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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1000, कुल 1734 में से

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२६० | योगवाशिष्ठ

आकार भासित होते हैं, पर वे सब रूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं। जैसे बड़े पर्वत के जो पत्थर और बट्टे होते हैं, वे पर्वत से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह दृश्य आत्मा से भिन्न नहीं है। ये आकार ऐसे हैं जैसे गन्धर्वनगर नाना आकार का ही भासित होता है, पर ज्ञानवान् को एकरस है और अज्ञानी को भेद-भावना है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलौने हाथी, घोड़ा, राजा, प्रजा आदि बनाता है, और जिसको मृत्तिका का ज्ञान है उसको मृत्तिका ही वे सब भासित होते हैं, भिन्न-कुछ नहीं प्रतीत होता, वैसे ही अज्ञान से नानारूप भासित होते हैं। अब मैंने जाना है कि मैं एकरस हूँ।

हे राम ! इस प्रकार चूड़ाला अपने को जानने लगी कि मैं सन्मात्र, अच्छेद्य, अदाह्य, स्वच्छ, अक्षर और निर्मल हूँ। मुझमें 'अहं' 'त्वं' 'एक' और 'द्वैत' शब्द कोई नहीं, और जन्म, मरण भी नहीं, यह संसार चित्त में भासित होता है, वास्तव में आत्मस्वरूप है। देवता, यक्ष, राक्षस, स्थावर, जङ्गम आदि सब आत्मरूप हैं। जैसे तरङ्ग और बुलबुले समुद्र से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से कोई वस्तु भिन्न नहीं। दृश्य, द्रष्टा, दर्शन ये भी आत्मा की सत्ता से चेतन हैं; इनकी अपने आपमें सत्ता नहीं है। मुझमें अहं का उत्थान कदापि नहीं होगा, क्योंकि मैं अपने आपमें स्थित हूँ। अब इसी पद का आश्रय करके चिरकाल इस संसार में विचरूँगी।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चूड़ालाप्रबोधो नाम सप्तषष्टितमस्सर्गः ॥ ६७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर चूड़ाला, जिसकी तृष्णा निवृत्त हो गई थी और जो दुःख, भय और भोगवासना से निवृत्त होकर केवल शान्तपद को पाकर शोभित हुई थी, पाने योग्य पद पाकर जानने लगी कि इतने काल तक में अपने स्वरूप से गिरी थी; अब मुझे शान्ति मिली है और सब दुःख मिट गये हैं। अब मुझे कुछ ग्रहण और त्याग नहीं करना है अब मैं अपने आत्मस्वभाव में स्थित हुई हूँ निदान एकान्त में बैठ उसने समाधि लगाई जैसे वृद्ध गरु पर्वत की कन्दर पाकर तृण

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