योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1002, कुल 1734 में से
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आधार, सबका आत्मा और सर्व अमृत है, उसका सार अमृत मैंने पान किया है। इससे मेरा कदापि नाश नहीं और कदापि मुझे कोई भय भी नहीं है। हे राम! जब इस प्रकार रानी ने कहा तो राजा शिखिध्वज उसके वचन न समझा और हँसकर बोला, हे मूर्ख स्त्री! यह तू क्या कहती है? प्रत्यक्ष वस्तु को झूठ बताती है और कहती है कि मैं नहीं देखती। और असत्य वस्तु, जो नहीं दीखती, उसको सत्य कहती है और कहती है कि में दीखती हूँ। ये वचन तेरे कौन मानेगा? इन वचनोंवाला शोभा नहीं पाता। तू जो कहती है कि मैं ऐश्वर्य को त्यागकर श्रीमान् हुई हूँ, सो निष्किञ्चन को पाकर इन वचनोंवाला शोभा नहीं पाता। तू कभी कहती है कि इन भोगों को मैंने त्याग दिया है और इनमें रहित जो अभाग हैं, उनको भोगती हूँ; कभी कहती है कि मैं कुछ नहीं; फिर कहती है, मैं ईश्वर हूँ; इससे महामूर्खता देख पड़ती है। जो इसी में तेरा चित्त प्रसन्न है, तो ऐसे ही विचर; परन्तु यह बात सुनकर इसे कोई सत्य न मानेगा और तुझे यह शोभा भी नहीं देता।
हे राम! ऐसे कहकर राजा उठ खड़ा हुआ और मध्याह्न का समय हो जाने से स्नान के निमित्त गया। रानी के मन में बहुत शोक हुआ। उसने विचार किया कि यह बड़े कष्ट की बात है, जो राजा ने आत्मपद में स्थित न पाई और मेरे वचनों को न जाना। यही मन में सोचकर वह अपने आचार में लगी और फिर अपना निश्चय राजा को न बताया। जैसे अज्ञान-काल में चेष्टा करती थी, वैसे ही अब ज्ञान पाकर भी करने लगी। एक समय रानी के मन में आया कि प्राणों को ऊपर चढ़ाऊँ और ऊर्ध्व को लाकर उदान और अपान को वश करूँ, जिससे आकाश और पाताल दोनों स्थानों में जाऊँ। ऐसे सोच-कर रानी योग में स्थित हुई और प्राणायाम करने लगी। इतना सुनकर राम ने पूछा, हे भगवन्! यह संसार संकल्प से उत्पन्न हुआ है। स्थावर-जङ्गमरूप संसार वृक्ष है और संकल्प इसका बीज। वह कौन प्राणायाम पवन है, जिससे आकाश को उड़ते हैं और फिर नीचे आते हैं? अज्ञानी पुरुष भी उसे यत्न करके कैसे सिद्ध करते हैं और ज्ञानवान्