योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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अप्रत्यक्ष और अरूप है। कारण तब होता है, जब क्रिया होती है। पर वह न किसी का कारण-कार्य है और न कर्म। केवल ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है और चैतन्यमात्र शिवरूप शुद्ध है। यह विश्व भी चैतन्यमात्र है, जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में विश्व आत्मरूप स्थित है। ऐसा विश्व चैतन्यमात्र है, पर उसमें असम्यग्दर्शी अज्ञान से नाना प्रकार की कल्पना करता है। वस्तु जो परमात्मा है, उसके प्रमाद में जीव वासनारूप चित्त से विश्व की कल्पना करता है। वह विश्व शब्दमात्र है, अर्थात् कुछ नहीं। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा, समुद्र में तरङ्ग, मृगतृष्णा में जल और पल्लाही में बेताल भासित होता है, वैसे ही असम्यक्-दर्शी मनुष्य आत्मा में विश्व की कल्पना करता है। और सम्यक्-दर्शी ऐसे जानता है कि आत्मा शुद्ध, अजन्म, अविनाशी और परम निरञ्जन है।
हे राजन् ! जब तुम सम्यकदृष्टि में देखोगे, तब संसार का प्रध्वंसा-भाव भी न देखोगे; क्योंकि विश्व चित्त की कल्पना है और चित्त अज्ञान से उपजा है। स्वरूप में न चित्त है, न अज्ञान है और न संसार है, वह केवल अद्वैतमात्र है। वहाँ 'एक' कहाँ और 'द्वैत' कहाँ, वह तो केवल्य मात्र पद है। जब अज्ञान नष्ट होगा, तब 'अहं', 'त्वं' और चित्त का जगना, सब नष्ट हो जावेगा और फिर भ्रम दृष्टि में न आवेगा। हे राजन् ! आत्मा से भिन्न जो कुछ भासित होता है, वह अज्ञान के कारण और विचार करने में नहीं रहता। राजा बोले, हे भगवन् ! अज्ञान क्या है और कैसे उसका नाश होता है, सो कहिये। कुम्भज बोले, हे राजन् ! एक ज्ञान है और दूसरा अज्ञान। ज्ञान अर्थात् पदार्थ को प्रत्यक्ष जानना और अज्ञान अर्थात् पदार्थों को न जानना। एक ज्ञान भी अज्ञान है, सो भी सुनो। मृगतृष्णा का जल देखकर जल की आस्था करना, या रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा देखना और उसको सत्य मानना, यह ज्ञान भी अज्ञान है; क्योंकि देखनेवाला सम्यक्दर्शी होकर नहीं देखता। यह अज्ञान है। एक अज्ञान यह भी है कि शुद्ध