योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1029, कुल 1734 में से
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अनात्म अभिमान में तुमने यहाँ तपादिक क्रियाओं का आरम्भ किया है। ऐसी खाई में तुम पड़े हो।
हे राजन् ! तुम जानकर खाई में नहीं पड़े। खाई के ऊपर घास और तृण पड़ा था, उस छल से तुम गिर पड़े हो। वह छल और तृण क्या है, यह भी तुम सुनो। प्रथम तो अज्ञानरूपी शत्रु को तुमने न मारा और जञ्जीर के भय से भागे कि वन मेरा कल्याण करेगा; पर सन्तों और शास्त्रों के वचनों को न जाना कि वे तुम्हारे दुःख निवृत्त करेंगे। उन वचनरूपी खाई पर तृणादिक था, इसी मूर्खता के कारण तुम गिरे। जैसे राजा बलि पाताल में छल से बाँधा हुआ है, वैसे ही तुमने भविष्य का विचार न किया कि अज्ञानरूपी शत्रु जो रह गया है, वह मेरा नाश करेगा। इस विचार के बिना तुम फिर दुःखी हुए। सब त्याग तो किया, परन्तु यह न जाना कि मैं अक्रिय हूँ, इस क्रिया का आरम्भ काहे को करता हूँ? इसी से तुम फिर फाँसी में बँधे हो। हे राजन् ! जो पुरुष इस फाँसी से मुक्त हुआ है, वही मुक्त है और जिसका चित्त अनात्म-अभिमान से बँधा है कि यह मुझे प्राप्त हो, वह उससे दुःख पाता है। जिस पुरुष ने वैराग्य और विवेकरूपा दाँतों से आशारूपी जञ्जीर को नहीं काटा, वह कदापि सुख नहीं पाता। विवेक से वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्य से विवेक होता है। विवेक सत्य के जानने और असत् देहादिक को असत्य जानने को कहते हैं। जब ऐसे जाना तब असत् की ओर भावना नहीं जाती, यह वैराग्य हुआ। वैराग्य से विवेक और विवेक से वैराग्य उपजता है। इन विवेक और वैराग्यरूपी दाँतों से आशारूपी जञ्जीर को तोड़ो। हे राजन् ! यह हस्ती का वृतान्त जो तुमसे कहा है, उस पर विचार करने से तुम्हारा मोह निवृत्त हो जावेगा। हे राजन् ! वह हाथी बड़ा बली था और महावत कम बली। उस अज्ञानरूपी महावत को मूर्खता करके तुमने न मारा, इसी से दुःख पाते हो। अब तुम वैराग्य और विवेकरूपी दाँतों से आशारूपी फाँसी को तोड़ो, तब दुःख सब मिट जावेंगे।
इति श्रीयो० नि० हस्तीवृत्तान्तवर्णनं नामैकसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७१ ॥