योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❋ निर्वाण प्रकरण ❋ २५१
में जीव एक समान होता है। हे राजन् ! जिसके समीप शहद है, वह शहद के निमित्त पर्वत क्यों खोजे और दौड़े, वैसे ही तुम्हारे घर में ब्रह्मज्ञानी चूडाला थी; उसको त्यागकर तुमने वन में आकर तप का आरम्भ किया, इससे बड़ा कष्ट पाया। परन्तु अब तुम जागे हो और तुम्हारा दुःख नष्ट हुआ है। अब तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो। जैसे रस्सी को न जानने से सर्प दिखता है और भली प्रकार जानने से रस्सी ही जान पड़ती, वैसे ही, जिसने भली प्रकार निष्पन्द होकर अपना रूप आप देखा है, उसको चित्त के स्फुरण में भी आत्मा ही भासित होता है। जब मन की चपलता मिटती है, तब तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है; जिस पद को वाणी नहीं कह सकती। हे राजन् ! तुम भी अब उसी पद को प्राप्त हुए हो, जो मन और वाणी से रहित तुरीयातीतपद है। वहाँ कोई क्षोभ नहीं, केवल शान्तिपद है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखरध्वजबोधवर्णनंनाम-
काशीतितमसर्गः ॥ ८१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब राजा को कुम्भज मुनि ऐसे उपदेश कर चुके, तब उसके उपरान्त बोले, हे राजन् ! अब हम जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग में ब्रह्माजी के पास नारद मुनि आये हैं। वे यदि मुझे देवताओं की सभा में न देखेंगे तो क्रोध करेंगे। हे राजन् ! जो कल्याणकृत पुरुष हैं, वे बड़ों की प्रसन्नता लेते हैं। जो उपदेश तुम्हें किया है; उसको भली प्रकार विचारना। सब शास्त्रों का सार यही है कि सम्पूर्ण वासना का त्याग करना और किसी में चित्त का बन्धन न होने देना। मेरे आने तक स्वरूप में स्थित रहकर किसी चेष्टा में न लगना और स्वरूप को भली प्रकार जानकर चाहे वैसे विचारना। ऐसे कहकर जब कुम्भज मुनि उठ खड़े हुए, तब राजा ने अर्घ्य और फल चढ़ाने के निमित्त हाथ में लिये, पर जल और फूल हाथ ही में रहे और कुम्भज मुनि अन्तर्धान हो गये। जब राजा ने कुम्भज मुनि को अपने आगे न देखा, तब विचार करने लगा कि देखा, ईश्वर की नीति जानी नहीं जाती। नारद मुनि कहाँ थे, उनका पुत्र कुम्भज कहाँ और मैं राजा