योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२१
देवपुत्र बोले, हे राजन् ! ब्रह्मवेत्ता और सब ज्ञानियों में श्रेष्ठ, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप और सत्यवादिनी तुम्हारी स्त्री जो चूडाला थी, उसने तुम्हें उपदेश किया था; पर तुमने उसके वचनों का किस निमित्त निगदर किया ? में तो सब जानता हूँ, क्योंकि त्रिकालज्ञ हूँ; तो भी तुम अपने मुख से कहो । एक तो यह मूर्खता की कि उपदेश न अङ्गीकार किया और दूसरी यह मूर्खता की कि सर्वत्याग न करके फिर वन अङ्गीकार किया । जो सर्वत्याग करते तो सब दुःख मिट जाते । जब ऐसे देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! मैंने तो स्त्री, पृथ्वी, मन्दिर, हाथी इत्यादिक ऐश्वर्य और कुटुम्ब को त्याग किया है; आप कैसे कहते हैं कि त्याग नहीं किया ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! तुमने क्या त्यागा है ? राज्य में तुम्हारा क्या था । जैसे ऐश्वर्य आगे था, वैसे ही अब भी है और स्त्रियाँ भी जैसे और मनुष्य थे वैसे ही थीं; पृथ्वी, मन्दिर और हस्ती जैसे आगे थे, वैसे ही अब भी हैं । उनमें तुम्हारा क्या था जो त्याग किया ? हे राजन् ! सर्वत्याग तुमने अब भी नहीं किया । जो तुम्हारा हो उसको तुम त्याग करो, जिससे निर्दुःख पद को प्राप्त होओ । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब शूरवीर जो इन्द्रियजित् राजा था, वह मन में विचारने लगा कि यह वन मेरा है और वृक्ष, फूल, फल मेरे हैं, इनका त्याग करूँ । ऐसा विचारकर बोला, हे देवपुत्र ! वन, वृक्ष, फूल और फल जो मेरे थे, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो सर्वत्याग हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ; क्योंकि वन, वृक्ष, फूल और फल तुमसे पहले भी थे । इनमें तुम्हारा क्या है ? जो तुम्हारा हो, उसको त्यागो, तब सुखी होगे ।
हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि मेरी जलपान की बावली और बगीचे हैं, इनका त्याग करूँ, तब सर्वत्याग सिद्ध हो । फिर कहा, हे भगवन् ! मेरी यह बावली और बगीचे हैं, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो मेरा सर्वत्याग सिद्ध हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! सर्वत्याग अब
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<p align="center">❇ योगवाशिष्ठ ❇</p>भी नहीं हुआ। जो तुम्हारा है, उसको जब त्यागोगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा विचारने लगा कि अब मेरी मृगछाला और कुटी है, उसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर बोला कि हे देवपुत्र! मेरे पास एक मृगछाला और एक कुटी है। उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! मृगछाला में तुम्हारा क्या है, यह तो मृग की त्वचा है। और कुटी में तुम्हारा क्या है, यह तो मिट्टी और शिला की बनी है। इससे तो सर्वत्याग सिद्ध नहीं होता? जो कुछ तुम्हारा है, उसको त्यागोगे, तब सर्वत्याग होगा और तभी तुम सब दुःखों से छूट जाओगे। हे राम! जब ऐसे कुम्भज ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि अब मेरा एक कमण्डलु, एक माला और एक लाठी है, इसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर राजा शान्ति के लिए बोला, हे देवपुत्र! मेरी लाठी, कमण्डलु और एक माला है, उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो में सर्वत्यागी हुआ?
देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! कमण्डलु में तुम्हारा क्या है? कमण्डलु तो वन का तुम्बा है, उसमें तुम्हारा कुछ नहीं। लाठी भी वन के बाँस की है और माला भी काष्ठ की है, उनमें तुम्हारा क्या है? जो कुछ तुम्हारा है उसका त्याग करो। जब तुम उसका त्याग करोगे, तब दुःख से रहित हो जाओगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा शिखरध्वज ने मन में विचारा कि अब मेरा क्या रह गया। तब देखा कि एक आसन और वासन हैं, जिसमें फूल और फल रखते हैं; अब इनका भी त्याग करूँ। तब राजा ने कहा, हे भगवन्! आसन और वासन मेरे पास रह गये हैं, इनका भी में त्याग करता हूँ। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ। आसन तो भेड़े की ऊन का है और वासन मृत्तिका के हैं; इनमें तुम्हारा कुछ नहीं। जो कुछ तुम्हारा है, उसका त्याग करो, तब सर्वत्याग हो और तुम दुःख से निवृत्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा उठ खड़ा हुआ और वन की लकड़ी इकट्ठी करके उनमें
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ २२३
आग लगाई । जब बड़ी अग्नि लगी तब लाठी को हाथ में लेकर कहने लगा, हे लाठी ! मैं तेरे साथ बहुत देशों में फिरा हूँ, परन्तु तूने मेरे साथ कुछ उपकार न किया । अब मैं कुम्भज मुनि की कृपा से तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर लाठी को अग्नि में डाल दिया । फिर मृगछाला को हाथ में लेकर कहा, हे मृग की त्वचा ! बहुत दिन मैं तेरे ऊपर बैठा हूँ, परन्तु तूने कुछ उपकार न किया । अब कुम्भज मुनि की कृपा से मैं तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर मृगछाला को अग्नि में डाल दिया ।
फिर कमण्डलु को लेकर कहने लगा, हे कमण्डलु ! तू धन्य है कि मैंने तुझे धारण किया और तूने मेरे जल को धरा । तूने मुझमे गुणगोपन नहीं किया, तो भी कमण्डलु की जैसी प्रवृत्ति त्यागनी है, वैसी ही निवृत्ति की कल्पना भी त्यागनी है । इससे तुझे नमस्कार है, तू जा । ऐसे कहकर कमण्डलु भी अग्नि में जला दिया । फिर माला को हाथ में लेकर कहने लगा, हे माले ! तेरे दाने जो मैंने घुमाये हैं सो मानों अपने जन्म गिने हैं । तेरे सम्बन्ध से जप किया है और दिशा-विदिशा गया हूँ । अब तुझको नमस्कार है । ऐसे कहकर माला को भी अग्नि में डाल दिया । इसी प्रकार फल, फूल कुटी और आसन सब जला दिये । तब बड़ी अग्नि जगी और बड़ा प्रकाश हुआ । जैसे सुमेरु पर्वत के ऊपर सूर्य चढ़े और मणि का भी चमत्कार हो तो बड़ा प्रकाश होता है, वैसे ही बड़ी अग्नि लगी और राजा ने सम्पूर्ण सामग्री का त्याग किया । जैसे पके फल को वृक्ष त्यागता है और जैसे पवन चलने से ठहरता है तब धूल से रहित होता है, वैसे ही राजा सम्पूर्ण सामग्री को त्याग निर्विघ्न निर्द्वन्द्व हुआ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजसर्वत्याग-वर्णनं नाम द्विसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निदान सम्पूर्ण सामग्री जलकर भस्म हो गई । जैसे सदाशिव के गणों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ को स्वाहा कर दिया था, वैसे ही जितनी कुछ सामग्री थी, सो सब स्वाहा हो गई
२२४ 卐 योगवाशिष्ठ 卐
और वह बन बड़ा प्रज्वलित हुआ । जितने वृक्ष के रहनेवाले पक्षी थे, वे भाग गये और मृग, पशु जो आहार व जुगाली करते थे, वे भी सब भाग गये । जैसे पुर में आग लगने से पुरवासी भाग जावें, वैसे ही सब भाग गये । तब राजा ने मन में विचार कि अब कुम्भज की कृपा से में बड़े आनन्द को प्राप्त हुआ और अब सब मेरे दुःख मिट गये । जो कुछ वस्तु मन के संकल्प से रची थी सो सब जला दी, अब उनका न मुझ हर्ष है, न शोक । ये सब दुःख ममत्व से होते हैं, सो मेरा ममत्व अब किसी में नहीं रहा, इससे कोई दुःख भी नहीं । अब में ज्ञानवान हुआ हूँ, अब मेरी जय है; क्योंकि अब निर्मल होकर सबका मैंने त्याग किया है । ऐसा विचार करके राजा उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला, हे देवपुत्र ! अब तो मैंने सबका त्याग किया; क्योंकि आकाश मेरा वस्त्र है और पृथ्वी मेरी शय्या है ।
जब राजा ने ऐसे कहा, तब कुम्भज मुनि ने कहा, हे राजन् ! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ । जो तुम्हारा है उसका त्याग करो, जिससे तुम्हारे सब दुःख निवृत्त हो जावें । फिर राजा ने कहा, हे भगवन् ! अब तो मेरे पास और कुछ नहीं रहा, नङ्गा होकर तुम्हारे आगे खड़ा हूँ । अब एक रक्त-मांस की देह इन्द्रियों को धारण करनेवाली है । जो कहो तो इसका भी त्याग करूँ । पर्वत पर जाकर डाल दूँ । ऐसे कहकर राजा पर्वत को दौड़ा, पर कुम्भज मुनि ने रोका और कहा, हे राजन् ! ऐसे पुण्यवान् देह को क्यों त्यागते हो ? इसके त्याग से सर्वत्याग नहीं होता । जिसके त्याग से सर्वत्याग हो, उसका त्याग करो । इस देह में क्या दूषण है । जैसे वृक्ष में फूल-फल होते हैं और जब वायु चलती है, तब गिरते हैं, सो फूल-फल गिरने का कारण वायु है, वृक्ष में कुछ दूषण नहीं, वैसे ही देह में कुछ दूषण नहीं । देह को पालनेवाला जो अभिमान है, उसका त्याग करो तो सर्वत्याग सिद्ध हो । देह तो जड़ है, जो कुछ मनुष्य इसको देता है, वही यह लेता है, आगे से बोलता नहीं । इस जड़ के त्यागे क्या सिद्ध होता है ? जैसे पवन से वृक्ष हिलता है और भूकम्प में पर्वत काँपते हैं, वैसे ही देह आप कुछ नहीं करती;
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२५
और की प्रेरणा से चेष्टा करती है । जैसे पवन से समुद्र के तरङ्ग तृणों को जहाँ ले जाते हैं, वहाँ वे चले जाते हैं, वैसे ही देह आपसे कुछ नहीं करती । इसको जो प्रेरणा करनेवाला है, उसके बल से यह चेष्टा करती है । इससे देह के प्रेरक का त्याग करो तो सुखी होगे । हे राजन् ! जिससे सब है, जिसमें सब शब्द है और जो सब ओर से त्यागने योग्य है, उसका त्याग करो ।
राजा ने पूछा, हे भगवन् ! वह कौन है जो सब है, जिसमें सब शब्द है और जो सब ओर से त्यागने योग्य है ? हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! जिसके त्याग से जग व मृत्यु नष्ट हो जावे, सो कहिये । तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! जिसका नाम चित्त (आकार) है उसका त्याग करो । बाहर नाना प्रकार के आकार चित्त ही मे देख पड़ते हैं, इससे चित्त का ही त्याग करो । हे राजन् ! सर्प बिल में बैठा हो तो बिल का कुछ दूषण नहीं, विष-सर्प में है, जिसमें वह डसता है । इस-लिए उसके नाश का उपाय करो । और सब शब्द भी इस चित्त में ही हैं । आत्मा तो चिन्मात्र है । उसमें न एक है और न द्वैत है । सब ओर से इसी चित्त का त्याग करना योग्य है । जब इस चित्त का त्याग करोगे, तब त्यागरूपी अमृत से अमर हो जाओगे और जग-मृत्यु से रहित होगे । जो चित्त का त्याग न करोगे तो फिर देह धारण कर दुःख भोगोगे । जैसे एक खेत में अनेक दाने उत्पन्न होते हैं, पर जब खेत ही जल जाता है, तब अन्न नहीं उपजता, वैसे ही यह जो देह और जरा-मृत्यु नामक संसार के दुःख हैं, इनका बीज चित्त ही है । जैसे अनेक दानों का कारण खेत है, वैसे ही संसार के असंख्य दुःखों का कारण चित्त है । इससे हे राजन् ! चित्त का त्याग करो । जब इसका त्याग करोगे तब सुखी होगे । हे राजन् ! जिसने सर्वत्याग किया, वह सुखी हुआ है । जैसे आकाश सब पदार्थों से रहित है, किसी का स्पर्श नहीं करता और सबसे बड़ा और सुखरूप है और सब पदार्थों के नष्ट होने पर भी ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही हे राजन् ! तुम भी सर्व-त्यागी हो रहो । राज्य, देह, कुटुम्ब और गृहस्थ आदिक जो आश्रम
२२६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है, उन सबकी चित्त ने कल्पना की है। जो एक का त्याग नहीं होता तो कुछ नहीं त्यागा। जब चित्त का त्याग करोगे, तब सर्व-त्याग हो।
हे राजन! यह धर्म, वैराग्य और ऐश्वर्य तीनों चित्त की कल्पना हैं, जब चित्त पुण्यकर्म में लगता है, तब पुण्य ही प्राप्त होता है और जब पापक्रिया में लगता है, तब पाप ही प्राप्त होकर अधर्म और दरिद्र होता है। जब पुण्य का फल उदय होता है, तब सुख प्राप्त होता है और जब पाप का उदय होता है, तब दुःख प्राप्त होता है। इससे जन्ममरण के दुःख नहीं मिटते। जब चित्त का त्याग होता है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे राजन! जो पुरुष किसी वस्तु को नहीं चाहता, उसकी बहुत पूजा होती है। जो कहता है कि इस वस्तु को मुझको दे, उसको कोई नहीं देता। इससे सर्वत्याग कर सुखी हो। सर्वत्याग करने में सर्वव्यापी तुम ही होगे और सर्वात्मा होकर संपूर्ण ब्रह्माण्ड अपने में देखोगे। जैसे माला के दाने में तागा होता है, और दाने भी तागे के आधार में होते हैं, उनमें और कुछ नहीं होता, वैसे ही देखोगे कि तुम सर्वमय और एकरस हो; तुम ही में ब्रह्माण्ड स्थित है। सब तुमही हो, तुमसे कुछ भिन्न नहीं। हे राजन! जिसने सबका त्याग किया है, वह सुखी है और समुद्र की नाईं स्थित है, उसको कोई दुःख नहीं। इससे तुम चित्त का त्याग करो, जिसमें रागद्वेष मिट जावे। इस चित्त के इतने नाम हैं—चित्त, मन, अहंकार, जीव और माया। हे राजन! अपने ऐश्वर्य को त्यागने और औरों की भिक्षा लेने में तो चित्त वश नहीं होता, चित्त तभी वश होता है, जब पुरुष निर्वास्निक होता है। जब तक चित्त रहता है, तब तक सर्वत्याग नहीं होता। जब चित्त की चेतना निवृत्त होती है, तब चित्त का त्याग होता है। चित्त का त्याग करने पर भी जब त्याग के अभिमान से रहित होगे, तब सर्वात्मा होगे। जब चित्त को त्यागोगे, तब उस पद को प्राप्त होगे, जो जितने ऐश्वर्य और सुख है उनका आधार है; जितने दुःख हैं उनका नाश करनेवाला है; जिसके जान लेने पर किसी पदार्थ की इच्छा न
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रहेगी; क्योंकि सब आनन्दों का आधार तेरा स्वरूप है, फिर इच्छा किसकी रहे। जैसे आकाश के आश्रय में देवलोक आदि सब विश्व रहता है और आकाश को कुछ इच्छा नहीं वैसे ही वह ब्रह्मपद है। आकाश कोई इच्छा नहीं करता, तो भी सब कुछ आकाश ही में है और वह सबका आधार है, वैसा ही ब्रह्म है। वही ब्रह्मरूप तुम हो।
हे राजन्! जब तुम भी किसी की इच्छा न करोगे, तब निर्वासनिक होकर अपने स्वरूप में स्थित होगे और जानोगे कि सबका आत्मा मैं ही हूँ, सबको धारण कर रहा हूँ और भूत भविष्यत्, वर्तमान तीनों काल भी मेरे आश्रय में हैं। जैसे समुद्र के आश्रित तरङ्ग हैं, वैसे ही मेरे आश्रित काल है। चित्त का सम्बन्ध तुम्हें प्रमाद से है और प्रमाद यही है कि चिन्मात्रपद में चित्त होकर फुरता है। चित्त ऐसा है कि वह जड़ भी है और चेतन भी। इसी का नाम चिज्जड़ग्रन्थि है। जब यह ग्रन्थि खुल जावेगी, तब तुम अपने को वासुदेव रूप जानोगे। जब निर्वासनिक होगे, तब संसाररूपी वृक्ष नष्ट हो जावेगा। जैसे बीज में वृक्ष होता है, वैसे ही चित्त में संसार है और जैसे बीज के जलने से वृक्ष भी जल जाता है, वैसे ही वासना के दग्ध होने से संसार भी दग्ध होता है। हे राजन्! जैसे किसी डिब्बे में रत्न होते हैं तो रत्नों के नाश होने पर डिब्बा नहीं नष्ट होता, पर डिब्बे के नष्ट होने पर रत्न नष्ट होते हैं। डिब्बा क्या है और रत्न क्या है सो भी सुनो। डिब्बा तो चित्त है और रत्न देह है। इससे चित्त के नष्ट होने का उपाय करो। जब चित्त नष्ट होगा, तब देह से रहित होगे। देह के नष्ट होने पर चित्त नहीं नष्ट होता; पर चित्त के नष्ट होने पर देह नष्ट हो जाती है। जब यह देह चित्तरूपी धूल से रहित होगा, तब तुम केवल शुद्ध आकाश रहोगे।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चित्तत्यागवर्णनं नाम त्रिसप्ततितमसर्गः ॥ ७३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा कि चित्त का त्यागना ही सर्वत्याग है, तब शिखिध्वज ने पूछा, हे भगवन्! मैं चित्त को कैसे स्थित करूँ? चित्त संसाररूपी आकाश की धूल है।
२२८ * योगवाशिष्ठ *
संसाररूपी वृक्ष का निवासी चित्तरूपी वानर कभी स्थिर नहीं होता; ऐसे चित्त को मैं कैसे स्थिर करूँ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन! चित्त का रोकना तो सुगम है। नेत्रों के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न करना पड़ता है, परन्तु चित्त के रोकने में कुछ यत्न नहीं। हाँ, दीर्घदर्शी को यह सुगम है और अज्ञानी को कठिन। जैसे चाण्डाल के लिए पृथ्वी का राजा होना और तृण के लिए सुमेरु होना कठिन है, वैसे ही अज्ञानी के लिए चित्त का रोकना कठिन है। राजा ने पूछा, हे देवपुत्र! पर्वत तोड़ना कठिन है तो भी वह टूट जाता है; परन्तु मन का रोकना अति कठिन है। जैसे बड़े मच्छ को बालक नहीं रोक सकता, वैसे ही मैं चित्त को नहीं रोक सकता। हे देवपुत्र! तुम कहते हो कि मन का रोकना सुगम है, पर मुझको तो ऐसा कठिन लगता है, जैसे अन्धे पुरुष को लिखी हुई मूर्ति नेत्रों से नहीं देख पड़ती तो वह उसे हाथ में कैसे ले, वैसे ही मन को वश करना मुझे कठिन भामता है। प्रथम चित्त का रूप मुझसे कहिये।
कुम्भज बोले, हे राजन! इस चित्त का रूप वासना है। जब वासना नष्ट होगी, तब चित्त भी नष्ट हो जावेगा। इसमें वासनारूपी बीज को तुम नष्ट करोगे तो चित्तरूपी वृक्ष भी नष्ट हो और न कोई डाल रहे, न कोई फल-फूल हों। यदि डाल को काटोगे तो वृक्ष फिर फिर होगा; क्योंकि डाल के काटने से वृक्ष नष्ट नहीं होता, फिर कई डालें लग जाती हैं। जब बीज को नष्ट करोगे तब वृक्ष भी नष्ट हो जावेगा। राजा बोले, हे भगवन्! चित्तरूपी फूल की यह संसार सुगन्ध है; चित्तरूपी कमल का यह संसार सरोवर है; देहरूपी तृण को उठाने और उड़ानेवाला पवन चित्त है; चित्तरूपी तिल का तेल जरा-मृत्यु और आध्यात्मिक, आधि-भौतिक दुःख हैं; चित्तरूपी आकाश की अँधेरी यह संसार है और हृदय-रूपी कमल का भँवरा चित्त है। बीज क्या है, और डाल क्या है, डाल का काटना क्या है, वृक्ष क्या है और फल-फूल क्या है, सो कृपा कर कहो। कुम्भज बोले, हे राजन! चैतन्यरूपी खेत स्वच्छ और निर्मल है। उसमें अहंभाव बीज है। उर्मी को अहंकार, चित्त, मन, जड़ और मिथ्या
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २२६
कहते हैं। उस अहंकार में जो संवेदन है वही देह और इन्द्रियाँ होकर फैला है और उसमें जो निश्चय है वह बुद्धि है। उस बुद्धि में जो निश्चय है कि 'यह मैं हूँ' वही संसार है और वही जीव का अहंकार है। अहंकार इस वृक्ष का बीज है; चित्तरूपी वृक्ष की डालें और सुख-दुःख इस चित्तरूपी वृक्ष के फल हैं। हे राजन्! एकान्त में बैठकर और चिन्तना से रहित होकर एक आश्रय का त्याग करना और दूसरे को अङ्गीकार करना और इस प्रकार स्थित होना कि मैं ऐसा त्यागी हूँ, इसकी चिन्तना ही उस डाल का काटना है। हे राजन्! इस डाल के काटने से वृक्ष नहीं नष्ट होता; क्योंकि यह तो ऐसा होकर स्थित होता है कि मैं हूँ। होना यह चाहिए कि वासना त्याग करे और कुछ न फुरे। जब अहँरूपी बीज नष्ट हो जाता है, तब जगत्-रूपी वृक्ष भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि इसका बीज अहँ ही है। जब अहंभाव बीज नष्ट हुआ, तब वृक्ष भी नष्ट हो जाता है। इससे चित्तरूप बीज को तुम नष्ट करो।
राजा बोले, हे देवपुत्र! तुम्हारा निश्चय मैंने यह जाना है कि जगत् के त्यागने से चित्त को नष्ट करना श्रेष्ठ है। हे भगवन्! इतने काल तक मैं डालें काटता रहा हूँ, इसी से मेरे दुःख नहीं नष्ट हुए। आपने कहा कि अहँ ही दुःखदायी है, इसलिए कृपा करके कहिए कि अहँ कैसे उत्पन्न होता है? कुम्भज बोले, हे राजन्! शुद्ध चैतन्य में जो चैतन्योन्मुखत्व अहँ का स्फुरण हुआ कि 'मैं हूँ,' वही दृश्यरूप हुआ है और मिथ्या संवेदन से हुआ है। जैसे शान्त समुद्र में पवन से लहरें उठती हैं, वैसे ही शुद्ध आत्मा में अहँ फुरता है और उससे संसार हुआ है। इससे अहंभाव नष्ट करो, जिससे शान्तपद में स्थित होओ। जो दुःखदायक वस्तु है, उसको नष्ट करे तो शान्त हो। राजा ने पूछा, हे भगवन्! वह कौन वस्तु है, जो जलाने योग्य है और वह कौन अग्नि है, जिसमें वह जलती है? कुम्भज बोले, हे त्यागियों में श्रेष्ठ राजा! तुम्हारा जो अपना स्वरूप है, उसका विचार करो कि 'मैं क्या हूँ' और 'यह संसार क्या है' इसका दृढ़ विचार करना ही अग्नि है।
२३० * योगवाशिष्ठ *
मिथ्या अनात्मा अर्थात देह-इन्द्रियादिक में अहंभाव को अनात्मस्वरूप विचार-अग्नि में जलाओ। जब विचार-अग्नि में अहंकार-बीज को जलाओगे, तब केवल चिन्मात्र रहेगा। हे राजन्! मेरे उपदेश से तुम अपने को क्या जानते हो, सो मुझसे कहो। राजा ने कहा—मैं राजा, पृथ्वी, पर्वत, आकाश, दशों दिशा, रुधिर, मांस, देह, कर्म-इन्द्रियां, ज्ञान-इन्द्रियां, मन, बुद्धि और अहंकार नहीं; मैं इससे रहित शुद्ध आत्मा हूँ। परन्तु हे भगवन्! अहंरूपी कलङ्क मुझे कहाँ से लगा है कि उस कलङ्क को मैं दूर नहीं कर सकता?
तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! इसी अहं का त्याग करो, जो मैंने त्याग किया है। बल्कि यह फुरना भी न फुरे, नितान्त शून्य हो रहे। जब इसका त्याग करोगे, तब चैतन्य आकाश ही रहेगा। हे राजन्! तुम अपने स्वरूप को जानो कि कौन हो। राजा ने कहा, हे भगवन्! मैं यह जानता हूँ कि मेरा स्वरूप वही आत्मा है, जो सबका आत्मा है; मैं आनन्दरूप हूँ और सब मेरा प्रकाश है। परन्तु मैं यह नहीं जानता कि अहंभाव की कल्पना कहाँ से लगी है? इसका मैं नाश नहीं कर सकता। पर यह मैंने जाना है कि संसार का बीज चित्त ही है और चित्त का बीज अहंकार है। तुम्हारी कृपा से मैंने जाना है कि मेरा स्वरूप आत्मा है और 'अहं,' 'त्वं' मुझमें कोई नहीं। तुम भी इस अहं-रूप कलङ्क को दूर कर रहे हो, पर मुझसे दूर नहीं होता। फिर फिर मन में आता है कि मैं शिखिध्वज हूँ। इस अहं से मैं संसारी हूँ। इसके नाश का उपाय आप कहिए। कुम्भज बोले, हे राजन्! कारण बिना कार्य नहीं होता। जो कारण बिना कार्य भासित हो तो जानिये कि वह भ्रममात्र और मिथ्या है, और जिसका कारण पाइये, उसे जानिये कि सत्य है। इसमें तुम कहो कि इस अहंकार का कारण क्या है, तब मैं उत्तर दूँगा? राजा बोले, हे भगवन्! अहंकार का कारण शुद्ध आत्मा है। शुद्ध आत्मा में जो यह ज्ञान हुआ है कि मैं हूँ, यही उत्थान है। और दृश्य की ओर जो मन लगा है, सो संवेदन ही अहं का कारण है। कुम्भज बोले, हे राजन्! इस जानने का कारण क्या है?
❋ निर्वाण प्रकरण ❋
२३१
प्रथम तुम यह कहो. पीछे दूर करने का उपाय मैं कहूँगा। हे राजन्! जिसका कारण सत् होता है, वह कार्य भी सत् होता है और जो कारण झूठ होता है तो कार्य भी झूठा होता है। जैसे भ्रमदृष्टि में जो दूसरा चन्द्रमा आकाश में दीखता है, उसका कारण भ्रम है। इससे इस भ्रम को ही संवेदन का कारण कहा। सो जानना ही द्रष्टा और दृश्य-रूप होकर स्थित हुआ है।
राजा बोले, हे देवपुत्र! जानने का कारण देहादिक दृश्य है; क्योंकि जानना तब होता है। जब जानने योग्य वस्तु आगे होती है, और जो आगे वस्तु नहीं होती है तो वह जाना भी नहीं जाता। इससे जानने का कारण देहादिक हुए। कुम्भज बोले, हे राजन्! ये देहादिक मिथ्या भ्रम से हुए हैं; इनका कारण तो कोई नहीं। राजा बोले, हे देवपुत्र! देह का कारण तो प्रत्यक्ष है, क्योंकि पिता से इसकी उत्पत्ति हुई है और यह प्रत्यक्ष कार्य करता देख पड़ता है; आप कैसे कहते हैं कि कारण बिना है और मिथ्या है? कुम्भज बोले, हे राजन्! पिता का कारण कौन है? पिता भी मिथ्या है। जैसे स्वप्न में पिता और पुत्र देखिये, वे दोनों मिथ्या हैं। इससे कहो, पिता का कारण क्या है? राजा बोले, हे भगवन्! पुत्र का कारण पिता और पिता का कारण पितामह है। इसी प्रकार परम्परा से सबका कारण ब्रह्मा प्रत्यक्ष है; क्योंकि सबकी उत्पत्ति ब्रह्माजी से हुई है। कुम्भज बोले, हे राजन्! ब्रह्मा से काष्ठ पर्यन्त सब सृष्टि संकल्प की रची है और देह भी भ्रम करके भासित होता है। जैसे मृगतृष्णा का जल और सीपी में रूपा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में देह भासित होती है। जैसे आकाश में दो चन्द्रमा भ्रम से दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में यह संसार भ्रम से भासित होता है। जो तुम कहो कि क्रिया कैसे दीखती है तो सुनो। जैसे कोई कहे कि बन्ध्या के पुत्र को भूषण पहनाये हैं, तो जब बन्ध्या का पुत्र ही नहीं तो भूषण किसने पहने! अथवा जैसे स्वप्न में सब क्रिया भ्रममात्र होती है; वैसे ही यह संसार तुम्हारे भ्रम में है। जब भ्रम निवृत्त होगा, तब केवल आत्मा ही भासित होगा। हे राजन्! जैसे
२३२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
तुम अपना देह जानते हो, वैसे ही ब्रह्मा को भी जानो। ब्रह्मा का कारण कौन है ? इसमें इस भ्रम में जागो, जिसमें तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जावे।
राजा बोले, हे भगवन् ! मैं अब जागा हूँ और मेरा भ्रम नष्ट हो गया है। मैंने अब जाना है कि यह संसार केवल संकल्पमात्र मिथ्या है। जो कुछ दृश्य है सो मिथ्या है और एक आत्मा ही मेरे निश्चय में मन है। हे भगवन् ! ब्रह्मा का कारण भी ब्रह्म है और वह अद्वैत अविनाशी और सर्वात्मा है। ब्रह्मा का कारण यह हुआ। कुम्भज बोले, हे राजन् ! कारण और कार्य द्वैत में होते हैं, अतः वे असत् हैं, क्योंकि इस कारण का देश, वस्तु और काल में अन्त हो जाता है, अतः यह परिणामी है। जो वस्तु परिणामी हो, वह मिथ्या है। हे राजन् ! आत्मा अद्वैत है; जिसमें न एक कहना है, न द्वैत कहना है। न वह भोगता है, न भोग है, न कर्म है, न अद्वैत है। जब वह स्वरूप से परिणाम को नहीं प्राप्त होता और सर्वात्मा है, जब सर्व देश और सर्वकाल भी है, जब वह सब वस्तुओं में पूर्ण और अद्वैत है तब यदि वह अद्वैत है तो कारण कार्य किसका हो ? कारण-कार्य का सम्बन्ध द्वैत में होता है और वह परिणामी होता है। जिसमें देशकाल का अन्त है वह अद्वैत आत्मा है। उसमें न कोई देश है, न काल है और न कोई वस्तु है; वह केवल चिन्मात्रपद है।
हे राजन् ! मैं जानता हूँ कि तुम जाग्रत होगे, क्योंकि तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जाना है। जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों में गल जाती है, वैसे ही तुम्हारा अज्ञान नष्ट होता जा रहा है। अज्ञान के नष्ट होने पर तुम आत्मा ही होगे। तुम अपने प्रत्यक् चैतन्यस्वरूप में स्थित हो और देखो कि ब्रह्मा आदिक सब परमात्मा का किंचन है। परमात्मा ही इन रूपों में स्थित हुआ है। और जो देख पड़ता है, उस सबका अपना आप आत्मा है। जब जागेगा तो जानेगा, जागे बिना नहीं जान सकता। राजा बोला, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से अब मैं जागा हूँ और जानता हूँ कि मेरा स्वरूप आत्मा है और में निर्मल हूँ। अब
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २३३
मेरा मुझको नमस्कार है। एक मैं ही हूँ; मुझसे भिन्न कुछ नहीं। मैंने अपने को जाना है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राजविश्रान्तिवर्णनं नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥
राजा ने पूछा, हे भगवन्! आप कैसे कहते हैं कि ब्रह्मा का कारण कोई नहीं? आत्मा ऐसा अनन्त, अच्युत, अव्यक्त और अद्वैत ईश्वर है वह षट् परिमाणों का विषय नहीं। तब परब्रह्म तो ब्रह्मा का कारण है? कुम्भज बोले, हे राजन्! तुम्हीं कहते हो कि आत्मा अनन्त है। जो अनन्त है, उसको देश, काल और वस्तु का परिच्छेद नहीं होता। जो सब देश, सब काल, और सब वस्तुओं में पूर्ण है, वह कारण-कार्य किसका हो? कारण तब हो, जब पहले द्वैत हो। सो आत्मा अद्वैत है, अतः वह नहीं हो सकता। और कारण उसको कहते हैं, जो कार्य से पूर्व हो और पीछे भी वही हो—जैसे घट के आदि में मृत्तिका है और अन्त में भी मृत्तिका होती है। वह कारण कहलाता है। पर आत्मा में न आदि है, न अन्त है। वह तो अनन्त है। कारण तब होता है, जब परिणाम होता है। सो आत्मा अच्युत है, अपने स्वरूप से कदापि नहीं गिरा। और भोक्ता भी द्वैत से होता। आत्मा अद्वैत है। वह भोग और भोक्ता दोनों नहीं। और आत्मा में कर्म भी नहीं। आत्मा से आदि कौन है जिससे आत्मा सिद्ध हो? वह किसी का कार्य भी नहीं; क्योंकि कार्य इन्द्रियों का विषय होता है। सो आत्मा अव्यक्त है। और जो कार्य होता है तो उसका कारण भी होता है। सो आत्मा सबका आदि है, उसका कारण कौन हो? जो सर्वात्मा है और स्वच्छ आकाशवत् निर्मल है, वही तुम्हारा स्वरूप है। राजा ने पूछा, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है! मैंने जाना है कि आत्मा अद्वैत है, वह न किसी का कारण है, न कार्य, और अनुभवरूप है। वही मैं हूँ। मैं निर्मल हूँ, विद्या-अविद्या के कार्य से रहित हूँ; निर्वाणपद हूँ और निर्विकल्प हूँ; मुझमें स्फुरण कोई नहीं। और मैं नहीं और मैं ही हूँ। मेरा मुझको नमस्कार है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पञ्चसप्ततितमसर्गः ॥ ७५ ॥
२३४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! राजा शिखिध्वज कुम्भज मुनि के उपदेश में प्रबुद्ध हो और ऐसे वचन कहकर केवल निर्वाणपद में स्थित हुआ। जब निर्विकल्प और स्फुरण से रहित हो एक मुहूर्त्त पर्यन्त स्थित रहा—जैसे वायु से रहित दीपक स्थित होता है—तब कुम्भज ने उसे जगाकर कहा—हे राजन् ! तुम्हें समाधि में क्या है और उत्थान में क्या है तुम तो केवल आत्मा हो। मैं जानता हूँ कि तुम परमज्ञान से शोभित हुए हो। जैसे डिब्बे में रत्न होता है तो उसका प्रकाश बाहर नहीं देख पड़ता और जब डिब्बे से निकालकर देखिये तब बड़ा प्रकाश दीखता है, वैसे ही अविद्यारूपी डिब्बे से तुम निकले हो और परमज्ञान से शोभित हुए हो। हे राजन् ! अब तुममें न कोई क्षोभ है और न कोई उपाधि है। अब तुम संसार के रागद्वेष से रहित, शान्तरूप, जीवन्मुक्त होकर विचारपूर्वक विचरो तो तुम्हें कोई उपाधि न लगेगी।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार कुम्भज मुनि ने कहा, तब राजा शान्तरूप हो गया और बोला, हे भगवन् ! जो कुछ आपने आज्ञा की है, उसे मैंने भली प्रकार जाना। पर अभी एक प्रश्न है और उसका उत्तर कृपा करके दो कि मैं दृढ़ स्थित होके रहूँ। हे भगवन् ! आत्मा तो एक है और शुद्ध और केवल आकाशरूप चैतन्यमात्र है; उसमें द्रष्टा, दर्शन और दृश्य त्रिपुटी कहाँ से उपजी ? कुम्भज बोले, हे राजन् ! जो कुछ स्थावर-जङ्गम संसार है, वह महाप्रलय पर्यन्त है। जब महाप्रलय होता है, तब केवल आत्मा ही शेष रहता है, जो स्वच्छ और निर्मल है। वहाँ न तेज होता है, न अन्धकार है। वह केवल अपने आप स्वभाव में स्थित होता है। जो कुछ आनन्द है, उसका अधिष्ठान आत्मा है। वह सत् और असत् से रहित है। जिसको बुद्धि 'इदं' करके कहती है, उसे सत् कहिये और जिसको नहीं कहती; उसे असत् कहिये। वह सत् असत् से रहित, सब शुभ लक्षणों से संयुक्त और अपना स्वभाव-मात्र है। उसमें कोई उपाधि नहीं। वह सर्वदा प्रकाशवान और उदय रूप है। यह संसार उस परमात्मा का चमत्कार है। जैसे रत्न का चमत्कार लाट होती है, वैसे ही ब्रह्म का चमत्कार यह संसार है। इससे
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ २३५
यह ब्रह्मरूप है । जो ब्रह्मा से भिन्न है, उसे मिथ्याभ्रम ही जानना । जो कुछ आकार भासते हैं, सो असत् है ।
हे राजन् ! जो सब आकार मिथ्या हैं, तो तुम्हारा संवेदन भी मिथ्या है । आत्मा में अहं त्वं का कोई उत्थान नहीं । वह केवल ज्ञानमात्र है, केवल सत् और आनन्दरूप है और अविद्यातम से रहित प्रकाशरूप है । वह प्रमाणों से नहीं जाना जाता, क्योंकि इन्द्रियों का विषय नहीं और मन की चिन्तना से रहित है, क्योंकि सबका द्रष्टा और सबका अपना आप अनुभवरूप है । हे राजन् ! तुम उसी में स्थित हो । आत्मा, बड़े से बड़ा है; सूक्ष्म से सूक्ष्म है और स्थूल से स्थूल है, जिसमें आकाश भी अणु सा है, उसमें ब्रह्माण्ड भी तृण-समान है । वह अपने आपसे पूर्ण है । उससे किंचित् भी उत्पन्न नहीं हुआ और नाना प्रकार करके स्थित हुआ है । स्फुरण से जगत् भासित होता है और स्फुरण के निवृत्त होने पर केवल शुद्ध आत्मा है । राजा ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि संसार स्फुरण मात्र है और आत्मा शुद्ध शान्तिरूप और निर्विकल्प है । तो उसमें संवेदन का स्फुरण कहाँ से आया ? कुम्भज बोले, हे राजन् ! स्फुरण भी आत्मा का चमत्कार है । जैसे पवन में स्पन्दन और निःस्पन्द दोनों शक्ति हैं, जब वायु चेतना है, तब चलना प्रकट होता है, और जब ठहर जाता है, तब प्रकट नहीं होता, वैसे ही संवेदन जब चेतना है, तब नाना प्रकार होते हैं और जगत् भासित होता है । और जब वह स्फुरण मिट जाता है, तब केवल शुद्ध आत्मा भासित होता है । हे राजन् ! आत्मा सत्तामात्र है और संसार भी सन्मात्र आत्मा ही है । जो सम्यकदृष्टि से देखिये तो आत्मा ही दीखता है और जो असम्यकदृष्टि से देखिये तो दुःखदायक जगत् दीखता है । जिसके मन में संसारभावना है, उसको वह दुःखदायक लगता है और जिसके हृदय में आत्मभावना होती है, उसको आत्मा ही दीखता है और संसार सुखरूप होता है; क्योंकि आत्मा अपने आपका नाम है । जिसने जगत् को अपना आप जाना है, उसको दुःख कहाँ ?
हे राजन् ! यह संसार भावनामात्र है जैसी भावना होती है, वैसा
२३६ ॐ योगवासिष्ठ ॐ
ही यह दीखता है। जिसकी भावना विष में अमृत की होती है, उसे विष भी अमृत हो जाता है और जिसकी भावना अमृत में विष की होती है, उसे अमृत भी विष हो जाता है। अतः संसार भावनामात्र है। मनुष्य जैसी भावना पक्की करता है, चाहे आगे वह वस्तु न हो तो भी उपस्थित हो जाती है अतएव संसार भावनामात्र और मिथ्या है। ज्ञानवान को दुःख कभी नहीं होता और अज्ञानी को सुख कभी नहीं होता। हे राजन् ! अहंता और संवेदन, चित्त और चैत्य, ये भी आत्मा ही की संज्ञा है। जैसे आकाश, शून्य, नभ, ये सब संज्ञा आकाश ही की हैं, वैसे ही ये सब संज्ञा आत्मा की हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। 'अहं', 'त्वं' सब आत्मा के आश्रित हैं। यद्यपि भूषण सुवर्ण के आश्रित होते हैं, परन्तु सुवर्ण से भूषण तब होता है, जब अपने पूर्व-रूप को त्यागता है। आत्मा वैसा भी नहीं। वह केवल एकरस है और अपने आपमें स्थित है; कभी परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त होता। यह संवेदन आत्मा का चमत्कार है और आत्मा सत्-असत् से परे है। जो कुछ दृश्य है, वह आत्मा में नहीं, चित्त ने रचा है, अतएव आत्मा से परे है।
हे राजन् ! वह कारण-कार्य किसका हो ? कारण-कार्य तब होता है, जब दृश्य होता है ? जब आत्मा किसी का विषय नहीं, तब कारण-कार्य किसका हो ? विश्व के आदि में भी आत्मा है, अन्त में भी आत्मा है और मध्य में भी आत्मा ही है। जो कुछ और भासित होता है, वह भ्रममात्र है—जैसे आकाश में जो घर, मण्डल और पुर दीखते हैं, उनका आदि भी आकाश है, अन्त भी आकाश है और मध्य भी आकाश है और वे सब मिथ्या हैं, जैसे अग्नि नाना आकार-प्रकार में देख पड़ती है, और वे सब आकार मिथ्या हैं, एक अग्नि ही है, वैसे ही सबके आदि, मध्य और अन्त में एक आत्मा ही सार है। हे राजन् ! जल में भी देश-काल होता है, क्योंकि वह दृश्य है और इन्द्रियों का विषय है। जैसे यह तरङ्ग अमुक स्थान से उठा और अमुक स्थान में लीन हुआ, यहाँ स्थान देश हुआ और उपजकर इतने काल
*** निर्वाण प्रकरण *** २३७
तक रहा, यह काल हुआ। पर जिसको इन्द्रियाँ अपना विषय न कर सकें, उसमें देश-काल कैसे हो? राजा बोले, हे भगवन्! अब मैंने भली प्रकार जान लिया है कि आत्मा चिन्मात्र है तथा ज्ञान-इन्द्रियों और कर्म-इन्द्रियों से परे है। देश, काल और इन्द्रियाँ मन से जानी जाती हैं कि अमुक देश है और अमुक काल है; पर जहाँ इन्द्रियाँ और मन ही न हो, वहाँ देश-काल कहाँ है?
कुम्भज बोले, हे राजन्! जो तुमने ऐसे जाना तो तुम जागे हो। आत्मा में देश, काल कोई नहीं। यह जीव मन और इन्द्रियों से जानता है कि यह देश है और यह काल है। जो इनसे रहित होकर देखे तो आत्मा ही दीखे और जो इन सहित देखे तो संसार ही देख पड़ेगा। हे राजन्! इनसे रहित होकर देखो, तुममें कुछ संसार न रहे कि अमुक प्रश्न किया और अब अमुक प्रश्न करूँ। संसार तब तक होता है, जब तक इनका संयोग अपने साथ होता है। हे राजन्! ब्रह्म से ब्रह्म को देखो और पूर्ण को देखो, जिसमें तुम भी पूर्ण हो। जब तुम पूर्ण होगे, तब सब ओर अपने को ही जानोगे, सब संज्ञा तुम्हारी ही होगी और उस निर्वाच्य पद को प्राप्त होगे, जहाँ इन्द्रियों की गति नहीं है। केवल आकाशरूप है। जैसे आकाश अपनी शून्यता से पूर्ण है, वैसे ही तुम भी अपने चैतन्य स्वभाव में आप पूर्ण होगे। जब तुम मनसहित षट् इन्द्रियों से रहित होकर देखोगे, तब अपने को, फिर यदि इन सहित भी देखोगे तो भी तुम्हें चैतन्य आत्मा ही भासित होगा। संसार का शब्द और अर्थ तुम्हारे हृदय से उठ जावेगा। शब्द अर्थात् संसार है, यह कहना और अर्थ अर्थात् उसकी मत् जानना। केवल आकाशरूप आत्मा ही भासित होगा। संसार संवेदन मात्र है, और संवेदन चित्तशक्ति का चमत्कार है। यही चित्त-शक्ति ब्रह्मा के रूप में स्थित हुई है और संसार को देखने लगी है। जब यह शक्ति अन्तर्मुख होती है, तब आत्मा ही देख पड़ता है, जो सदा एकरस है, और जब बहिर्मुख होती है, तब संसार देख पड़ता है। जीव जैसी भावना करता है, वैसा ही आगे दीखता है। जब
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संसार की भावना होती है तब संसार ही भासता है । और जब आत्मा की भावना होती है तब आत्मा ही भासता है । आत्मा सदा एकरस और असंसारी है, इससे हे राजन् ! तुम आत्मा की भावना करो कि तुम्हें आत्मा ही भासित हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे षट्सप्ततितमसर्गः ॥ ७६ ॥
कुम्भज बोले, हे राजन् ! यह संसार जो तुम्हें भासित होता है, सो आत्मा में नहीं है । केवल शुद्ध आत्मा में जो अहं उत्थान है वही संसार है । पर अहं का वह चमत्कार न सत् है, न असत्, न भीतर है, न बाहर; न शून्य है, न अशून्य; केवल अपने आपमें स्थित है । संसार का प्रध्वंसाभाव भी नहीं होता, अर्थात् पहले हो और पीछे नाश हो जावे, ऐसा नहीं होता । आत्मा में संसार उदय-अस्त नहीं होता; केवल अपने आपमें स्थित है, उसमें भिन्न नहीं है । किन्तु आत्मा को यह भी नहीं कह सकते कि केवल अपने आपमें स्वाभाविक स्थित है; उनमें वाणी की गति नहीं है । वाणी उसको कहती है, जहाँ दृगग होता है, पर जहाँ दृगग न हो, वहाँ वाणी क्या कहे । यह कहना भी तुम्हारे उपदेश के निमित्त है; आत्मा में किसी शब्द की प्रवृत्ति नहीं । हे राजन् ! ऐसा आत्मा किसका कारण-कार्य हो ? आत्मा तो शुद्ध, निर्विकार और प्रमाणों से रहित है । जो किसी लक्षण में प्रमाण नहीं किया जाता सो आकार होकर स्थित हुआ है और शान्तरूप है ।
हे राजन् ! ऐसा आत्मा किसका कारण-कार्य हो ? कारण-कार्य तब होता है, जब प्रथम कारण परिणाम और क्षोभ को प्राप्त होता है, पर आत्मा तो शान्तरूप है । और कारण तब हो जब क्रिया से कार्य को उत्पन्न करे । पर आत्मा तो अक्रिय अर्थात् क्रिया से रहित है । कारण को कार्य से जाना जाता है, पर आत्मा चिह्न से रहित है और प्रमाणों का विषय नहीं ? इससे आत्मा किसी का कारण-कार्य नहीं है । आत्मा को कारण-कार्य मानने में मुझे आश्चर्य होता है । हे राजन् ! जो वस्तु उपजती है, वह नष्ट भी होती है, और जो नष्ट होती है वह
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उपजती भी है। पर आत्मा सबका आदि, अजन्मा और निर्विकार है। उसमें तुम स्थित हो जिससे तुम्हारा संसार निवृत्त हो जावे। यह संसार अज्ञान से भासित होता है। जब तुम स्वरूप में स्थित होकर देखोगे तब न भासित होगा; और ऐसे भी न भासित होगा कि आगे था, अब निवृत्त हुआ है। तब तो एकरस आत्मा ही दीखेगा और जीव केवल शून्य आकाश हो जावेगा। संसार से रहित होने को शून्य कहते हैं। चैतन्यस्वरूप नाना होकर भी वही है, और एक भी वही है, शून्य और शून्य से रहित भी वही है; द्वैतरूप भी वही है और अद्वैतरूप भी वही है; ऐसा भासित होगा ।
इति श्रीयो० नि० शिखिध्वजप्रथमप्रबोधननाम सप्तसप्ततितमम्मर्गः ॥ ७७ ॥
कुम्भज बोले, हे राजन् ! जो कुछ तुम देखते हो, सो सब चैतन्य घन है। उसमें 'अहं', 'त्वं' शब्द कोई नहीं। 'अहं', 'त्वं' शब्द प्रमाद से होते हैं। जब आत्मा में स्थित होकर देखोगे तब आत्मा से भिन्न कुछ न दीखेगा। फिर 'अहं', 'त्वं' शब्द कहाँ भासित हों ? हे राजन् ! ये नाना प्रकार की संज्ञाएँ चित्त की कल्पना हैं। जब चित्त से रहित होगे, तब 'नाना' और 'एक', कोई संज्ञा न रहेगी। हे राजन् ! 'सब ब्रह्म' (सर्व खल्विद ब्रह्म) है, यह वाक्य वेद का सार है। जब इस वाक्य में दृढ़ भावना बुद्धि होगी, तब एकरस आत्मा ही दृष्टिगोचर होगा और चित्त नष्ट हो जावेगा। जब चित्त नष्ट हुआ, तब केवल महाशुद्ध आकाश की नाईं स्थित होकर निर्दुःख पद को प्राप्त होगे, जो आदि पद और सर्वदा मुक्तिरूप है। राजा बोले, हे भगवन् ! आपने कहा कि चित्त के नष्ट होने से कोई दुःख न रहेगा और चित्त के नष्ट होने का उपाय भी आपने कहा। परन्तु मैं भली भाँति नहीं समझा। मेरे दृढ़ होने के निमित्त कृपा करके फिर कहिये कि चित्त कैसे नष्ट होता है। कुम्भज बोले, हे राजन् ! यह चित्त न किसी काल का है, न किसी को है, और न यह देखता है। चित्त है ही नहीं तो मैं तुमसे क्या कहूँ और जो चित्त तुमको दृष्ट आता है तो तू आत्मा ही जान, आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं।
२४० ✹ योगवाशिष्ठ ✹
हे राजन् ! महासर्ग के आदि और अन्त में कोई सृष्टि नहीं, केवल आत्मा है, और आत्मा में कुछ नहीं कह सकते । मैंने तुम्हारे जानने के निमित्त ऐसा कहा है । मध्य में जो कुछ दृष्टिगत होता है, वह अज्ञानी की दृष्टि है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं । आत्मा किसी का उपादानकारण या निमित्तकारण भी नहीं है; क्योंकि वह अच्युत है--परिणाम को नहीं प्राप्त होता । उपादान भी परिणाम में होता है । आत्मा शुद्ध, निराकार, आकाशरूप है । तब वह कारण-कार्य किसका हो ? चित्त भी वासनारूप है और वासना तब होती है, जब कोई वस्तु होती है । जब आगे सृष्टि नहीं, तब वासना किसकी जगे और चित्त में संसार की स्थिति कैसे हो ? इससे चित्त कुछ नहीं । यह विश्व आत्मा का चमत्कार है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है । वह केवल निरालम्ब अपने आपमें स्थित है । हे राजन् ! संसार भी नहीं हुआ और चित्त भी नहीं हुआ, तब 'अहं' आदिक शब्द भी आत्मा में नहीं हो सकते । ये शब्द तब होते हैं, जब चित्त होता है, और चित्त तब तक है, जब तक वासना है । जब निर्वासनिक पद को प्राप्त हुआ तब कोई कल्पना नहीं रहती ।
हे राजन् ! यह संसार महाप्रलय में नष्ट हो जावेगा और मत्-अमत् संसार कुछ न रहेगा । एक आत्मा ही शेष रहेगा, जो निराकार और शुद्ध है । जब तक महाप्रलय नहीं होता, तब तक संसार है । महाप्रलय क्या है, यह भी सुनो । एक क्षण आत्मा का साक्षात्कार होने से सृष्टि का शेष भी न रहेगा । ज्ञान ही महाप्रलय (अत्यन्त प्रलय) है, और अब जो देख पड़ता है, सो मिथ्या है । यह क्रिया भी मिथ्या है और इसका भान होना भी मिथ्या है । जैसे स्वप्न की क्रिया भी मिथ्या है और उसका भान होना भी मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत संसार स्वप्नमात्र है, और कारण बिना ही भासित होता है । जो कारण बिना है, वह मिथ्या है । इसका कारण अज्ञान अर्थात् अपना रूप न जानना ही है । जब अपने रूप को जाना, तब अपना रूप आप ही भासित होगा । जैसे स्वप्न में अज्ञान से भिन्न आकार भासित होते हैं, पर जब ज्ञान से