योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 993, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण * १८३
अहं होता है और फिर मम होता है; इससे तुम अहं-मम भाव का त्याग करो। जब अहं-मम का त्याग करोगे, तब अहं प्रत्यय में आत्मपद भासित होगा। वह आत्मा सर्वज्ञ है; सब कुछ आप है; स्वतःप्रकाश और आनन्दरूप है, पर सांसारिक विषय-भोग के सुख-दुःख से रहित है।
जब ऐसे गुरुजी ने कहा, तब राजा बोला, हे भगवन् ! यह अहंकार तो चिरकाल से देह में रहता है और अभिमानी है। उसका क्योंकर त्याग करूँ ? ऋषि बोले, हे राजन् ! अहंकार पुरुष के प्रयत्न से निवृत्त होता है। पहले भोगों में दोष-दृष्टि करना; फिर भोगों की वासना न करना; बारम्बार अपने स्वरूप की भावना करना और विचार करना। इससे तुम्हारा जीवत्व (अहंकार) निवृत्त हो जायगा। हे राजन् ! जब तुम्हारा अहंकार निवृत्त होगा, तब तुमको सर्वत्र आत्मा ही भासित होगा और दुःख से रहित शान्तरूप का प्रकाश होगा। हे राजन् ! यह लज्जा अर्थात संग या आसक्तिरूप फाँसी, जब तक नहीं कटती, तब तक आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती। अहं, मम, तृष्णा, शोक, दुःख और भला कहाने की इच्छा इत्यादि जो मोह के स्थान हैं, उन्हें लज्जा कहते हैं। इससे तुम अहं-मम से रहित बनो। तुम्हारे शत्रु जो राज्य लेने की इच्छा करते हैं, उनको अपना राज्य दे दो और क्षोभ से रहित होकर पुत्र, स्त्री और बान्धवों के मोह से रहित बनो। अपने शरीर में जो मोह है उससे भी रहित होकर राज्य का त्याग करके एकान्तदेश में स्थित हो और इन शत्रुओं के घर में भिक्षा माँगो, जिसमें तुम्हें श्रेष्ठ या भला कहलाने की इच्छा न रहे। अब उठो और जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भगीरथोपदेशो नाम त्रिषष्टितमसर्गः ॥ ६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार त्रितल ऋषीश्वर ने उपदेश किया, तब राजा उठ खड़ा हुआ और घर को गया। गुरु का उपदेश हृदय में रखकर, अपने राज्य में रहकर राज्य करने लगा और मन में तत्त्व-विचार भी करता रहा। जब कुछ काल बीता, तब राजा ने अग्निष्टोम यज्ञ का आरम्भ किया। धन का त्याग करने को अग्निष्टोम