सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 999, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 999

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १८६

आपस में उसी का विचार और चर्चा करते थे। निदान वे ऐसे सन्तों के पास पहुँचे, जो संसारसमुद्र से तारनेवाले और आत्मज्ञानी थे उनकी पूजा करके उन्होंने उनसे प्रश्न किया। राजा और रानी उनसे ब्रह्म-विद्या सुनने लगे कि आत्मा शुद्ध, आनन्दरूप, चैतन्य और एक है, जिसके पाने से दुःख निवृत्त हो जाते हैं। हे राम! तब रानी चूड़ाला तत्त्व विचार में लग गई। वह राजा की कोई सेवा टहल करती तब भी उसके चित्त की वृत्ति विचार ही में रहती थी। वह यह विचारती कि मैं क्या हूँ? यह संसार क्या है और संसार की उत्पत्ति किससे है? ऐसे विचार कर वह जानने लगी कि यह शरीर पञ्चतत्त्व का है अतएव मैं शरीर नहीं हूँ, शरीर जड़ है और कर्म इन्द्रियाँ भी जड़ हैं। जैसे शरीर है, वैसे ही शरीर के अङ्ग भी हैं। ये चेष्टा ज्ञान-इन्द्रियों से करते हैं। ज्ञान-इन्द्रियाँ भी मैं नहीं, क्योंकि ये भी जड़ हैं, स्वयं कुछ नहीं कर सकतीं। मन से इन्द्रियों की चेष्टा होती है, सो मन भी जड़ है; इसमें संकल्प-विकल्प बुद्धि से होता है। बुद्धि भी जड़ है; क्योंकि उसमें निश्चय की चेतना अहंकार से होती है। और अहंकार भी जड़ है, क्योंकि उसमें अहं चेतना से होती है। वह चेतनता जीव से होती है। वह जीव भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि जीवत्व स्फुरणरूप है और मेरा स्वरूप वासनाहीन, सदा उदय रूप और सन्मात्र है। मेरा बड़ा सौभाग्य है और कल्याण होनेवाला है, इसी से चिरकाल के उपरान्त मैंने अपना स्वरूप पाया है, जो अविनाशी, अनन्त और आत्मा है। जैसे शरत् काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही मैं निर्मल विगताम्बर, राग-द्वेषरूपी ताप रहित, चिन्मात्र और अहं-त्व से रहित हूँ। मुझमें कोई वासना नहीं; इसी में शान्तरूप हूँ। जैसे क्षीरसमुद्र मन्दराचल के हटने से शान्तरूप है, वैसे ही मैं चित्त से रहित, निश्चल और अद्वैत हूँ। कभी मेरा स्वरूप परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त होता। ऐसा जो चिन्मात्रपद है, उसको ब्रह्म-ज्ञानियों ने ब्रह्म, परमात्मा और चैतन्य संज्ञा दी है। यह आत्मा ही मन, बुद्धि आदिक दृश्य और संसाररूप होकर फैला है। यह स्वरूप से अच्युत है। चित्त के चेतने से इसमें नाना

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 999, कुल 1734 में से · BharatKosha