सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1054, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1054

निर्वाण प्रकरण ❇ २४५

आत्मा निराकार और अच्युत है, उसमें मैं हूँ, और मेरा अमुक वर्णा- श्रम है, और यह विश्व नाना प्रकार का है। यह ज्ञान भी अज्ञान और मूर्खता है। हे राजन् ! न कोई जन्मता है और न कोई मृतक होता है। ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है। उसमें जन्म-मरण आदिक विकार देखना, यह ज्ञान भी अज्ञान है।

हे राजन् ! जैसे कोई ब्राह्मण हो और ऊँची बाँह करके कहे कि मैं शूद्र हूँ और मुझे वेद का अधिकार नहीं। या जैसे कोई पुरुष कहे कि मैं मृतक हूँ और उसको जानता हूँ, वैसे ही आपको कुछ वर्णाश्रम का अभिमान लेकर कहना मूर्खता है; क्योंकि यह असम्यग्दर्शन है। जब ज्यों का त्यों जानता है, तब दुःखी नहीं होता। हे राजन् ! ऐसा ज्ञान, जो सम्यक्दर्शन से नष्ट हो जावे, सो अज्ञान ही है। जैसे सूर्य की किरणों में जल-बुद्धि होती है और किरण के ज्ञान से जल का ज्ञान नष्ट हो जाता है तो वह जल का जानना अज्ञान ही था, और जैसे रस्सी में सर्प जानना रस्सी के ज्ञान से नष्ट हो जाता है, तो वह सर्प- बुद्धि अज्ञान है, जो सम्यक्दर्शन से नष्ट होता है। जब ऐसे सम्यग्दर्शी होगे, तब आध्यात्मिक तापों से निवृत्त होकर शुद्ध होगे। आत्मा अज, शान्तरूप, सत्-असत् से परे है, उसमें भिन्न वस्तु कुछ नहीं। वह प्रकाश- रूप है। ऐसे तुम हो।

हे राजन् ! अज्ञान भी और कुछ नहीं। इस चित्त के उदय होने का ही नाम अज्ञान है। अज्ञान का कारण चित्त है। जो पदार्थ चित्त में प्रकट हुआ है, नष्ट भी चित्त से ही होता है। इससे तुम शुद्ध चित्त से वासनारूप चित्त का नाश करो। जैसे अग्नि पवन से उपजती है और पवन ही से शान्त होती है, वैसे ही शुद्ध चित्त से चित्त को नष्ट करो। हे राजन् ! न तुम हो, न मैं हूँ, न इन्द्रिय हैं, न संसार है और न यह जगत् है; केवल शुद्ध आत्मा है। हे राजन् ! जो चित्त ही न हो तो चित्त का कार्य विश्व कहाँ हो ? यह अज्ञानी को भासित होता है कि चित्त है और विश्व है। आत्मा केवल अपने आपमें स्थित है। हे राजन् ! चित्त का उदय होना अज्ञान से है। जब अज्ञान नष्ट होता