योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1041, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
तुम अपना देह जानते हो, वैसे ही ब्रह्मा को भी जानो। ब्रह्मा का कारण कौन है ? इसमें इस भ्रम में जागो, जिसमें तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जावे।
राजा बोले, हे भगवन् ! मैं अब जागा हूँ और मेरा भ्रम नष्ट हो गया है। मैंने अब जाना है कि यह संसार केवल संकल्पमात्र मिथ्या है। जो कुछ दृश्य है सो मिथ्या है और एक आत्मा ही मेरे निश्चय में मन है। हे भगवन् ! ब्रह्मा का कारण भी ब्रह्म है और वह अद्वैत अविनाशी और सर्वात्मा है। ब्रह्मा का कारण यह हुआ। कुम्भज बोले, हे राजन् ! कारण और कार्य द्वैत में होते हैं, अतः वे असत् हैं, क्योंकि इस कारण का देश, वस्तु और काल में अन्त हो जाता है, अतः यह परिणामी है। जो वस्तु परिणामी हो, वह मिथ्या है। हे राजन् ! आत्मा अद्वैत है; जिसमें न एक कहना है, न द्वैत कहना है। न वह भोगता है, न भोग है, न कर्म है, न अद्वैत है। जब वह स्वरूप से परिणाम को नहीं प्राप्त होता और सर्वात्मा है, जब सर्व देश और सर्वकाल भी है, जब वह सब वस्तुओं में पूर्ण और अद्वैत है तब यदि वह अद्वैत है तो कारण कार्य किसका हो ? कारण-कार्य का सम्बन्ध द्वैत में होता है और वह परिणामी होता है। जिसमें देशकाल का अन्त है वह अद्वैत आत्मा है। उसमें न कोई देश है, न काल है और न कोई वस्तु है; वह केवल चिन्मात्रपद है।
हे राजन् ! मैं जानता हूँ कि तुम जाग्रत होगे, क्योंकि तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जाना है। जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों में गल जाती है, वैसे ही तुम्हारा अज्ञान नष्ट होता जा रहा है। अज्ञान के नष्ट होने पर तुम आत्मा ही होगे। तुम अपने प्रत्यक् चैतन्यस्वरूप में स्थित हो और देखो कि ब्रह्मा आदिक सब परमात्मा का किंचन है। परमात्मा ही इन रूपों में स्थित हुआ है। और जो देख पड़ता है, उस सबका अपना आप आत्मा है। जब जागेगा तो जानेगा, जागे बिना नहीं जान सकता। राजा बोला, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से अब मैं जागा हूँ और जानता हूँ कि मेरा स्वरूप आत्मा है और में निर्मल हूँ। अब