योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २४७
कुम्भज बोले, हे राजन् ! अब तुम्हारे कषाय (मन के मैल) परि-पक्व हुए हैं। जैसे फल परिपक्व होता है, तब यत्न बिना ही वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही अब तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हुआ है और अज्ञान नष्ट हो गया है। जब अन्तःकरण मलीन होता है, तब सन्तों के वचन नहीं लगते और जब अन्तःकरण शुद्ध होता है, तब सन्तों के वचन लगते हैं। जैसे कोमल कमल की जड़ को बाण लगे तो शीघ्र ही वेध जाता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण में उपदेश शीघ्र ही प्रवेश करता है। हे राजन् ! अब तुम्हारी भोग-वासना नष्ट हुई है और स्वरूप जानने की इच्छा हुई है; इसमें तुम जागे हो। हे राजन् ! मैंने उपदेश तब किया, जब तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हुआ है। प्रतिबिम्ब भी वहाँ पड़ता है, जहाँ निर्मल स्थान होता है। जैसे श्वेत वस्त्र पर केशर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है और रङ्ग भी चटक होता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण में सन्तों के वचन शीघ्र ही प्रवेश करते हैं और शोभा पाते हैं। हे राजन् ! जब तक अन्तःकरण मलिन होता है, तब तक चाहे जितना उपदेश कीजिये, स्थिर नहीं होता। जब भोग से वैराग्य होता है, तब कोई वासना नहीं रहती, केवल आत्मपद की इच्छा होती है और तभी स्वरूप का साक्षात्कार होता है। हे राजन् ! अब तुम्हारा सर्वत्याग सिद्ध हुआ और अज्ञान नष्ट हुआ, क्योंकि अब कोई उपाधि नहीं रही। चित्त ही बड़ी उपाधि है। जब चित्त नष्ट हुआ, तब कोई दुःख नहीं रहता। अब तुम सुख से विचरो; तुमको दुःख, शोक और भय कोई नहीं। अब तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो।
राजा ने पूछा, हे भगवन् ! अज्ञानी का चित्त का सम्बन्ध है और ज्ञानवान् को चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। जो स्वरूप में स्थित है, वह चित्त बिना जीवन्मुक्तक्रिया में कैसे बरतता है? कुम्भज बोले, हे राजन् ! तुम सच कहते हो कि ज्ञानी को चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। जैसे पत्थर की शिला में अंकुर नहीं उपजते, वैसे ही ज्ञानी का चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। हे राजन् ! चित्त वासनारूप है और वासना जन्म-मरण का कारण; पर जीवन्मुक्त के वासना नहीं रहती। ज्ञानवान् का