योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1052, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २४३
आत्मा में नाना प्रकार का विश्व संवेदन जगने से उपजता है, तौ भी आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है—स्फुरणमात्र है। जैसे खम्भे में मनोराज से कोई पुरुष पुतलियों की कल्पना करता है और नाना प्रकार की चेष्टाएँ करता है, पर उसकी चेष्टा तमीं तक है, जब तक संकल्प है, और जब संकल्प निवृत्त हुआ, तब शून्य खम्भा ही रह जाता है, जैसा आगे था; क्योंकि शिल्पी के संवेदन में सृष्टि थी, वैसे ही यह संसार संकल्पमात्र है। जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब संसार की सत्ता जाती रहती है। हे राजन् ! संसारसत्ता इस कारण जाती रहती है कि वह पहले ही असत है। जो वस्तु सत् होती है, उसका कभी नाश नहीं होता। इससे संसार केवल संवेदन की कल्पना है। जैसे एक शिला में पुरुष पुतलियाँ बनाता है तौ शिला में तौ पुतली कोई नहीं, ज्यों का त्यों शिला ही है, वैसे ही चित्त के जगने से आकार दीखते हैं। जब चित्त चेतने से रहित होगा, तब आत्मा को अपना रूप आप जानोगे और अशब्दपद को प्राप्त होगे, जो शान्तपद शुद्ध आकाशरूप है। हे राजन् ! सब 'शब्द' और 'अर्थ' का अभावना करना ही ब्रह्मज्ञान है। वहाँ कोई कल्पना नहीं। जब सम्यक्दृष्टि होती है, तब शेष सब आत्मा ही भासित होता है और यह भावना भी उठ जाती है कि यह संसार है और यह ब्रह्म है। तब केवल ज्ञेयमात्र ही रहता है, अर्थात् शिला की तरह जीव अटल-निश्चय होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजप्रबोधवर्णनं नाम एकानाशीतितमसर्गः ॥ ७६ ॥
राजा बोले, हे भगवन् ! आपका यह कहना सत्य है और मैं भी ऐसा ही जानता हूँ कि संसार आत्मा का कार्य है और आत्मा इसका कारण है। जो आत्मा का कार्य हुआ तो आत्मस्वरूप हुआ, आत्मा से भिन्न नहीं। कुम्भज बोले, हे राजन् ! आत्मा चैतन्यमात्र है, किसी का कारण-कार्य नहीं। आत्मा अप्रत्यक्ष, अक्रिय, अच्युत और नीरस है। तब जो अशब्दपद है, वह कारण-कार्य किसका हो ? कारण को कार्य द्वारा जाना जाता है, पर आत्मा किसी प्रमाण का विषय नहीं,