सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 996, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 996

१८६ योगवाशिष्ठ

प्रवाह को से आया, तब फिर समुचित और शान्तपद में स्थित होकर विचरने लगा। उसमें क्षोभ, भय और इच्छा न थी। वह केवल शान्त आत्मपद में स्थित हुआ। जैसे पवन से रहित समुद्र स्थिर होता है, वैसे ही संकल्प-विकल्प से रहित होकर वह राजा स्थिर हुआ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भगीरथोपाख्यानसमाप्तिर्नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो भगीरथ की दृष्टि तुमसे कही है उसका आश्रय करके विचरो। यह दृष्टि सब दुःखों का नाश करती है। एक और ऐसा ही प्राचीन आख्यान है। ऐसे ही एक शिखिध्वज राजा हुआ था। इतना सुन राम ने पूछा, हे भगवन्! वह शिखिध्वज कौन था और उसका आचरण कैसा था, सो कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सात मन्वन्तरों के बीतने के उपरान्त द्वापर-युग की चौथी चौकड़ी में राजा शिखिध्वज हुआ है और आगे फिर भी होगा। वह राजा सम्पूर्ण पृथ्वी का तिलक, महाशूरवीर और सम्पूर्ण ऐश्वर्य से सम्पन्न था, परन्तु उसमें बँधा हुआ या लिप्त न था। वह बड़े भोग भोगता था; बड़े ओज से सम्पन्न, उदार और धैर्यवान था। किसी के साथ अन्याय न करता था। समचित्त, शान्तपद में स्थित और सम्पूर्ण दुःखों से रहित था। याचक की सब प्रार्थना पूर्ण करता था। राम ने पूछा, हे भगवन्! ऐसा ज्ञानवान् राजा फिर क्यों जन्म पावेगा? ज्ञानी तो फिर जन्म नहीं पाता? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे एक समुद्र में कई समान तरङ्ग उठते हैं, कई अर्द्धसम और कई विलक्षण भाव से उठते हैं, वैसे ही आत्मसमुद्र में कई आकार एक से, कई अर्द्ध और कई विलक्षण भाव से उठते हैं, जो समान होते हैं, उनकी चेष्टा और आकार एक से दृष्टि आते हैं। इसी प्रकार शिखिध्वज की ऐसी ही उत्पत्ति होगी।

हे राम! जब इस सर्ग में सात मन्वन्तर और चार चौकड़ी द्वापर युग की बीत जायेंगी, तब जम्बूद्वीप के मालव देश में एक श्रीमान् शिखिध्वज राजा होगा। परन्तु वह आगे होनेवाला उस सा शिखर