योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८० योगवाशिष्ठ
अनुभव की युक्ति उनको नहीं आती। यह अभाव प्रमाण भी प्रत्यक्ष प्रकट है। शीतलता का परिणाम यह है कि जैसे अग्नि के भाव से शीतलता के अभाव में उष्णता होती। दिन के अभाव में रात्रि और छाया के अभाव में धूप इत्यादि का नाम अभाव परिणाम है। अग्नि-में धूम्र-भाग निकलता है, वह मेघ बनता है, इस कारण अन्नरूप परिणाम से चन्द्रमा का कारण अग्नि होता है और अग्नि नष्ट होकर शीतलभाव को प्राप्त होता है, तब उसका नाम विनाश परिणाम है, जिससे अग्नि चन्द्रमा का कारण होता है। सात समुद्रों का जल पान करके बड़वाग्नि धूम्र को उगलता है सो धूम्र मेघ को प्राप्त होकर अत्यर्थ जल का कारण होता है। सूर्य जो विनाश के अर्थ चन्द्रमा का पान करता है सो अमावस्या पर्यन्त बारम्बार भक्षण करता है, और फिर शुक्लपक्ष में उसे उगलता है। जैसे सारस पक्षी भीठ की जड़ को भक्षण करके उगल डालता है। हे राम! अमृत के समान शीतल जो चन्द्रमारूप अपान वायु है, वह मुख के अग्रभाग में रहता है। वह कणिका रूप जल जब शरीर में जाता है, तब वह जल का अणु अपान और सूर्यरूपी प्राण स्फुरण को प्राप्त होता है। इस प्रकार अन्नरूप परिणाम में जल अग्नि का कण होता है; जब जल का नाश हो जाता है तब वह उष्णभाव अग्नि को प्राप्त होता है—इसका नाम विनाश परिणाम है। इस प्रकार जल अग्नि का कारण कहलाता है। अग्नि का नाश होने पर चन्द्रमा उत्पन्न होता है। इसका नाम विनाश परिणाम है। और चन्द्रमा का अभाव होने पर अग्नि उत्पन्न होता है। इसका नाम भी विनाश परिणाम है। जैसे तम के अभाव में प्रकाश का उदय होता है और प्रकाश के अभाव में तम होता है; दिन के अभाव में रात्रि और रात्रि के अभाव में दिन होता है; इसके मध्य में जो विलक्षणरूप है, उसे बुद्धिमान भी नहीं जान पाते। वह तम और प्रकाश दोनों रूपों से मुक्त है। इनके मध्य में जो संधि है सो आत्मरूप है। उसमें स्थित होकर चेतन और जड़ दोनों रूपों में भूत स्फुरित होते हैं। जैसे दिन और रात्रि, तम और प्रकाश से पृथ्वी में चेष्टा करते हैं सो चेतन और