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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1059, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1059

२५० ❉ योगवाशिष्ठ ❉

चित्त में क्या रचना है ? अपने आपको देखे कि अनुभवरूप है और सर्वदा निरन्तर अपने आपमें स्थित है । जब तुम अपने से आपको देखोगे, तब तपादिक क्रिया को दूर करके शोभा पाओगे । जैसे बादल के दूर होने पर प्रकाशमान चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तुम भी भोग की चपलता को त्यागकर शोभा पाओगे । जब इन्द्रियों को जीतकर किसी पदार्थ में आसक्त न होगे और सर्ववासनाओं का त्याग करोगे, तब ज्ञानवान् होगे । जिसने सर्ववासना का त्याग किया है, उसको विष्णु जानना । वह सर्वराज्य का स्वामी है । जिसने मन जीता है वह चेष्टा में भी ज्यों का त्यों रहता है और समाधि में भी ज्यों का त्यों है । जैसे पवन चलने और ठहरने में तुल्य है, वैसे ही ज्ञानवान् को कहीं खेद नहीं होता । राजा ने पूछा, हे सर्व संशयों के नाशकर्ता ! स्पन्दन और निःस्पन्द में ज्ञानी ज्यों का त्यों कैसे रहता है, सो कृपा करके कहिये ।

कुम्भज बोले, हे राजन् ! चैतन्य आकाश आकाश में भी निर्मल है । जब उसका साक्षात्कार होता है, तब जहाँ देखे वहाँ चैतन्य ही भासित होता है । जैसे समुद्र के जानने में तरङ्ग और बुलबुले सब जल ही दीखते हैं, वैसे ही चित्त बिना आत्मा के देखने में फुरने में भी आत्मा ही दृष्टिगोचर होता है । और जिसने आत्मा को नहीं जाना, उसको नाना प्रकार का जगत ही भासित होता है । जैसे जल को जाने बिना तरङ्ग व बुलबुले भिन्न भिन्न दीखते हैं और जल को जानने में तरङ्ग भी जलमय दीखते हैं । हे राजन् ! सम्यक्दर्शी को जगत आत्मास्वरूप है और असम्यक्दर्शी को जगत है । इसमें तुम सम्यक्-दर्शी होकर देखो कि जगत भी आत्मरूप है, सम्यक्दर्शी जैसे प्राप्त होता है, सो भी श्रवण करो । सम्यक्दर्शन संत के संग और सत-शास्त्र के विचार से प्राप्त होता है । भावना करिये, तब कितने काल में स्वरूप का साक्षात्कार होता है । दृढ विचार के निमित्त काल की अपेक्षा भी कही है । जब दृढ विचार होता है, तब साक्षात्कार होता है और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब स्पन्दन और निःस्पन्द