योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता सर्वत्र समान है और प्रकट सात्त्विकगुण में दीखती है। जो कुछ नाड़ियाँ और इन्द्रियाँ हैं, वे कुण्डलिनी शक्ति से उदय होती हैं। जब यह जीव कुण्डलिनी शक्ति में स्थित होकर पवन को स्थिर करता है, तब जो कुछ भीतर प्राणवायु हैं, वे सब इसके वश होते हैं। जैसे सब सेना राजा के वश होती है, उसी प्रकार सब इन्द्रियाँ प्राण के वश होती हैं। जो प्राणवायु वश नहीं होता तो आधि-व्याधि अंग उपजते हैं।
राम ने पूछा, हे भगवन ! आधि-व्याधि कैसे होती है, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मन की पीड़ा का नाम आधि है और देह के दुःख को व्याधि कहते हैं। आधि तब होती है, जब संकल्प होता है कि यह सुख मुझे मिले। पर यदि वह वस्तु नहीं प्राप्त होती, तब चिन्ता करके मनुष्य दुःख पाता है। और व्याधि तब होती है, जब वात, पित्त, कफ का विकार शरीर में होता है और उससे मनुष्य दुःख पाता है। जब मन और शरीर का दुःख इकट्ठा होता है, तब आधि-व्याधि, दुःख इकट्ठे होते हैं; और जब भिन्न-भिन्न होते हैं, तब दुःख भी भिन्न-भिन्न होते हैं। ज्ञानवान् को न आधि होती है, न व्याधि। यह योग की कला मैंने विस्तार से नहीं कही; क्योंकि पूर्व के ज्ञानक्रम का प्रसंग रह जायगा। जितनी कला है, उन सबको मैं जानता हूँ; परन्तु यह कला ज्ञान-मार्ग को रोकनेवाली है। वासना चार प्रकार की है, सो सुनो। एक वासना सुषुप्ति है, दूसरी स्वप्न, तीसरी जाग्रत और चौथी क्षीण। स्थावर योनि की सुषुप्ति वासना है, सो आगे चेतेगी। तिर्यक्-योनि की स्वप्न वासना है, उनको वासना का ज्ञान भी नहीं। जङ्गम अर्थात् मनुष्य, देवता आदि की जाग्रत वासना है। वे वासना ही में लगे हैं। ये तीन वासना तो अज्ञानी की हैं। और क्षीण वासना ज्ञानी की है अर्थात् उनको वासना की सत्यता नष्ट हो जाती है। जब इस प्रकार वासना निवृत्त होती है तब आगे संसार भी नहीं रहता। जब कुण्डलिनी शक्ति में वासना उठती है, तब पञ्चतन्मात्राओं के द्वारा संसार का भान होता है। संसाररूपी वृक्ष का बीज वासना ही है। दसों