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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 997, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 997

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १८७

ध्वज दूसरा होगा, वह न होगा। प्रथम शिखिध्वज जब षोडश वर्ष का राजकुमार था, तब एक समय शिकार को निकला। वसन्त ऋतु का समय था, राजा अपने बाग में जा ठहरा, जहाँ फूलों के विचित्र कुंजभवन बने हुए थे। कमलिनियाँ मानों स्त्रियाँ और धूलि के कण उनके भूषण थे। उनके समीप पुष्पवृक्ष लगे थे। इसी प्रकार मँवरी और भँवरों की सुन्दर लीला देख राजा को विचार उपजा कि मुझे स्त्री प्राप्त हो तो मैं भी केलि करूँ। निदान उसे अधिक चिन्तना हुई कि कब मुझे स्त्री मिलेगी और कब उसके साथ फूल की शय्या पर शयन करूँगा। जब राजा इस प्रकार भोग का चिन्तन करने लगा, तब मन्त्रियों ने, जो त्रिकाल ज्ञान रखते थे और राजा के शरीर की अवस्था जानते थे, जाना कि हमारे राजा का मन स्त्री पर है, इससे अब राजा का विवाह करना चाहिए निदान एक राजा की कन्या जो बहुत सुन्दरी थी और वर चाहती थी, उससे राजा शिखिध्वज का विवाह शास्त्र की विधि से किया गया और राजा बहुत प्रसन्न होकर अपने घर आया।

उस स्त्री का नाम चूडाला था। वह बहुत सुन्दरी थी। उससे राजा की बहुत प्रीति हुई और उस स्त्री का भी राजा में बहुत स्नेह हुआ। जो कुछ राजा मन में चाहता, वह रानी पहिले ही पूरा कर देती थी। उनकी परस्पर प्रीति ऐसी बढ़ी, जैसे भँवरे और भँवरी में होती है। एक समय राजा मन्त्रियों को राज्य का भार सौंपकर वन को गया और वहाँ नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए दोनों ऐसे विचरते रहे, जैसे सदाशिव और पार्वती या विष्णु और लक्ष्मी विचरें। इसके पश्चात् राजा योगकला सीखने लगे। इधर रानी राजा को भोगकला सिखाती थी। इसी प्रकार वे दोनों सम्पूर्ण कलाओं में पारंगत हुए। चूडाला की बुद्धि राजा की बुद्धि से तीक्ष्ण थी। वह शीघ्र ही सब बातें जान लेती और राजा को सिखाती थी।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वज चूडालोपाख्यानं नाम षट्षष्टितमसर्गः ॥ ६६ ॥

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 997, कुल 1734 में से · BharatKosha