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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1055, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1055

२९६ * योगवाशिष्ठ *

है, तब चित्त और 'अहं' 'त्वं' सब नष्ट हो जाते हैं। हे राजन् ! तुम शुद्ध आत्मा, एक, प्रकाशरूप, अच्युत और निरन्तर हो। देह इन्द्रिया-दिकरूप में भी तुम ही स्थित हुए हो और इच्छा-अनिच्छा भी तुम ही हो। जैसे चन्द्रमा की किरणें चन्द्रमा से भिन्न नहीं, वैसे ही तुम हो। तुम निर्विकल्प हो। तुममें कुछ स्फूर्ति नहीं। तुम केवल ज्यों का त्यों स्थित हो।

इति श्री वा० निर्वाणप्रकरणे परमार्थोपदेशो नामाशीतितमसर्गः ॥८०॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब कुम्भज मुनि ने ऐसे कहा, तब शिखिध्वज शान्ति को प्राप्त हुए और नेत्र मूँदकर सब अङ्गों की चेष्टा से रहित हुए। जैसे शिला पर पुतला लिखा हो, वैसे ही स्थित हो। एक मुहूर्त तक वह निर्विकल्प स्थित रहे और फिर उठे। तब कुम्भज ने कहा— हे राजन् ! आत्मा तो निर्विकल्प है, उस निर्विकल्प शिला में तुमने शयन किया है और ज्ञेय (जानने योग्य) को तुमने जाना है। अब तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ अथवा नहीं और तुम शान्ति को प्राप्त हुए या नहीं, सो कहो। राजा बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा ने मुझे उसपद को प्राप्त किया है। हे भगवन् ! तत्त्ववेत्ताओं के सङ्ग से जैसा अमृत मिलता है, वैसा क्षीरसमुद्र में भी नहीं मिलता। वह तो देवताओं की सेवा में भी नहीं मिलता। तुम्हारी कृपा से मैंने ऐसे अमृत को पाया है, जिसका आदि-अन्त नहीं और जो अनन्त और अमृतरूप है। अब मेरे सब दुःख नष्ट हो गये हैं और मैं जागा हूँ। अब मैंने अपने आपको जाना है कि मैं आत्मा हूँ; मेरे साथ चित्त कोई नहीं और मैं केवल अपने आपमें स्थित हूँ। अब मुझे कोई इच्छा नहीं। मैंने अपने स्वभाव को पाया है और सबके आदि पद को प्राप्त हुआ हूँ। जिसमें कोई क्षोभ नहीं ऐसे निर्विकल्पपद को में प्राप्त हुआ हूँ। हे भगवन् ! ऐसा मेरा अपना रूप है, जिससे सब प्रकाशित होते हैं। उसके जाने बिना मैंने कोटि जन्म पाये थे। अब मेरे दुःख नष्ट हुए। और तुम्हारी कृपा से मैंने एक क्षण में जान लिया है। आगे भी श्रवण किया था; पर क्या कारण है जो आगे न जाना और अब जाना ?