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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1001, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1001

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १८१

और घाम से बहुत प्रसन्न होती है वैसे ही अपने आनन्दरूप को पाकर चूड़ाला उर्मी में अवस्थित हुई। हे राम ! वह ऐसे आनन्द को प्राप्त हुई, जिसको वाणी में नहीं कह सकते। तब रानी को देखकर राजा शिखिध्वज को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला—हे अङ्गने ! अब तुम फिर यौवन अवस्था को प्राप्त हुई हो और तुमको कोई बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ है। शायद तुमने अमृत का सार पान किया है, इससे अमर हुई हो। या किसी योगेश्वर से तुमने इस कला को प्राप्त किया है; अथवा त्रिलोकी का ऐश्वर्य तुम्हें प्राप्त हुआ है। क्या बात है ? हे अङ्गने ! तुम्हें कौन वस्तु मिली है ? तुम्हारे चित्त की वृत्ति से ऐसा जान पड़ता है कि तुमने अमृत का सार पान किया है व त्रिलोकी के राज्य से भी कोई अधिक पदार्थ पाया है। तुम तो किसी ऐसे बड़े आनन्द को प्राप्त हुई हो, जिसका आदि-अन्त नहीं है। अब तुममें भोगवासना भी नहीं दीखती, शान्तरूप हो गई हो। जैसे शरदकाल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही तुममें निर्मलता दीखती है। और तुम्हारे श्वेत केश भी बड़े सुन्दर लगते हैं। इसलिए बताओ, तुम्हें कौन सी वस्तु हुई है।

चूड़ाला बोली, हे राजन् ! यह जो कुछ दीखता है सो किंचन है। इससे रहित जो निष्किंचनपद है, उसको पाकर मैं श्रीमान् हुई हूँ। जिसका आकार निष्किंचन है और जिसमें दूसरे का अभाव है उर्मी को पाकर मैं श्रीमान् हुई हूँ। और जो कुछ भोग हैं, उनसे रहित होकर अभोग भोग भोगकर उस भोग में नष्ट हुई हूँ। अर्थात् मैंने आत्मज्ञान और आत्मा में विश्राम पाया है, जिससे सदा शान्तरूप और श्रीमान् हूँ। हे राजन् ! जितने ये राजभोग्य सुख हैं, उनको त्यागकर में परम-सुख को भोगती हूँ और राग द्वेष से रहित होकर में ऐसी बनी हूँ कि 'अस्त' भी हूँ और 'नास्ति' भी हूँ। जो कुछ नेत्रों से दिखता है, इन्द्रियों से जाना जाता है और मन से चिन्तन होता है, वह सब स्वप्न सा मिथ्या है। मैं वहाँ स्थित हुई हूँ, जहाँ इन्द्रिय और मन की गति नहीं और अहंकार का उत्थान नहीं, उस पद को मैंने पाया है, जो सबका