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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1028, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1028

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ <span style="float:right;">२१५</span>

जैसे आकाश में पत्थर नहीं ठहरता। इससे में जो उपदेश करता हूँ, उसको ग्रहण करो तो तुम्हारे दुःख निवृत्त हो जावेंगे। हे राजन्! यह सबसे श्रेष्ठ ज्ञान कहा है। अब और कहता हूँ। तुमने जो तप का आरम्भ किया है और उसका जो फल जाना है, उस ज्ञान से यह श्रेष्ठ ज्ञान कहता हूँ। इससे तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जायगा। हे राजन्! मैंने यह चिन्तामणि का सम्पूर्ण तात्पर्य तुमसे कहा। अब हाथी का वृत्तान्त, जो आश्चर्यरूप है, वह भी सुनो, जिसके समझने से अज्ञान निवृत्त हो जायगा। मन्दराचल का हाथी तो तुम हो और महावत तुम्हारा अज्ञान है। इस अज्ञानरूपी महावत ने तुमको बाँधा था और तुम आशारूपी जञ्जीरों से बँधे। और जञ्जीरें घिस जाती हैं, पर आशारूपी फाँसी नहीं कटती। यह दिन दिन बढ़ती ही जाती है। हे राजन्! आशारूपी फाँसी से तुम महादुःखी थे। हस्ती के जो बड़े दाँत थे, जिनसे उसने साँकलों को तोड़ा था, वे विवेक और वैराग्य थे। तुमने विचार किया कि में बल करके छूटूँ। राज्य, कुटुम्ब और पृथ्वी का त्याग कर जब तुमने उस फाँसी को काटा तब आशारूपी रस्से कटे तो अज्ञानरूपी महावत भय को प्राप्त हुआ और तुम्हारे चरणों के तले आ पड़ा। जैसे वृक्ष के ऊपर वैताल रहता है और कोई वृक्ष को काटने आता है तब वैताल भय को प्राप्त होता है, वैसे ही तुमने वैराग्य और विवेकरूपी दाँतों से आशा के फाँस काटे, तब अज्ञानरूपी महावत गिरा और तुमने एक घाव लगाया, परन्तु मार न डाला, इससे महावत वैसे ही तुमसे भाग गया, जैसे वृक्ष पर वैताल रहता है और वृक्ष को कोई काटने लगता है, तब वैताल भाग जाता है। हे राजन्! वैसे ही वृक्ष को तुमने वैराग्यरूपी शस्त्र से काटा, तब अज्ञानरूपी वैताल भागा था; मूर्खता से उसको तुमने नहीं मारा, बल्कि उसको छोड़कर वन को गये। जब तुम वन में आये, तब अज्ञानरूपी महावत तुम्हारे पीछे चला आया और उसने तुम्हारे चारों ओर खाई खोदी। तब आदिक क्रिया आरम्भ कर तुम उस खाई में गिर पड़े और महादुःख को प्राप्त हुए। तब उसने तुम्हें जञ्जीरों से फिर बाँधा और बँधे हुए तुम अब तक दुःख पाते हो।