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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1042, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1042

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २३३

मेरा मुझको नमस्कार है। एक मैं ही हूँ; मुझसे भिन्न कुछ नहीं। मैंने अपने को जाना है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राजविश्रान्तिवर्णनं नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥

राजा ने पूछा, हे भगवन्! आप कैसे कहते हैं कि ब्रह्मा का कारण कोई नहीं? आत्मा ऐसा अनन्त, अच्युत, अव्यक्त और अद्वैत ईश्वर है वह षट् परिमाणों का विषय नहीं। तब परब्रह्म तो ब्रह्मा का कारण है? कुम्भज बोले, हे राजन्! तुम्हीं कहते हो कि आत्मा अनन्त है। जो अनन्त है, उसको देश, काल और वस्तु का परिच्छेद नहीं होता। जो सब देश, सब काल, और सब वस्तुओं में पूर्ण है, वह कारण-कार्य किसका हो? कारण तब हो, जब पहले द्वैत हो। सो आत्मा अद्वैत है, अतः वह नहीं हो सकता। और कारण उसको कहते हैं, जो कार्य से पूर्व हो और पीछे भी वही हो—जैसे घट के आदि में मृत्तिका है और अन्त में भी मृत्तिका होती है। वह कारण कहलाता है। पर आत्मा में न आदि है, न अन्त है। वह तो अनन्त है। कारण तब होता है, जब परिणाम होता है। सो आत्मा अच्युत है, अपने स्वरूप से कदापि नहीं गिरा। और भोक्ता भी द्वैत से होता। आत्मा अद्वैत है। वह भोग और भोक्ता दोनों नहीं। और आत्मा में कर्म भी नहीं। आत्मा से आदि कौन है जिससे आत्मा सिद्ध हो? वह किसी का कार्य भी नहीं; क्योंकि कार्य इन्द्रियों का विषय होता है। सो आत्मा अव्यक्त है। और जो कार्य होता है तो उसका कारण भी होता है। सो आत्मा सबका आदि है, उसका कारण कौन हो? जो सर्वात्मा है और स्वच्छ आकाशवत् निर्मल है, वही तुम्हारा स्वरूप है। राजा ने पूछा, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है! मैंने जाना है कि आत्मा अद्वैत है, वह न किसी का कारण है, न कार्य, और अनुभवरूप है। वही मैं हूँ। मैं निर्मल हूँ, विद्या-अविद्या के कार्य से रहित हूँ; निर्वाणपद हूँ और निर्विकल्प हूँ; मुझमें स्फुरण कोई नहीं। और मैं नहीं और मैं ही हूँ। मेरा मुझको नमस्कार है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पञ्चसप्ततितमसर्गः ॥ ७५ ॥