य से मिलाप हुआ और में मेघमार्ग में तीव्र वेग से चला । जैसे नदी पर्वत से तीव्र वेग से आती है, वैसे ही में तीव्र वेग से चला आता था । मैंने देखा कि दुर्वासा ऋषीश्वर महामेघ की तरह श्यामवस्त्र पहिने हुए और भूषणसंयुक्त जैसे बिजली का चमत्कार होता है, वेगे उड़े आते हैं । भूषणों का चमत्कार देखकर मैंने दण्डवत् करके कहा, हे मुनीश्वर ! तुमने क्या रूप धरा है जो स्त्रियों का सा लगता है ?
दुर्वासा ने तब रुष्ट होकर मुझसे कहा, हे ब्रह्मा के पौत्र ! तू क्या कहता है ? ऐसा मुनीश्वर के प्रति कहना उचित नहीं । हम क्षेत्र हैं; जैसा बीज क्षेत्र में बोइये वैसा ही उगता है । तूने मुझे स्त्री कहा है, इससे तू भी स्त्री होगा और रात्रि को तेरे सब अंग स्त्री के हो जायँगे । हे मुनीश्वर ! जो कल्याणकृत ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनमें नम्रता होती है । जैसे फल-संयुक्त वृक्ष नम्र होता है, वैसे ही ज्ञानी भी नम्र होता है । ऐसे वचन तुझे न कहना चाहिए । हे राजन् ! यह सुनकर मैं तुम्हारे पास चला आया हूँ और मुझे लज्जा आती है कि स्त्री का शरीर रखकर देवताओं के साथ में कैसे विचरूँगा—यही मुझको सोच है । राजा ने कहा, क्या हुआ जो दुर्वासा ने कहा और स्त्री का शरीर हुआ । तुम तो शरीर नहीं, निर्लेप आत्मा हो । हे मुनीश्वर ! तुम अपनी समता में स्थित रहते हो । ज्ञानवान् पुरुष को हेय उपादेय कुछ नहीं रहता । वह तो अपनी समता में स्थित रहता है ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! तुम सत्य कहते हो । मुझे क्या दुःख है ? जो शरीर का प्रारब्ध है, सो होता है । यह ईश्वर का नियम है कि जब तक शरीर रहता है, तब तक शरीर के स्वभाव भी रहते हैं । शरीर का स्वभाव त्याग करना भी मूर्खता है । जिस स्थान में ज्ञान की प्राप्ति हो, उसी चेष्टा में विचरिये । इन्द्रियों को रोकना और मन में विषय की चिन्तना करना भी मूर्खता है । इन्द्रियों और देह की
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चेष्टा ज्ञानवान् भी करते हैं; परन्तु उसमें बँधते नहीं। इन्द्रियाँ विषय में वरतती हैं। ईश्वर का आदि नियम इसी प्रकार है।
हे राजन्! नियम या नीति का त्याग किसी में नहीं किया जाता-इससे उसका क्यों त्याग करिये। यह नीति है कि जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी होते हैं। जैसे जब तक तिल है, तब तक तेल भी होता है; वैसे ही जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी होते हैं। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे देह और इन्द्रियों में चेष्टा भी करते हैं, परन्तु उसमें बँधते नहीं। पर अज्ञानी उसमें बँध जाते हैं। चेष्टा तो ज्ञानी भी करते हैं, अज्ञानी भी करते हैं। जैसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि जो ज्ञानवान् हैं, वे सब चेष्टाएँ करते हैं, परन्तु किसी में नहीं बँधते। हे राजन्! वैसे जो अनिच्छित आकार प्राप्त हो और जिसको शास्त्र प्रमाण करें, उसको भोगने में कुछ दोष नहीं। राजा बोले, हे भगवन्! ज्ञानवान् को दोष कुछ नहीं। जो सत्ता समान में स्थित है, उसे कुछ दोष नहीं होता। अज्ञानी शरीर के दुःख अपने में देखता है, उनमे दुःखी होता है और ज्ञानवान् शरीर के दुःख अपने में नहीं देखता। हे राम! इतने में सूर्य अस्त हुआ। तब राजा और कुम्भज दोनों ने सायंकाल में सन्ध्या करके जप किया। जब रात्रि हुई, तारागण निकले और सूर्यमुखी कमलों के मुख मूँद गये, तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! देखो, मेरे सिर के बाल बढ़ते जाते हैं, वस्त्र भी टखने तक हो गये हैं और स्तन भी स्त्री की नाईं हैं।
निदान चुड़ाला लक्ष्मी की नाईं महासुन्दर स्त्री हो गई। उसको देखकर राजा को एक मुहूर्त्त शोक रहा। उसके उपरान्त सावधान होकर बोला, हे मुनि! क्या हुआ जो तुम्हारा शरीर स्त्री का हुआ? तुम तो शरीर नहीं, आत्मा हो-इससे शोक क्यों करते हो? तुम अपनी सत्ता समान में स्थित रहो। जब रात्रि हुई तब रानी ने महासुन्दर रूप रचकर फूलों की शय्या बिछाई और उस पर दोनों इकट्ठे सोये। हे राम! समस्त रात्रि उनकी कोई वासना नहीं जागी। दोनों सत्ता समान में स्थित रहे और मुखमे कुछ न बोले। जब प्रातःकाल हुआ, तब फिर रानी
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ने कुम्भज का शरीर रखकर स्नान किया और गायत्री जप आदि कर्म किये । इसी प्रकार चुड़ाला रात्रि को स्त्री बन जाती और दिन को कुम्भज पुरुष का शरीर रखती । जब कुछ काल ऐसे बीता तब दोनों वहाँ से चलकर सुमेरु पर्वत के ऊपर गये और मन्दराचल और अस्ताचल पर्वत आदि सब सुख-दुःख के स्थानों को देखा । पर एक दृष्टि को लिये रहे । न किसी को हर्ष हुआ और न शोक, ज्यों के त्यों रहे । जैसे पवन से सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता, वैसे ही शुभ-अशुभ स्थानों में वे समान रहे ।
इति श्रीयो० निर्वा० शिखिध्वजस्त्रीप्राप्तिर्नाम द्व्यशीतितमसर्गः ॥ ८२ ॥
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार विचरते विचरते वे मन्दराचल की कन्दरा में पहुँचे तो वहाँ कुम्भजरूप चुड़ाला ने राजा से परीक्षा के निमित्त कहा, हे राजन् ! जब मैं रात्रि को स्त्री होती हूँ, तब मुझे भर्ता के भोगने की इच्छा होती है; क्योंकि ईश्वर का नियम ऐसा ही है कि स्त्री को अवश्यमेव पुरुष चाहिए । जो उत्तम कुल का पुरुष होता है उसको कन्या विवाह करके पिता देता है अथवा जिसको स्त्री चाहे उसको आप देख ले । इससे हे राजन् ! मुझे तुमसे अधिक कोई नहीं देख पड़ता । तुम मेरे भर्ता हो और मैं तुम्हारी स्त्री हूँ । तुम मुझे अपनी भार्या जानकर जो कुछ स्त्री-पुरुष चेष्टा करते हैं सो किया करो । मेरी अवस्था भी यौवन है और तुम भी सुन्दर हो । ज्ञानवान् अनिच्छित प्राप्त हुए का त्याग नहीं करते । यदि तुमको इच्छा न हो तो भी ईश्वर की नीति इसी प्रकार है । उसके उल्लंघन से क्या सिद्ध होगा ? जो अपनी स्वरूपसत्ता में स्थित है, उसको ग्रहण-त्याग की कुछ इच्छा नहीं, परन्तु जो नीति है वह करनी चाहिए । राजा बोला, हे साधु ! जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो, मुझको तो तीनों जगत् आकाशरूप भासित होते हैं । मुझे प्राप्त होने में कुछ सुख नहीं और अप्राप्ति में दुःख नहीं और न कुछ हर्ष-शोक है । जो तुम्हारी इच्छा हो, सो करो ।
कुम्भज बोले, हे राजन् ! आज ही पूर्णमासी का भला दिन है और मैंने आगे में लग्न भी गिन रखा है, इससे मन्दराचल पर्वत की
२६० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
कन्दरा में बैठकर विवाह करें। निदान राजा और कुम्भज दोनों उठे और जो कुछ सामग्री शास्त्र की रीति में थी, वे इकट्ठी कर दोनों ने गङ्गा में स्नान किया। वस्त्र, फूल, फल आदि जो विवाह की सामग्री है सो एकत्र की। कल्पवृक्ष से लेकर दोनों ने फल भोजन किये। सूर्य अस्त हुआ तो दोनों ने सन्ध्योपासन किया। कुम्भज ने राजा को दिव्य वस्त्र और भूषण पहिनाये और सिर पर मुकुट रक्खा। फिर कुम्भज ने अपना शरीर त्यागकर स्त्री का शरीर धारण किया और राजा से बोला, हे राजन्! अब तू मुझे भूषण पहिना। तब राजा ने सम्पूर्ण भूषण, फूल और वस्त्र उसे पहिनाये और वह पार्वती की नाईं सुन्दर बनी। तब चुडाला ने कहा, हे राजन्! में अब तेरी स्त्री हूँ और मेरा नाम मदनिका है। तुम मेरे भर्ता हो—मुझे तुम कामदेव से भी सुन्दर लगते हो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इसी प्रकार चुडाला ने बहुत कुछ कहा, तो भी राजा का चित्त हर्ष को न प्राप्त हुआ और वह विराग से शोकवान् भी न हुआ—ज्यों का त्यों रहा। इसके उपरान्त जब विवाह का आरम्भ हुआ तो चन्दन आदि सामग्री और सुवर्ण के कलश पास रखकर देवताओं का पूजन किया और जो शास्त्र की विधि थी, वह सम्पूर्ण करके मङ्गल किया। फिर रानी ने यह संकल्प किया कि सम्पूर्ण ज्ञाननिष्ठा तुम्हें दी और राजा ने संकल्प किया कि सम्पूर्ण ज्ञाननिष्ठा तुझे दी। जब रात्रि एक पहर रही, तब राजा और रानी ने फूलों की शय्या बिछाकर शयन किया और आपस में चर्चा ही करते रहे, सम्भोग कुछ न किया। प्रातःकाल कुम्भज ने स्त्री का शरीर त्यागकर कुम्भज का शरीर धरा और स्नान-संध्यादिक कर्म किये। हे राम! इसी प्रकार एक मास पर्यन्त मन्दराचल पर्वत में वे रहे। रात्रि को रानी स्त्री का शरीर रखती और दिन को कुम्भज का शरीर धरती। जब तीसरा दिन होता, तब राजा को शयन कराकर राज्य की सुध लेती और फिर आकर राजा के पास शयन करती।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विवाहलीलावर्णनं नाम त्र्यशीतितमस्सर्गः ॥ ८३ ॥
ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ २६१
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब वहाँ से वे चले तो अस्ताचल पर्वत में जाकर रहे और उदयाचल, सुमेरु, कैलास इत्यादिक पर्वतों की कन्दराओं और वनों में रहे। कहीं एक मास, कहीं दस मास, कहीं पाँच दिन, कहीं सात दिन रहे। इसी तरह जब एक वन में आये, तब रानी ने विचार किया कि इतने स्थान राजा को दिखाये, तो भी इसका चित्त किसी में नहीं बँधा, इसमें अब और परीक्षा लूँ। ऐसे विचार-कर उसने अपनी ऐसी माया फैलाई कि तैंतीस कोटि देवता सहित इन्द्र के आगे किन्नर, गन्धर्व, सिद्ध और अपसरा नृत्य करती आईं। सर्वसामग्री संयुक्त इन्द्र को देखकर राजा उठा और बहुत प्रीति से उसकी पूजा करके बोला, हे त्रैलोक्य के पति ! तुम किस लिये वन में आये हो सो कहो ? इन्द्र ने कहा, हे राजन् ! जैसे पक्षी ऊपर आकाश में उड़ता है और उसकी पेटी में तागा होता है उससे उड़ता हुआ भी नीचे आता है, वैसे ही हम ऊर्ध्व के वासी तप और शुभ लक्षणों के तागेरूपी गुणों को श्रवण करके स्वर्ग से खिंचे चले आते हैं—इस प्रकार हमारा आना हुआ है। इससे हे राजन् ! तुम स्वर्ग को चलो और स्वर्ग में स्थित होकर दिव्य भोगों को भोगो। ऐरावत हाथी पर अथवा उच्चैःश्रवा घोड़ा, जो क्षीरसमुद्र के मथन से निकला है, उस पर सवार होकर चलो। अणिमा, महिमा, गरिमा आदि आठ सिद्धियाँ भी विद्यमान हैं। जो इच्छा हो, सो लो और स्वर्ग में चलो। हे राजन् ! तुम तत्त्ववेत्ता हो, तुमको ग्रहण या त्याग करना कुछ नहीं रहा। परन्तु जो अनिच्छित प्राप्त हो, उसका त्याग करना योग्य नहीं—इससे स्वर्ग में चलो।
राजा बोले, हे देवराज ! जाना वहाँ होता है, जहाँ आगे न गया हो, और जहाँ आगे ही गये हो, वहाँ कैसे जावें ? हे देवराज ! हमको सब जगह स्वर्ग ही देख पड़ता है। जो वहाँ स्वर्ग हो और यहाँ न हो, तो जाना भी उचित है; परन्तु जहाँ हम बैठे हैं, वहीं हमें स्वर्ग भासित होता है; इससे हम कहाँ जावें ? हमको तीनों लोक स्वर्ग ही दीखते हैं और सदा स्वर्गरूप जो आत्मा है हम उसी में स्थित हैं। हमको सर्वत्र
२६२ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
स्वर्ग है, हम सदा तृप्त और आनन्दरूप हैं। इन्द्र बोले, हे राजन्! जो विदित-वेद्य पूर्णबोध हैं, वे भी यथाप्राप्त भोगों को सेवते हैं तो तुम क्यों नहीं सेवते? इन्द्र ने ऐसा जब कहा, तब राजा इतना कहकर चुप हो गया। फिर इन्द्र ने कहा—भला जो तुम नहीं आते तो हमही जाते हैं। तुम्हारा और कुम्भज का कल्याण हो। हे राम! ऐसा कहकर इन्द्र उठ खड़ा हुआ और चला, पर जब तक वह देख पड़ता था, तब तक देवता भी साथ दीखते थे, फिर जब दृष्टि से अगोचर हुए तब अन्तर्धान हो गये। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर फिर लीन हो जाते हैं और जाना नहीं जाता कि कहाँ गये, वैसे ही इन्द्र अन्तर्धान हो गया। वह इन्द्र कुम्भजरूप चूडाला के सङ्कल्प से उठा था। जब सङ्कल्प लीन हुआ, तब अन्तर्धान हो गया। चूडाला ने देखा कि ऐसे ऐश्वर्य, सिद्धि और अप्सराओं के प्राप्त होने पर भी राजा का चित्त समता में रहा और किसी पदार्थ में नहीं बँधा।
इति श्री० नि० मायाशक्रागमनवर्णनं नाम चतुरशीतितमस्सर्गः ॥ ८४ ॥
वसिष्ठजी बोले, हे राम! जब चूडाला इन्द्र का छल कर चुकी, तब विचारने लगी कि ऐसा चरित्र मैंने राजा को मोहने के निमित्त किया तो भी राजा किसी में नहीं बँधा और ज्यों का त्यों ही रहा। बड़ा कल्याण हुआ कि राजा सत्तासमान में स्थित रहा—इससे बड़ा आनन्द हुआ। अब और चरित्र करूँ, जिसमें इसको क्रोध और खेद दोनों हों। ऐसे विचारकर राजा की परीक्षा के निमित्त उसने यह चरित्र किया कि जब सायंकाल का समय हुआ, तब गङ्गा के किनारे राजा संध्या करने लगा और कुम्भज वन में रहा। उसने वहाँ सङ्कल्प का मन्दिर रचा। जैसी देवताओं की रचना होती है, वैसी ही मन्दिर के पास फूलों की एक बाड़ी लगाई और उसमें कल्पवृक्ष आदि नाना प्रकार के फूल-फल-संयुक्त वृक्ष रचे। फिर सङ्कल्प से शय्या रचकर एक सङ्कल्प का महासुन्दर पुरुष रचा और उसके साथ अङ्ग से अङ्ग लगा और गले में फूलों की माला डाल कामचेष्टा करने लगी। जब राजा सन्ध्या कर चुका तो रानी को देखने लगा, पर वह न देख पड़ी। निदान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते
निर्वाण प्रकरण २६३
उस मन्दिर के निकट आया तो क्या देखा कि एक कामी पुरुष के साथ मदनिका सोई हुई है और दोनों कामचेष्टा करते हैं। तब राजा ने विचारा कि भले आराम से दोनों सो रहे हैं, इनके आनन्द में विघ्न क्यों कीजिये।
हे राम ! इस प्रकार राजा ने अपनी स्त्री को देखा तो भी शोकवान् न हुआ और क्रोध भी न किया, ज्यों का त्यों शान्तपद में स्थित रहा। मन्दिर के बाहर निकल के वहाँ एक सुवर्ण की शिला पड़ी थी उस पर आकर बैठा और आधे नेत्र मूँदकर समाधि में स्थित हुआ। दो घड़ी के उपरान्त मदनिका कामी पुरुष को त्यागकर बाहर आई और राजा के निकट आकर अङ्गों को नग्न किया और फिर वस्त्रों से ढका। जैसे और स्त्रियाँ काम से व्याकुल होती हैं, वैसे ही चुडाला को देखकर राजा ने कहा; हे मदनिका ! तू ऐसे सुख को त्यागकर क्यों आई है ? तू तो बड़े आनन्द में मग्न थी। अब वहीं फिर जा। मुझे तो हर्प या शोक कुछ नहीं। मैं ज्यों का त्यों हूँ। परन्तु तेरी और कामी पुरुष की प्रीति परस्पर देखी है । जगत् में परस्पर ऐसी प्रीति नहीं होती। इससे तू उसको सुख दे, वह तुझे सुख दे । तब मदनिका लज्जा से सिर को नीचे करके बोली, हे भगवन् ! क्षमा करो। मुझ पर क्रोध न करो। मुझसे बड़ी अवज्ञा हुई है, परन्तु मैंने जानकर नहीं की। सारा वृत्तान्त सुनो। जब तुम सन्ध्या करने लगे, तब मैं बन में आई तो वहाँ एक कामी पुरुष का मिलाप हुआ। मैं निर्बल थी और वह बली था। उसने पकड़कर मुझे गोद में बैठा लिया और जो कुछ इच्छा थी सो किया। मैंने जो पतिव्रता स्त्री की मर्यादा थी, उसके अनुसार उस पर क्रोध किया और उसका निरादर किया और पुकार भी की—ये तीनों पतिव्रता की मर्यादा हैं सो मैंने की—परन्तु तुम दूर थे और वह बली था, मुझसे उसने बलात्कार किया। हे भगवन् ! मुझमें कुछ दोष नहीं, इससे तुम क्षमा करके क्रोध न करो।
राजा बोले, हे मदनिका ! मुझे कभी क्रोध नहीं होता। आत्मा ही सर्वत्र दीखता है, तब क्रोध किस पर करूँ। मुझे न कुछ ग्रहण करना
२६४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है और न त्याग करना है, तथापि यह कर्म साधुओं में निन्दित है। इससे मैंने अब तेरा त्याग किया है। अब सुख से विचरूँगा। मेरा गुरु जो कुम्भज है, वह मेरे पास ही है। वह और मैं सदा बीतराग हैं। तू तो दुर्वासा के शाप से उपजी है। तुझसे मुझे क्या प्रयोजन है, तू अब ऊर्मी के पास जा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मायापिञ्जरवर्णनं नाम पञ्चाशीतितमस्सर्गः ॥ ८५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तब मदनिका नाम की चूडाला ने विचार किया कि बड़ा कार्य हुआ, जो राजा आत्मपद को प्राप्त हुआ। ऐसी सिद्धि और ऐश्वर्य दिखाये और कठिन क्रूर स्थान भी दिखाये, तो भी राजा शुभ-अशुभ में ज्यों का त्यों रहा। इससे बड़ा कल्याण हुआ कि राजा को शान्ति प्राप्त हुई और वह रागद्वेष से रहित हुआ। अब मैं इसे अपना चूडाला का पूर्वरूप दिखाऊँ और सम्पूर्ण वृत्तान्त जताऊँ। ऐसे विचार कर जब मदनिका शरीर से चूडालारूप में भूषण और वस्त्रसहित प्रकट हुई, तब राजा उसे देखकर महाआश्चर्य को प्राप्त हुआ और ध्यान में स्थित होकर देखा कि यह चूडाला कहाँ से आई है। फिर पूछा, हे देवि ! तू कहाँ से आई है ? तुझे देखकर तो मैं आश्चर्य को प्राप्त हुआ हूँ; क्योंकि ऐसी तो मेरी स्त्री चूडाला थी। तू यहाँ किस निमित्त आई है और कब की आई है ? चूडाला बोली, हे भगवन् ! मैं तुम्हारी स्त्री चूडाला ही हूँ और तुम मेरे स्वामी हो। हे राजन् ! कुम्भज से लेकर इस चूडाला शरीर तक सब चरित्र मैंने तुम्हें जगाने के निमित्त किये हैं। तुम ध्यान में स्थित होकर देखो कि ये चरित्र किसने किये हैं ? मैंने अब पूर्व का चूडाला का शरीर रचा है। हे राम ! जब ऐसे चूडाला ने कहा, तब राजा ध्यान में स्थित होकर देखने लगा और एक मुहूर्त तक ध्यानस्थ रहकर सब वृत्तान्त जान लिया। उसके उपरान्त राजा ने आश्चर्य को प्राप्त होकर नेत्र खोले और रानी को कण्ठ में लगा लिया। निदान दोनों ऐसे हर्ष को प्राप्त हुए जो सहस्र वर्ष पर्यन्त शेषनाग उस सुख को वर्णन करें तो भी न
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २६५
कह सकेंगे। वे ऐसे सत्तासमान में स्थित होकर शान्ति को प्राप्त हुए, जिसमें क्षोभ कभी नहीं होता।
राजा और रानी दोनों कण्ठ लगकर मिले थे, इससे अङ्गों में उष्णता उपजी थी, इस कारण धीरे-धीरे उन्होंने अंग खोले। हर्षित होकर राजा की रोमावलि खड़ी हो आई और नेत्रों में आँसू बहने लगे। ऐसी अवस्था में राजा बोला, हे देवि! मुझ पर तुमने बड़ा अनुग्रह किया है। तुम्हारी स्तुति मैं नहीं कर सकता। जो कुछ संसार के पदार्थ हैं, वे सब मायामय और मिथ्या हैं। तुमने मुझे सत्पद को पहुँचाया है, इससे मैं तुम्हारी कहाँ तक प्रशंसा करूँ। हे देवि! मैंने अब जाना कि मैंने जो राज्य का त्याग किया, वह और इस चुड़ाला के शरीर पर्यन्त सब तुम्हारे ही चरित्र हैं। तुमने मेरे वास्ते बड़े कष्ट सहे और बड़े यत्न किये। आना और जाना, शरीर का स्वाँग भरना और उड़ना इत्यादि में तुमने बड़ा कष्ट पाया है और बड़े यत्न से मुझे संसार-समुद्र से पार करके बड़ा उपकार किया है। तुम धन्य हो। जितनी देवियाँ अरुन्धती, ब्रह्माणी, इन्द्राणी, पार्वती, सरस्वती और श्रेष्ठ कुल की कन्या और पतिव्रता हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ हो। जिस पुरुष को पतिव्रता प्राप्त होती है, उसके सब कार्य सिद्ध होकर उसे बुद्धि, शान्ति, दया, शक्ति, कोमलता और मैत्री प्राप्त होती है। हे देवि! मैं तुम्हारे प्रसाद से शान्त-पद को प्राप्त हुआ हूँ। अब मुझे कोई क्षोभ नहीं है। ऐसा पद शास्त्रों और तप से भी नहीं मिलता।
चुड़ाला बोली, हे राजन्! तुम काहे को मेरी स्तुति करते हो? मैंने तो अपना कर्त्तव्य किया है। हे राजन्! तुम राज्य का त्याग कर बन में मोह अर्थात् अज्ञान को साथ ही लिये आये थे, इससे नीच स्थान में पड़े। जैसे कोई गङ्गाजल त्यागकर कीचड़ के जल को अङ्गीकार करे, वैसे ही तुमने आत्मज्ञान और अक्रियपद का त्यागकर तप को अङ्गीकार किया था। जब मैंने देखा कि तुम कीचड़ में गिरे हो तो मैंने तुम्हें निकालने के लिए इतने यत्न किये हैं। हे राजन्! मैंने अपना कर्त्तव्य किया है। राजा बोले, हे देवि! मेरा यही आशीर्वाद है कि
२६६ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
जो कोई पतिव्रता स्त्री हों वे सब ऐसे कार्य करें, जैसे तुमने किये हैं। जो पतिव्रता स्त्री में कार्य होता है; वह और में नहीं होता। हे देवि! अरुन्धती आदि जितनी पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, उनमें तुम प्रथम गिनी जाओगी। मैं जानता हूँ कि ब्रह्माजी ने क्रोधकर तुम्हें इस निमित्त उपजाया है कि अरुन्धती आदि देवियों ने जो गर्व किया होगा, उस गर्व को मिटावें। इससे हे देवि! तुम धन्य हो। तुमने मेरे ऊपर बड़ा उपकार किया है। हे देवि! तुम मेरे अङ्ग में लगो। तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है। हे राम! ऐसे कहकर राजा ने रानी को फिर कण्ठ से लगाया, जैसे नेवला और नेवली मिलें और मूर्ति की नाईं लिखे हों।
चूड़ाला बोली, हे भगवन्! एक तो मुझसे यह कहो कि ज्ञानरूप आत्मा के एक अंश में जगत लीन हो जाते हैं; ऐसे तुम हो। अपने को अब तुम क्या जानते हो? अब तुम कहाँ स्थित हो? राज्य तुम्हें कुछ दिखाई देता है या नहीं और अब तुम्हारी क्या इच्छा है? शिखिध्वज बोले, हे देवि! जो स्वरूप तुमने-ज्ञान से निश्चित किया है, वही मैं अपने को जानता हूँ और शान्तरूप हूँ। इच्छा-अनिच्छा मुझको कोई नहीं रही—केवल शान्तरूप हूँ। हे देवि! जिस पद की अपेक्षा करके ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की मूर्तियाँ भी शोकसंयुक्त लगती हैं, उस पद को मैं प्राप्त हुआ हूँ, जहाँ कोई उत्थान नहीं; जो निष्किञ्चन है और जिसमें किञ्चिन्मात्र भी जगत नहीं। मैं जो था वही हुआ हूँ, इससे अधिक और क्या कहें। हे देवि! तुमने संसारसमुद्र से मुझे पार किया है, इससे तुम मेरी गुरु हो। ऐसे कहकर राजा चूड़ाला के चरणों पर गिर पड़ा और बोला—मुझे अज्ञान कभी स्पर्श नहीं करेगा। जैसे ताँबा पारस के संग में सुवर्ण होकर फिर ताँबा नहीं होता, वैसे ही मैं तुम्हारे प्रसाद से मोहरूपी कीचड़ से निकला हूँ और फिर कभी न गिरूँगा। अब मैं इस गत के सुख-दुःख से संतुष्ट हुआ। ज्यों का त्यों स्थित हूँ और राग-द्वेष को उठानेवाला मेरा चित्त नष्ट हो गया है। अब मैं प्रकाशरूप अपने आपमें स्थित हूँ। जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है और जल के नष्ट होने पर प्रतिबिम्ब भी सूर्यरूप होना
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २६७
है, वैसे ही मेरा चित्त भी आत्मरूप हुआ है। अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त हो सबसे अतीत हुआ हूँ और सबमें स्थित हूँ। जैसे आकाश सब पदार्थों में स्थित है और सब पदार्थों से अतीत है, वैसे ही मैं भी हूँ। मेरे 'अहं' 'त्वं' आदिक शब्द नष्ट हुए हैं और मैं शान्ति को प्राप्त हुआ हूँ। अब मुझमें ऐसा-वैसा शब्द कोई नहीं। मैं अद्वैत और चिन्मात्र हूँ और न सूक्ष्म हूँ, न स्थूल हूँ।
चुड़ाला बोली, हे राजन्! जो तुम ऐसे स्थित हुए तो अब क्या करोगे और अब तुम्हें क्या इच्छा है? राजा बोले, हे देवि! न मुझे कुछ अङ्गीकार करने की इच्छा है और न त्याग करने की। जो कुछ तुम कहोगी सो करूँगा। तुम्हारे कहने को अङ्गीकार करूँगा। जैसे मणि प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, वैसे ही मैं तुम्हारे वचनों को ग्रहण करूँगा। चुड़ाला बोली, हे प्राणपति हृदय के प्रियतम राजा! अब तुम विष्णु हुए हो। यह बड़ा उत्तम हुआ कि तुम्हारी इच्छा नष्ट हुई है। हे राजन्! अब उचित है कि तुम और मैं मोह से रहित होकर अपने प्राकृत आचार में विचरें। हम अखेद जीवन्मुक्त होकर अपने प्राकृत आचार को क्यों त्यागें? हे राजन्! जो अपने आचार को त्यागेंगे तो और किसी को ग्रहण करेंगे। इससे अपने ही आचार में विचरते हैं और भोग-मोक्ष दोनों को भोगते हैं। हे राम! ऐसे परस्पर विचार करते दिन व्यतीत हुआ और सायंकाल की सन्ध्या राजा ने की। फिर शय्या का आरम्भ किया। उस पर दोनों सोये और रात्रिभर परस्पर चर्चा ही करते एकक्षण की नाईं रात्रि बिताई।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पददर्शितसन्मार्गः ॥ ८६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब ऐसे रात्रि बीती और सूर्य की किरणें फैलीं; सूर्यमुखी कमल खिल आये, तब राजा ने स्नान किया। चुड़ाला ने मन के संकल्प से रत्नों की मटकी रच हाथ में ली, उसमें गङ्गादिक सम्पूर्ण तीर्थों का जल डाला और राजा को स्नान कराके शुद्ध किया। तब राजा ने संध्यादिक सब कर्म किये। तब चुड़ाला ने कहा, हे राजन्! मोह का नाश करके सुखपूर्वक अपने राज-काज करने चाहिये
२६८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
जिसमे सुख भोगें । राजा बोले, हे देवि ! जो तुम्हें सुख भोगने की इच्छा हो तो स्वर्ग में भी हमारा राज्य है और सिद्धलोक में भी हमारा राज्य है । इसमें स्वर्ग में विचरें ! चूडाला बोली, हे राजन ! हमको न सुख भोगने की इच्छा है, न त्यागने की इच्छा है । हम तो ज्यों के त्यों हैं । इच्छा और अनिच्छा तब होती है, जब आगे कुछ पदार्थ भासित होता है । पर हमको तो केवल आत्मा दीखता है; स्वर्ग कहाँ और नरक कहाँ—हम सर्वदा एकरस स्थित हैं । हे राजन ! यद्यपि हमको कुछ भेद नहीं, तो भी जब तक शरीर का प्रारब्ध है, तब तक शरीर रहता है, इससे चेष्टा भी होना चाहिए । और की चेष्टा करने में अपन प्राकृत आचार को क्यों न कीजिये, जिसमें रागद्वेष में रहित होकर अपने राज्य को भोगें ? इससे अब उठो और अष्टवसु के तेज को धारण कर राज्य करने को सावधान हो ।
राजा ने कहा बहुत अच्छा, और अष्टवसु के तेजसंयुक्त हो बोला, हे देवि ! तुम मेरी पटरानी हो और मैं तुम्हारा भर्ता हूँ, तो भी तुम और मैं एक ही हैं । राज्य तब होता है, जब सेना भी हो, इससे सेना भी रचो । तब उस चूडाला ने सम्पूर्ण सेना और हाथी, घोड़े, रथ, नौबत, नगारे, निशान इत्यादिक राज्य की सामग्री रची और सब प्रत्यक्ष आगे आकर स्थित हुई । नौबत, नगारे, तुरही और शहनाई बजने लगा और जो कुछ राज्य की सामग्री है; वे अपने अपने स्थान में स्थित हुई । राजा के सिर पर छत्र फिरने लगा और राजा और रानी हाथी पर सवार होकर मन्दराचल पर्वत के ऊपर चले । आगे पीछे सब सेना हुई । राजा ने जिस जिस जगह पर तप किया था सो रानी को दिखाता गया कि इस स्थान में मैं इतने काल रहा हूँ; इसमें इतना रहा हूँ । ऐसे दिखाते दिखाते बड़े वेग से चले । मन्त्री, पुरवासी और नगर-वासी राजा को लेने आये और बड़े आदर से नमन किया । इस प्रकार दोनों अपने मन्दिर पहुँचे । आठ दिन तक राजा से लोकपाल और मण्डलेश्वर मिलने को आते रहे । इसके उपरान्त राजसिंहासन पर बैठकर दोनों राज्य करने लगे । समदृष्टि को लिये दशसहस्र वर्ष तक
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २६६
राज्य किया। फिर चुड़ाला संयुक्त जीवन्मुक्त होकर विचरे और दोनों विदेह मुक्त हुए। हे राम! दशसहस्र वर्ष पर्यन्त राजा और चुड़ाला ने राज्य किया और दोनों समसमान में स्थित रहे। किमी पदार्थ में वे रागवान् न हुए और किमी में द्वेष भी न किया ज्यों के त्यों शान्त-पद में स्थित रहे। जितनी राज्य की चेष्टा है, सो करते रहे, परन्तु भीतर से किसी में बँधे नहीं—केवल आत्मपद में अचल रहे। फिर राजा और चुड़ाला विदेह मुक्त हुए—जैसे अपने को जानते थे, उसी ज्ञान के बल से परमाकाश अक्षोभपद में जाकर स्थित हुए और जैसे तेल बिना दीपक निर्वाण होता है, वैसे ही प्रारब्धवेग का क्षय होने पर निर्वाणपद को प्राप्त हुए। हे राम! जैसे शिखिध्वज और चुड़ाला जीवन्मुक्त होकर भोगों को भोगते विचरे हैं, वैसे ही तुम भी रागद्वेष से रहित होकर विचरो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजचुड़ालाख्यान-समाप्तिर्नाम सप्तशीतितमस्सर्गः ॥ ८७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिखिध्वज का सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। ऐसी दृष्टि का आश्रय करो, जो पाप का नाश करती है। उस दृष्टि के आश्रय से जिस मार्ग के द्वारा शिखिध्वज तत्पद को प्राप्त हुआ और जीवन्मुक्त होकर राज्य-व्यवहार करता रहा, वैसे ही तुम भी तत्पद का आश्रय करो और उसी के परायण हो आत्मपद को पाकर भोग और मोक्ष दोनों भोगो। इसी प्रकार बृहस्पति का पुत्र कच ने भी बोध पाया है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जिस प्रकार बृहस्पति का पुत्र कच बोध को प्राप्त हुआ, सो भी संक्षेप में कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! कच बालक जब अज्ञान अवस्था को त्यागकर पद-पदार्थ को जानने लगा, तब उसने अपने पिता बृहस्पति से प्रश्न किया कि हे पिता! इस संसार के पिंजरे में से में कैसे निकलूँ? जितना संसार है, वह जीवत्व से बँधा हुआ है। अनात्मदेहादिकों में मिथ्या अभिमान करने को जीवत्व कहते हैं। जिसमें 'अहं', 'त्वं' माना जाता है, उस संसार से कैसे मुक्त होऊँ? बृहस्पति बोले, हे तात! इस अनर्थरूप संसार में जीव
२७० * योगवाशिष्ठ *
तब मुक्त होता है, जब सबका त्याग करता है। सर्वत्याग किये बिना मुक्ति नहीं होती। इससे तू सर्वत्याग कर जिससे मुक्त हो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब इस प्रकार बृहस्पति ने कहा, तब कच ऐसे पावन वचनों को सुन ऐश्वर्य का त्याग कर वन को गया और एक कन्दरा में स्थित होकर तप करने लगा।
हे राम! बृहस्पति को कच के जाने से कुछ खेद न हुआ; क्योंकि ज्ञानवान पुरुष संयोग-वियोग में सम रहते हैं और हर्ष-शोक को कभी प्राप्त नहीं होते। जब आठ वर्ष पर्यन्त कच ने तप किया, तब बृहस्पति ने जाकर देखा कि वह एक कन्दरा में बैठा है। तब वह कच के पास आ गये। कच ने पिता का पूजन गुरु की भाँति किया। बृहस्पति ने कच को गले लगाया। तब कच ने गद्गदवाणी से प्रश्न किया-हे पिता! आठ वर्ष बीते मैंने सर्वत्याग किया है, तो भी शान्ति को नहीं प्राप्त हुआ? जिसमें मुझे शान्ति हो, सो कहो। बृहस्पति ने कहा हे तात! सर्वत्याग कर, जिससे तुझे शान्ति हो। ऐसे कहकर बृहस्पति उठ खड़े हुए और आकाश को चले गये। हे राम! जब बृहस्पति ऐसे कहकर चले गये, तब कच आसन और मृगछाला को त्याग कर और वन को चला और एक कन्दरा में जाकर स्थित हुआ। तीन वर्ष वहाँ व्यतीत हुए तो फिर बृहस्पति आये और देखा कि कच स्थित बैठा है। तब कच ने भली प्रकार गुरु की तरह उनका पूजन किया और बृहस्पति ने कच को गले लगाया। तब कच ने कहा, हे पिता! अब तक मुझे शान्ति नहीं हुई। मैंने सर्वत्याग भी किया; क्योंकि अपने पास कुछ नहीं रखता। इससे जिसमें मेरा कल्याण हो, वही कहो। बृहस्पति ने कहा, हे तात! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ; सब के कारण चित्त का जब त्याग करेगा, तब सर्वत्याग होगा; इससे चित्त का त्याग कर।
वशिष्ठजी बोले, हे राम! ऐसे कहकर जब बृहस्पति आकाश को चले गये, तब कच विचारने लगा कि पिता ने सर्वपद चित्त को कहा है, वह चित्त क्या है? प्रथम वन के पदार्थों को देखकर विचारने लगा
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कि यह चित्त है। फिर देखा कि ये भिन्न-भिन्न हैं, इसमें ये चित्त नहीं और नेत्र भी चित्त नहीं; क्योंकि नेत्र श्रवण नहीं। और श्रवण नेत्रों से भिन्न है। श्रवण भी चित्त नहीं इसी प्रकार सब इन्द्रियाँ चित्त नहीं; क्योंकि एक में दूसरे का अभाव है। फिर चित्त क्या है, जिसको जान कर त्याग करूँ? फिर विचार किया कि पिता के पास स्वर्ग में जाऊँ। हे राम! ऐसे विचारकर कच उठ खड़ा हुआ और दिगम्बर होकर आकाश को चला। जब पिता के पास पहुँचा, तब पिता का पूजन करके बोला, हे तैंतीस कोटि देवताओं के गुरु! चित्त का रूप क्या है? उसका रूप कहिये, जिससे मैं उसका त्याग करूँ। बृहस्पति बोले, हे पुत्र! चित्त अहंकार का नाम है। वह अज्ञान से उपजा है और आत्मज्ञान से इसका नाश होता है। जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प दिखता है और रस्सी के जानने से सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है। इससे अहंभाव का त्याग कर और स्वरूप में स्थित हो। कच बोले, हे पिता! अहंभाव का त्याग कैसे करूँ? 'अहं', तो मैं ही हूँ, फिर अपना त्याग करके स्थित कैसे होऊँ? इसका त्याग करना तो महाकठिन है।
बृहस्पति बोले, हे तात! अहंकार का त्याग करना तो महासुगम है। फूल के मलने में और नेत्रों के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न है, परन्तु अहंकार के त्यागने में कुछ यत्न नहीं। हे पुत्र! अहंकार कुछ वस्तु नहीं; भ्रम से उत्पन्न है। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में बेताल की कल्पना करता है, रस्सी में सर्प दिखता है; मरुस्थल में जल की कल्पना होती है और आकाश में भ्रम से दो चन्द्रमा दीखते हैं, वैसे ही परिच्छिन्न अहंकार अपने प्रमाद से उपजा है। आत्मा शुद्ध आकाश से भी निर्मल है और देश-काल-वस्तु के परिच्छेद से रहित सत्ता सामान्य चिन्मात्र है। उसमें स्थित हो, जो तेरा स्वरूप है। तू आत्मा है। तुझमें अहंकार कभी नहीं है। हे साधु! आत्मा सर्वदा, सब प्रकार सबमें स्थित है। उसमें अहंभाव किंचित् भी नहीं है। जैसे समुद्र में धूल कभी नहीं होती, वैसे ही आत्मा में अहंकार कभी नहीं है। आत्मा में न एकत्व है, और न द्वैत। वह केवल अपने आपमें स्थित है। और जो
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नाना आकार देख पड़ते हैं, वे चित्त के स्फुरण में हैं। चित्त के नष्ट होने पर आत्मा ही शेष रहता है। इससे अपने स्वरूप में स्थित हो जिससे तेरा दुःख नष्ट हो जावे। जो कुछ यह देख पड़ता है, इसमें भी आत्मा है। जैसे पत्र, फूल, फल सब बीज से उत्पन्न होते हैं, वैसे ही सब आत्मा का चमत्कार है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिसंबोधन- नामाष्टाशीतितमस्सर्गः ॥ ८८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार बृहस्पति ने उत्तम उपदेश किया तब कच उसे सुनकर स्वरूप में स्थित हुआ और जीवन्मुक्त होकर विचरा। हे राम ! जैसे कच जीवन्मुक्त होकर विचरा और निरहंकार हुआ, वैसे ही तुम भी निष्काम होकर विचरो और केवल अद्वैतपद को प्राप्त हो, जो निर्मल और शुद्ध है। जिसमें अद्वैत या द्वैत कुछ नहीं, तुम उसी पद में स्थित हो। तुममें दुःख कोई नहीं। तुम आत्मा हो और तुममें अहंकार नहीं। तुम ग्रहण या त्याग किसका करोगे। जो पदार्थ ही ही नहीं तो ग्रहण या त्याग किसका हो ? हे राम ! जैसे आकाश में फूल नहीं तो उसका ग्रहण क्या और त्याग क्या, वैसे ही आत्मा में अहंकार नहीं। जो ज्ञानवान पुरुष है, वे अहंकार का ग्रहण और त्याग नहीं करते। मूर्ख को एक आत्मा में नाना आकार दीखते हैं, इससे किसी का शोक करता है और कहीं हर्ष करता है। तुम कस दुःख