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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1005, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1005

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १६५

दिशाएँ उस वृक्ष के पत्ते हैं, शुभ-अशुभ कर्म उसके फल हैं और स्थावर-जंगम फल हैं। जैसी-जैसी वासना पुर्यष्टक से मिलकर जीव करता है, वैसा ही आगे फल होता है।

हे राम ! इससे वासना का त्याग करो। वासना ही संसाररूपी वृक्ष का बीज है और निर्वासनिक होना ही पुरुषप्रयत्न है। तब विश्व कदापि न भासित होगा। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकाररूपी रात्रि नहीं रहती, वैसे ही ज्ञानरूपी सूर्य के उदय होने पर संसाररूपी अन्धकार निवृत्त हो जाता है। हे राम ! आधि-व्याधि बड़े रोग हैं। वे मन में होते हैं। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आधिरोग तो मन में होता है, पर व्याधि तो शरीर का रोग है; वह मन से कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! व्याधि दो प्रकार की है। एक लघु और दूसरी दीर्घ। जो शरीर को कोई दुःख प्राप्त हो, उसे लघु कहते हैं। वह स्नान और जप से निवृत्त हो जाती है। दीर्घव्याधि जन्म-मरण के रोग को कहते हैं। वे बड़े रोग हैं और मन के शान्त हुए बिना निवृत्त नहीं होते। इसी से आधिव्याधि दोनों मन से होते हैं। फिर राम ने पूछा, हे भगवन् ! व्याधि मन से कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब चित्त शान्त होता है, तब कोई रोग नहीं रहता। जब तक चित्त शान्त नहीं होता, तब तक आधिव्याधि होती है। जो कुछ अन्न बाहर अग्नि में परिपक्व होता है, उसको जब मनुष्य भोजन करते हैं तब भीतर जो कुण्डलिनी पुर्यष्टका से मिली हुई है, वह उदान पवन को ऊर्ध्वमुख हो उठाती है और अपान पवन उससे नीचे को उठता है। उदान और अपान का आपस में विरोध है—उनके क्षोभ में अग्नि उठती है और हृदयकमल में स्थित होती है। तब बाहर अग्नि का पका भोजन हृदय की अग्नि में फिर पकता है और सब नाड़ियाँ अपने-अपने भाग रस को ले जाती हैं। वीर्यवाली नाड़ी वीर्य को और रुधिरवाली नाड़ी रुधिर को रखती है। पर जब राग और द्वेष में चित्त कुण्डलिनी शक्ति में क्षोभ को प्राप्त होता है, तब नाड़ी अपने-अपने स्थानों को छोड़ देती हैं और अन्न भी भीतर पक्व नहीं होता। तब उस कच्चे रस से रोग