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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1057, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1057

१४८ * योगवाशिष्ठ *

चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और अज्ञानी चित्त में बँधा रहता है; इससे वह जन्मता भी है और मरता भी है। ज्ञानी का चित्त शान्ति में स्थित होने के कारण उसको न बन्धन है, न मोक्ष। वह प्रारब्ध के अनुसार भोग भोगता है और अपने को सर्वात्मा ही देखता है। यद्यपि इन्द्रियों से वह चेष्टा करता है तो भी सर्वत्र ब्रह्म ही देखता है। क्रिया करने में इस अभिमान से रहित होता है कि मैं कर्त्ता और भोक्ता हूँ। अज्ञानी अपने को कर्त्ता मानता है। उसको संसार सत्य भासित होता है, इससे संकल्प-विकल्प करता है। ज्ञानवान् को संसार की सत्यता नहीं भासित होती। वह अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता देखता है और अभिलाषा से रहित होकर चेष्टा करता है। जब तक चित्त का सम्बन्ध है, तब तक जीव संसार को सत्य जानकर अपने में क्रिया देखता है, पर जब चित्त ही नष्ट हो गया; तब संसार और वासना का जागना कहाँ रहा?

हे राजन्! अब तुमने चित्त का त्याग किया है, इससे सर्वत्यागी हुए हो। आगे सर्वत्याग न किया था, इससे तुम्हारा अज्ञान न नष्ट हुआ था। अब तुम्हारा अहंभाव दूर हुआ है। जब अज्ञान नष्ट हुआ, तब अहंभाव भी न रहा। अहं का त्याग करने से सर्वत्याग सिद्ध हुआ। पहले तुमने राज्य का त्याग किया था, पर राज्य में तुम्हारा कुछ न था; फिर तन का त्याग किया; फिर वन में आकर सब सामग्री का त्याग किया। पर अब तुमने उसका त्याग किया, जो त्यागने योग्य अहंभाव है—इससे सर्वत्याग हुआ। जो कुछ जानने योग्य है सो अब तुमने जाना है और शान्तपद को प्राप्त हुए हो। हे राजन्! तुम सब दुःखों से रहित आत्मा हो। जैसे मन्दराचल पर्वत से रहित क्षीरसमुद्र शान्तपद को प्राप्त हुआ है, वैसे ही अज्ञान से रहित तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो। अब तुम जागे हो और चित्त का त्याग किया है, इससे अद्वैत सर्वात्मा हुए हो। हे राजन्! जब द्वैत या दो अक्षर होते हैं, तब उनकी संज्ञा नाना प्रकार की होती है—जैसे अमृत-विष; सुख-दुःख और धर्म-अधर्म। पर जो एक ही अक्षर होता है, वह