योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ * योगवाशिष्ठ *
है। जहाँ षोडशकला चन्द्रमा को सूर्य ग्रस लेता है, उस मध्यभाव में तुम स्थित होओ। जब अपान प्राणों के स्थान में आकर स्थित होता है और प्राणरूप होकर उदय नहीं होता सो यह शान्तिरूप भाव है—उसमें स्थित होओ। प्राण निकलकर जब मुख से द्वादश अंगुल पर्यन्त बाहर स्थित होता है और जबतक अपान भाव को प्राप्त होकर उदय नहीं होता, वह जो मध्यभाव है, उसमें तुम स्थित होओ। मेष आदिक जो द्वादश राशियाँ हैं, उनमें एक को त्यागकर दूसरी राशि को जब तक संक्रान्ति नहीं प्राप्त होती, उसका नाम संक्रान्ति है और उनके मध्य में जो सन्धि है उसका नाम पुण्यकाल है। वह पुण्यकाल भीतर और बाहर प्राण-अपान की सन्धि के समय में तृणवत् है। उन संक्रान्तियों में जो वैशाख की विषुवत संक्रान्ति है, सो शिवरात्रि है। चैत्र की संक्रान्ति में त्रयोदश दिन होते हैं और अस्त की संक्रान्ति में त्रयोदश दिन हैं। इनका नाम विषुवत है। जहाँ दिन और रात्रि सम होते हैं और दक्षिणायण और उत्तरायण की जो सन्धि होती है, इनके भीतर और बाहर भेद को जाने, तब जन्म से रहित होकर परम बोध को प्राप्त हो। हे राम! उत्तरायण मार्ग योगीश्वरों का है उसमें वे क्रम से मुक्त होते हैं। दक्षिणायण मार्ग कर्म करनेवालों का है, इसमें वे फिर संसारमार्गी होते हैं। उनके मध्य में जो संधि है, उसमें स्थित होने से परमपद प्राप्त होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अग्निसोमविचारयोगो नामाष्टषष्टितमसर्गः ॥ ६८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह योग की सब कला मैंने विस्तार से कही। इसमें उत्तम प्रभाव वर्णन हुआ है। प्रयोजन यही है कि तुम निर्वाण पद में स्थित हो और आत्मब्रह्म की एकता करो, जिससे फिर जन्म मरण आदि का दुःख न हो। ब्रह्म सत्, चित्, आनन्द स्वभाव-मात्र है। एक आत्मा में एकत्वभाव होते हैं, वही भाव रहते हैं। धर्मी शक्ति का धर्मी होता है और अविद्या नष्ट हो जाती है। इस प्रकार जब वह चूड़ाला रानी योग और ज्ञान के अभ्यास में पूर्ण हुई, तब सब