योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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उठता है। जैसे राजा को क्षोभ होता है तो सेना को भी क्षोभ होता है और जब राजा को शान्ति होती है तब सेना को भी शान्ति होती है, वैसे ही जब मन में क्षोभ होता है, तब रोग होता है और जब मन में शान्ति होती है, तब नाड़ी अपने-अपने स्थानों में स्थित होती है—कोई रोग नहीं होता। इससे हे राम ! आधिव्याधि रोग तब होते हैं जब मनुष्य का चित्त निर्वासनिक नहीं होता, पर जब चित्त शान्त होता है, तब रोग कोई नहीं रहता। इससे निर्वासनिक पद में स्थित हो।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! पीछे आपने कहा है कि मन्त्रों से भी रोग निवृत्त होता है, सो कैसे निवृत्त होता है ? वशिष्ठजी ने कहा, हे राम ! प्रथम मनुष्य को श्रद्धा होती है कि इस मन्त्र से रोग निवृत्त होगा, तब पुण्यक्रिया, दान, सन्तजनों की संगति और य, र, ल, व आदिक जो अक्षर हैं इनका जप करके (क्योंकि जितने कुछ जप और मन्त्र हैं सो इन अक्षरों में सिद्ध होते हैं) व्याधिरोग निवृत्त हो जाता है। योगीश्वरों का क्रम अणु और स्थूल है सो भी सुनो। जब ये प्राण और अपान कुण्डलिनी शक्ति में स्थित होते हैं तो इनको वश करके योगी गम्भीर होता है। जैसे मशक में पवन होता है इसी प्रकार पवन को स्थित करके कुण्डलिनी सुषुम्णा में प्रवेश करती है और ब्रह्मरन्ध्र में जा स्थित होती है। एक मुहूर्त्त पर्यन्त वहाँ स्थित हो तो मनुष्य आकाश में सिद्धियाँ देखता है। जिस प्रकार इसका क्रम है, वह भी तुमसे कहता हूँ। हे राम ! सुषुम्णा के भीतर जो ब्रह्मरन्ध्र है, उसमें जब पूरक द्वारा कुण्डलिनी शक्ति स्थित होती है, अथवा रेचक प्राण वायु के प्रयोग से द्वादश अंगुल पर्यन्त मुख से बाहर अथवा भीतर या ऊपर एक मुहूर्त्त तक एक ही बार स्थित है, तब आकाश में सिद्धों का दर्शन होता है।
राम ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! जब ब्रह्मरन्ध्र में जीव-कला जाकर स्थित होती है, तो कैसे दर्शन होता है ? दर्शन तो नेत्रों से होता है, सो नेत्र आदि इन्द्रियां कोई नहीं होतीं; नेत्रों बिना दर्शन कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहु राम ! पृथ्वी में विचरनेवालों को आकाश