योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1012, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❈ निर्वाण प्रकरण ❈
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शक्तियों से संयुक्त होकर धनी बनी और अणिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त हुई। एक रात्रि में राजा सोया था। तब वह अवकाश पाकर आकाश के बहुत स्थानों में विचरी। फिर देवलोक में अति चञ्चल काली का रूप रखकर फिरी। फिर मध्य दिशा, देवलोक, दैत्यों, यक्षों, विद्याधरों और सिद्धों के लोकों में होकर सूर्यलोक, चन्द्रलोक, मेघ-मण्डल और इन्द्रलोक में गई और वहाँ का कौतुक देखकर फिर नीचे के लोकों में आई। समुद्र में प्रवेश करके फिर अग्नि में प्रवेश कर गई। पवन में पवनरूप हुई और नागलोक की कन्याओं में क्रीड़ा की। फिर वनों, पर्वतों, भूतों, अप्सराओं और त्रिलोकी के मध्य विचरी। इसी प्रकार लीला करके फिर एक क्षण में उसी स्थान में, जहाँ राजा सोया था, आई और राजा के समीप सो रही, जैसे भँवरी भँवरा कमलिनी के मध्य में शयन करते हैं। पर राजा ने न जाना कि रानी कहीं गई थी या नहीं गई थी। जब रात्रि बीती और प्रातःकाल हुआ तब राजा ने स्नानशाला में जाकर स्नानकर वेदोक्त कर्म किये और रानी ने भी अपने स्वाभाविक कार्य किये। जैसे पिता पुत्र को मीठे वचनों से उपदेश करता है, वैसे ही रानी ने राजा को धीरे-धीरे तत्त्व का उपदेश किया और पण्डितों से भी कहा कि तुम भी राजा को उपदेश करो; बताओ कि यह जगत् स्वप्नवत् भ्रम है, दीर्घ रोग और दुःखों का कारण है। आत्मज्ञान की औषध से इसका नाश होता है; और कोई इसकी औषध नहीं। इसी प्रकार आप भी राजा को उपदेश करती और पण्डित लोग भी उपदेश करते थे, परन्तु राजा ने वह ज्ञान न पाया और चित्त विक्षेप में पड़ा रहा। राजा ने उस उत्तमपद में विश्राम न पाया, जो अपना आप केवल चिद्रूप, प्रत्यक् आत्मा है। राम ने पूछा, हे महामुनि ! रानी तो सर्वशक्तिसम्पन्न थी, योगकला में भी अति चतुर और ज्ञानकला में तद्रूप थी और राजा भी अति मूढ़ न था। फिर उसकी समझ में रानी का उपदेश क्यों न दृढ हुआ ? रानी भी उसको प्रीति से उपदेश करती थी, तब क्या कारण था जो वह अपने पद में स्थित न हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे बिना छिदे मोती