योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १६३
कैसे लीला करके विचरते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तीन प्रकार की सिद्धि होती हैं—एक तो उपादेय सिद्धि है कि यह वस्तु मुझे मिले। इसके निमित्त अज्ञानी यत्न करते हैं। दूसरी सिद्धि यह है कि यह दुःख मेरा निवृत्त हो और में सुखी हो जाऊँ। यह चिन्ता महा अज्ञानी की रहती है और तीसरी सिद्धि यह है कि जो मैं कर्म करता हूँ, उसका फल मुझे मिले। यह विचार करनेवाला भी अज्ञानी है; क्योंकि वह अपने को कर्त्ता मानता है। ज्ञानवान् इनको नाँघकर वरतता है। वह अगर कभी इनमें वरतता भी है, तो उसको यह निश्चय रहता है कि न मैं कर्त्ता हूँ, न भोक्ता हूँ। योग करके लोग इस प्रकार सिद्ध होते हैं कि देश, काल, वस्तु और क्रिया उनके अधीन हो जाती हैं। मुख में गुटका रखके जहाँ चाहे उसी स्थान में पहुँच जाना, नेत्रों में अञ्जन डाल के जिसको देखना चाहे उसको देख लेना और खड्ग हाथ में धारण करके सम्पूर्ण पृथ्वी का वश कर लेना—यह क्रिया पदार्थ है। और देश यह है कि जो सब पर्वत हैं, उनमें कितने ही पीठ हैं, जो बड़े उत्तम हैं।
जिस प्रकार ये सिद्ध होते हैं सो भी सुनो। नाभि के तले आधार-चक्र में एक कुण्डलनी शक्ति है। सर्पिणी की नाईं उसमें कुण्डल है और वह कुण्डल मार बैठी है। वासना ही उसका विष है। जितनी नाड़ी हैं, उन सबकी यह समष्टि है। उस कुण्डलिनी में जब मनन होता है, तब मन प्रकट होता है। जब निश्चय होता है तब बुद्धि प्रकट होती है। जब अहंभाव होता है, तब अहंकार प्रकट होता है। जब स्मरण होता है, तब चित्त प्रकट होता है और जब उसमें स्पर्श की इच्छा होती है तब पवन प्रकट होता है। इसी प्रकार पञ्चतन्मात्राएँ और चारों अन्तःकरण प्रकट होते हैं। जितनी नाड़ी हैं, वे सब कुण्डलिनी में प्रकट होती हैं और आत्मा का प्रकट होना भी उससे जाना जाता है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! उसमें आत्मा का प्रकट होना कैसे जाना जाता है? आत्मा तो देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है और सब देश, सब काल और सब वस्तुओं में पूर्ण है। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में और धूप में सब जगह दीखता