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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 994, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 994

१८४ * योगवाशिष्ठ *

यज्ञ कहते हैं। तीन दिन में धन का त्यागकर हाथी, घोड़े, रथ, भूषण, वस्त्र इत्यादिक जो ऐश्वर्य था सो लोगों को दे दिया। ब्राह्मण, अर्थी, पुत्र, स्त्री और शत्रुओं को सब पृथ्वी का राज्य दे दिया तब शत्रुओं ने जाना कि अब राजा भगीरथ में कुछ पराक्रम नहीं रहा। तब उन्होंने आकर उनका देश घेर लिया, हवेली पर चढ़ आये और राजा के सब स्थान रोक लिये। राजा के पास केवल धोती-अँगौछा रह गया। तब राजा वहाँ से निकलकर वनों में विचरने लगा और शान्तपद आत्मा में स्थित हुआ।

जब कुछ काल बीता तो भगीरथ फिर अपने देश में आया और अपने शत्रुओं के घर में भिक्षा माँगने लगा। तब शत्रुओं और दूसरे लोगों ने उसकी बहुत पूजा की और कहा, हे भगवन् ! तुम अपना राज्य लो। पर उसने राज्य न लिया। जैसे पृथ्वी पर पड़े तृण को तुच्छ समझकर कोई नहीं ग्रहण करता वैसे ही उसने राज्य नहीं ग्रहण किया। कुछ काल वहाँ रहकर त्रितल ऋषि के पास, जो उसका गुरु था, इच्छारहित होकर गया। गुरु ने आत्मदृष्टि से उसे ग्रहण किया। शिष्य ने भी गुरु को आत्मदृष्टि से ग्रहण किया। गुरु और शिष्य की भावना से रहित हो वे दोनों कुछ काल तक एक स्थान में रहे और फिर वन में इकट्ठे विचरने लगे। वे शान्त और आत्मपद में स्थित रहकर रागद्वेष से रहित केवल एकरस स्थित रहे। उनको न देह त्यागने की इच्छा थी, न देह रखने की। केवल स्वयं प्राप्त अनिच्छित प्रारब्ध में स्थित रहते थे। इतने में स्वर्गलोक के सिद्धों ने आकर उनकी पूजा की और बड़े ऐश्वर्य के पदार्थ चढ़ाये। बहुत सी अप्सराएँ आईं और जितने ऐश्वर्य के भोग पदार्थ थे, वे आये। पर उनको उन्होंने तुच्छ जाना; क्योंकि वे आत्मसुख में तृप्त और केवल आकाश-सदृश निर्मल शुद्ध थे अर्थात् प्रकाशरूप, समचित्त, कलङ्कतारूपी मल से रहित थे। हे राम ! जैसे राजा भगीरथ स्थित हुए हैं, वैसे ही तुम भी स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणवर्णनन्नाम चतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ ६४ ॥