योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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भीतर दो कमल हैं, एक अधः और दूसरा ऊर्ध्व । अधः में चन्द्रमा की स्थिति है और ऊर्ध्व में सूर्य की स्थिति है । उनके मध्य में कुण्डलिनी लक्ष्मी स्थित है । जैसे पद्मराग मणि का सम्पुट हो या मोतियों का भण्डार हो, वैसे ही उसका महाउज्ज्वलरूप है । जैसे आवर्त में फेन के मिलने से शलशल शब्द प्रकट होता है, वैसे ही उसमे शब्द निकलता है, और जैसे डगडे के साथ हिलाने से सर्पिणी शब्द करती है, वैसे ही उस कुण्डलिनी में प्रणव शब्द का उदय होता है । हे राम ! आकाश और पृथ्वी जो ऊर्ध्व और अधःरूप दो कमल हैं, उनके मध्य में स्पन्दनरूपिणी कुण्डलिनी शक्ति स्थित है । वह जीवकला पुर्यष्टक का अनुभवरूप अति प्रकाशमान सूर्य की तरह हृदयरूप कमल की भ्रमरी है । वह सबका अधिष्ठान आदि-शक्ति हृदयकमल में विराजमान है । उस हृदयाकाश में कुण्डलिनी शक्ति है । उसमें से कोमल मृदुरूप स्वाभाविक वायु निकलती है । वही पवन निकलकर दो होता है, एक प्राण और दूसरा अपान । वही परस्पर मिलकर स्फुरणरूप होता है । जैसे वृक्ष के पत्तों के हिलने से उनसे शीघ्र ही अग्नि प्रकट होती है, या बाँसों की रगड़ में अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही प्राण अपान से अग्नि प्रकट होकर जब आकाश में उदय होती है, तब सब ओर से भीतर प्रकाश होता है । जैसे सूर्य के उदय होने पर सब ओर से भुवन प्रकाशित होते हैं, वैसे ही सब ओर से हृदय प्रकाशित होता है । सूर्यरूप तारा अग्नि-सदृश तेज के आकार है । हृदयकमल का आकार स्वर्णरूप है और उसके चिन्तन से योगी तद्गत होते हैं । वह प्रकाश ज्ञानरूप है और उस तेज से योगी की वृत्ति तद्गत होती है अर्थात् एकत्वभाव को प्राप्त होती है । तब लक्ष योजन पर्यन्त जो पदार्थ हों, उनका उसे ज्ञान हो आता है और सब प्रत्यक्ष देख पड़ते हैं । हृदयरूपी सरोवर उस अग्नि का स्थान है । जैसे बड़वाग्नि समुद्र में रहती है और उसका जल ही इन्धन है अर्थात वह जल को दग्ध करती है, वैसे ही हृदयरूप सरोवर में उसका निवास है और वह रस-शीतलता रूप जल को पचाती है । उस हृदयकमल में जो अपानरूप शीतल वायु प्रकट होता है, उसका नाम