योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ १६६
चन्द्रमा है, और प्राणरूप उष्ण पवन जो प्रकट होता है, वह सूर्यरूप है। वही उष्ण और शीतल पवन सूर्य और चन्द्रमा के नाम से देह में स्थित है। आदि-प्राण वायुरूप सूर्य और अपानरूप चन्द्रमा से सूर्यरूप होकर स्थित होता है। सूर्य उष्ण और चन्द्रमा शीतल है। इन दोनों से जगत् हुआ है। विद्या, अविद्या, सत्य, असत्यरूप जगत् इन दोनों से युक्त है। सत्, चित्, प्रकाश, विद्या, उत्तरायण, सूर्य, अग्नि आदिक नाम बुद्धिमान् निर्मलभाव के कहते हैं। और असत्, जड़, अविद्या, तम, दक्षिणायन आदिक नाम चन्द्रमारूप से मलिनभाव के कहते हैं।
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अग्नि, सूर्यरूप जो प्राणवायु है उसमें शीतल जलमय अपानरूप चन्द्रमा कैसे उत्पन्न होता है और अपान जल चन्द्रमारूप से सूर्य कैसे उत्पन्न होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सूर्य चन्द्रमा जो अग्नीषोम कहलाते हैं, वे परस्पर कार्य-कारणरूप हैं। जैसे बीज से अंकुर और अंकुर से बीज होता है, जैसे दिन से रात्रि और रात्रि से दिन होता है और जैसे छाया से धूप और धूप से छाया होती है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रमा परस्पर कार्य-कारण होते हैं। कभी कभी इनकी एकत्र उपलब्धि भी होती है। जैसे सूर्य के उदय होने पर धूप और छाया दोनों एकत्र हो जाते हैं। कार्य-कारण भी दो प्रकार का है—एक कार्य सत्यरूप परिणाम से होता है, दूसरा विनाशरूप परिणाम से होता है। एक से जो दूसरा होता है वैसे ही हैं। जैसे बीज नष्ट हो गया हो तो उससे अंकुर होता है। यह विनाशरूप परिणाम हुआ। और जैसे मृत्तिका से घट उपजता है, वह सत्यरूप परिणाम कहाता है। जो कारण-कार्य के भाव में भी इन्द्रियों से देख प्रत्यक्ष पाइये, उनका नाम सत्यरूप परिणाम है। और जो कार्य में इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं पाया जाता, जैसे दिन में रात्रि और रात्रि में दिन, वह विनाशरूप परिणाम कहाता है। जैसे प्रत्यक्ष प्रमाण है, वैसे ही अभाव प्रमाण भी है। इसमें विनाशभाव भी एक कारणरूप है। युक्तिवादी कहते हैं कि अपने संवित् में कर्तव्य नहीं बनता इत्यादि, सो वे इस अर्थ की अवज्ञा करते हैं और अपने अनुभव को नहीं जानते।