योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १८५
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब कुछ काल बीता तो भगीरथ वहाँ से चला और एक देश में पहुँचा, जहाँ का राजा मर गया था और उसकी राजलक्ष्मी राजा को चाहती थी। राजा भगीरथ भिक्षा माँगता फिरता वहाँ पहुँचा। उस राजा के मन्त्री ने भगीरथ को देखा कि जो कुछ गुण और लक्षण राजा में होने चाहिए, वे इसमें हैं। इसलिए वह राजा भगीरथ से बोला, हे भगवन् ! आप इस राज्य को अङ्गीकार कीजिये; क्योंकि आपको यह बिना चाहे प्राप्त हुआ है। निदान राजा ने उस राज्य को ग्रहण किया और उसे न भला जाना, न बुरा। फिर राजा हाथी पर सवार हो सेना सहित सुशोभित हुआ। देश और सब स्थान सेना से पूर्ण हुए। जैसे मेघ से सरोवर पूर्ण होते हैं, वैसे ही वह देश और स्थान सेना से पूर्ण हो गये। नगाड़े और साज बजने लगे। तब राजा राजभवन में गया और महल की सब स्त्रियाँ आईं। इतने में जहाँ का राज्य भगीरथ ने पहले किया था, उस देश से मन्त्री और प्रजा जन आये। उन्होंने भगीरथ से कहा, हे भगवन् ! जिन शत्रुओं को तुमने राज्य दिया था, उनको मृत्यु ने भोजन कर लिया है। जैसे मछली मल मांस को खा लेती है, वैसे ही उनको मृत्यु ने भोजन कर लिया है। इससे अब चलकर तुम राज्य करो। यद्यपि इच्छा तुमको नहीं है, पर तो भी राज्य करो, क्योंकि जो वस्तु अनिच्छित प्राप्त हो उसका त्याग करना श्रेष्ठ नहीं।
इतना सुन राजा ने उस राज्य को भी अङ्गीकार किया और राज्य करने लगा। फिर राजा ने पिछला वृत्तान्त स्मरण कर कि मेरे पितर कपिल मुनि के शाप से भस्म हो कूप में पड़े हैं, यह विचार किया कि मैं उनका उद्धार करूँ; इसलिए अपने मन्त्री को राज्य देकर वह अकेला वन को चला और इच्छा की कि तप करूँ। निदान एक स्थान में स्थित होकर तप करने लगा। गङ्गा को पृथ्वी पर लाने के निमित्त उसने ब्रह्मा, रुद्र और जगत् ऋषि का सहस्र वर्ष पर्यन्त आरा-धन किया। तब गङ्गा, जो विष्णु भगवान् के चरणों से प्रकट हुई हैं, मध्य मण्डल में आईं। जब राजा पितरों के उद्धार के निमित्त गङ्गा के