सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 998, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 998

१८८ * योगवाशिष्ठ *

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी प्रकार जब राजा और रानी ने अनंत भोग भोगे तो जैसे कुम्भ में छिद्र होने से शनैः शनैः जल निकलता है, वैसे ही शनैः शनैः उनके यौवन के दिन निकल गये । जब वृद्धा-वस्था आई, तब राजा और रानी को वैराग्य उत्पन्न हुआ । वैराग्य में वे यह विचारने लगे कि यह संसार मिथ्या और बिनाशी है, एक सा नहीं रहता और ये भोग भी मिथ्या हैं। इतने काल तक हम इन्हें भोगते रहे, पर तृष्णा पूर्ण न हुई—बढ़ती ही गई । हे राम ! इस प्रकार राजा और रानी वैराग्य से विचारते रहे कि ये भोग मिथ्या हैं और हमारी यौवन अवस्था भी व्यतीत हो गई है । जैसे बिजली का चमत्कार क्षणमात्र होकर लीन जाता है, वैसे ही उनकी यौवन अवस्था व्यतीत हो गई और मृत्यु निकट आई है । जैसे नदी का वेग नीचे चला जाता है, वैसे ही आयु व्यतीत हो जाती है और जैसे हाथ पर जल डालने से बह जाता है, वैसे ही यौवन अवस्था निवृत्त हो जाती है । जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही यह शरीर क्षणभंगुर है । जहाँ चित्त जाता है, वहाँ दुःख भी इसके साथ जाते हैं—निवृत्त नहीं होते । जैसे मांस के टुकड़े के पीछे चील दौड़ती है, वैसे ही जहाँ अज्ञान है, वहाँ दुःख भी पीछे जाते हैं । यह शरीर भी नष्ट हो जायगा । जैसे पका हुआ आम का फल वृक्ष के साथ नहीं रहता, गिर पड़ता है, तैसे ही शरीर भी नष्ट हो जाता है । जो शरीर अवश्य गिरता है उसका क्या आदर करना है । जैसे सूखा पत्ता वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही यह शरीर गिर पड़ता है । इसमें हम ऐसा कुछ करें कि संसाररूपी रोग निवृत्त हो । यह संसाररूपीरोग ब्रह्मविद्या की औषध से निवृत्त होता है; ब्रह्मविद्या से ज्ञान उपजता है और आत्मज्ञान से सब दुःख निवृत्त हो जाते हैं । इसके सिवा और कोई उपाय नहीं । इसलिए आत्मज्ञान के निमित्त हम सन्तों के पास जायँ ।

ऐसे विचार करके राजा और चूड़ाला आत्मज्ञानियों के पास चले । वे आत्मज्ञान की बातें करते थे और आत्मज्ञान में ही चित्तभावना कर