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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1010, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1010

निर्वाण प्रकरण२०१

जडरूप सूर्य और चन्द्रमा दोनों रूपों से युक्त है। निर्मलरूप प्रकाश जो चिद्रूप है, उसका नाम सूर्य है। और जड़ात्मक तमरूप चन्द्रमा का शरीर है। जब निर्मल चैतन्यरूप सूर्य आत्मा का दर्शन होता है, तब संसार के दुःखरूप जो तम हैं वे नष्ट हो जाते हैं-जैसे आकाश में सूर्य के उदय में श्याम रात्रि का तम नष्ट हो जाता है। जड़ चन्द्रमा रूप देह को जब देखता है, तब चैतन्यरूप सूर्य नहीं भासित होता-असत्य की नाईं हो जाता है, और जब चैतन्य की ओर देखता है, तब देह नहीं भासित होता। केवल-लक्ष में दूसरे की उपलब्धि नहीं होती। केवल चैतन्यपद को प्राप्त होने पर द्वैत से रहित निर्वाणभाव होता है, और जड़भाव को प्राप्त होने पर चैतन्य नहीं भासित होता। इससे संसार के दर्शन का कारण दोनों हैं। चेतन सूर्य में जड़ चन्द्रमा की उपलब्धि होती है और जड़ चन्द्रमा में चेतन सूर्य की उपलब्धि होती है। जैसे अग्निरूप प्रकाश अंधकार के बिना सिद्ध नहीं होता, वैसे ही इन दोनों की संधिविना आत्मा की उपलब्धि नहीं होती। प्रकाश बिना केवल जड़ की उपलब्धि भी नहीं होती। जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जिस दीवार पर पड़ता है, वह दीवार प्रकाश से चमकती है और प्रकाश दीवार से चमकता है, वैसे ही चित्त जब फुरता है, तब जीव को जगत् भासित होता है और फुरना जगत् से होता है। फुरने से रहित अचेत्य चिन्मात्र निर्वाण है। इससे हे राम! जगत् को अग्नि और सोम जानो। चेतन का देह से सम्बन्ध है, परन्तु जिसका आधिक्य होता है उसकी जय होती है। प्राण-अग्नि उष्णरूप है और अपान शीतल-चन्द्रमारूप है। ये दोनों प्रकाश और छायारूप हैं-इनको जानना सुख का मार्ग है। हे राम! जब बाहर से शीतलरूप अपान भीतर को आता है, तब उष्णरूप प्राण में जाकर स्थित होता है और जब हृदयस्थान से निकलकर उष्णरूप प्राण बाहर को द्वादश अंगुल पर्यन्त जाता है; तब अपान जो चन्द्रमा का मण्डल है, उसको प्राप्त होता है। अपान प्राण-रूप होकर और प्राण अपानरूप होकर उदय होता है। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही इनका परस्पर आपस में प्रतिबिम्ब पड़ता