योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें✹ निर्वाण प्रकरण ✹ २४६
सबका आत्मा है। तैसे ही तुम्हारा द्वैत अज्ञान नष्ट हुआ है और तुम सत्यपद को प्राप्त हुए शुद्ध निर्मल हो।
हे राजन् ! जो ज्ञानवान् है, उसने सम्यकदृष्टि से चित्त का त्याग किया है और उसको कोई दुःख नहीं होता। तू उस पद को प्राप्त हुआ है, जिसमें कोई दुःख नहीं और जहाँ स्वर्गादिक सुख भी तुच्छ हैं; क्योंकि स्वर्ग में भी अतिशय और क्षय होता है। अतिशय इसे कहते हैं कि जो बड़े पुण्यवाले किसी को अपने से ऊँचा देखते हैं तो चाहते हैं कि हम भी इसी के से हो जावें, और क्षय इसे कहते हैं कि ऐसा न हो कि इन सुखों से गिरूँ। निदान स्वर्ग में दोनों प्रकार दुःख होता है। पर तुमने पुण्य-पाप दोनों का त्याग किया है, इससे सर्वत्यागी हो। जो अज्ञानी पापी जीव हैं, उनको स्वर्ग ही भला है। जैसे सुवर्ण का पात्र न पाइये तो पीतल का भी भला, वैसे ही सुवर्ण का पात्र जो ज्ञान है, जब तक प्राप्त न हो तब तक पीतल के पात्र जो स्वर्गादिक हैं, वे नरक से भले हैं। पर तुम जैसे को कुछ नहीं। आत्मा में सब पदार्थों की पूर्णता है। सबकी उत्पत्ति आत्मा से ही है। हे राजन् ! वर्णाश्रम में क्या आस्था करनी है। जहाँ से इनकी उत्पत्ति है, जहाँ ये लीन होते हैं और मध्य में जिसके अज्ञान से देख पड़ते हैं, उसमें स्थित हो।
हे राजन् ! संकल्प-विकल्प जो उठते हैं, उनमें मत स्थित हो; किन्तु जिसमें ये उत्पन्न और लीन होते हैं, उसमें स्थित हो। तपादिक क्रिया से क्या सिद्ध होता है? जिससे तप आदिक सिद्ध होते हैं, उसमें स्थित हो। बूँद में क्या स्थित होना है। जिस मेघ से बूँद उत्पन्न होते हैं, उसमें स्थित होइये। हे राजन् ! जैसे स्त्री भर्ता से कोई पदार्थ चाहे और आप न कहे, वैसे ही तपादिक क्रिया से क्या सिद्ध होता है? जो उनसे आत्मपद को इच्छा करे तो प्राप्त नहीं हो सकता, उसे तो मनुष्य अपने आपमें पाता है। हे राजन् ! आत्मा तुम्हारा अपना आप है, उससे सर्वसिद्धि होता है। जो वस्तु पीछे त्याग करनी हो, उसको ज्ञानवान् प्रथम ही अङ्गीकार नहीं करता। जो कुछ तपादिक हैं, उनको