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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1030, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1030

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२१

देवपुत्र बोले, हे राजन् ! ब्रह्मवेत्ता और सब ज्ञानियों में श्रेष्ठ, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप और सत्यवादिनी तुम्हारी स्त्री जो चूडाला थी, उसने तुम्हें उपदेश किया था; पर तुमने उसके वचनों का किस निमित्त निगदर किया ? में तो सब जानता हूँ, क्योंकि त्रिकालज्ञ हूँ; तो भी तुम अपने मुख से कहो । एक तो यह मूर्खता की कि उपदेश न अङ्गीकार किया और दूसरी यह मूर्खता की कि सर्वत्याग न करके फिर वन अङ्गीकार किया । जो सर्वत्याग करते तो सब दुःख मिट जाते । जब ऐसे देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! मैंने तो स्त्री, पृथ्वी, मन्दिर, हाथी इत्यादिक ऐश्वर्य और कुटुम्ब को त्याग किया है; आप कैसे कहते हैं कि त्याग नहीं किया ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! तुमने क्या त्यागा है ? राज्य में तुम्हारा क्या था । जैसे ऐश्वर्य आगे था, वैसे ही अब भी है और स्त्रियाँ भी जैसे और मनुष्य थे वैसे ही थीं; पृथ्वी, मन्दिर और हस्ती जैसे आगे थे, वैसे ही अब भी हैं । उनमें तुम्हारा क्या था जो त्याग किया ? हे राजन् ! सर्वत्याग तुमने अब भी नहीं किया । जो तुम्हारा हो उसको तुम त्याग करो, जिससे निर्दुःख पद को प्राप्त होओ । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब शूरवीर जो इन्द्रियजित् राजा था, वह मन में विचारने लगा कि यह वन मेरा है और वृक्ष, फूल, फल मेरे हैं, इनका त्याग करूँ । ऐसा विचारकर बोला, हे देवपुत्र ! वन, वृक्ष, फूल और फल जो मेरे थे, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो सर्वत्याग हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ; क्योंकि वन, वृक्ष, फूल और फल तुमसे पहले भी थे । इनमें तुम्हारा क्या है ? जो तुम्हारा हो, उसको त्यागो, तब सुखी होगे ।

हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि मेरी जलपान की बावली और बगीचे हैं, इनका त्याग करूँ, तब सर्वत्याग सिद्ध हो । फिर कहा, हे भगवन् ! मेरी यह बावली और बगीचे हैं, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो मेरा सर्वत्याग सिद्ध हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! सर्वत्याग अब