योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
मृत्यु के दुःख निवृत्त होते हैं? ये संसार के सुख तो भीतर से खोखले हैं; इनके परिणाम में दुःख है। त्रितल ऋषि बोले, हे राजन्! एक ही ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य है, जिसके जानने से शान्तपद प्राप्त होता है। वह ज्ञेय आत्मज्ञान है। यह आत्मा न उदय होता है; न अस्त होता है; ज्यों का त्यों अपने आपमें है। हे राजन्! यह जग और मृत्यु तभी तक है, जब तक अज्ञान है; जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होगा तब अज्ञानरूपी अन्धकार निवृत्त हो जायगा और जीव केवल शान्तपद में स्थित होगा। आत्मानन्द सर्वज्ञ है। उसके जानने से चित्जड़ग्रन्थि टूट जाती है, अर्थात् अनात्म देह-इन्द्र्यादिक में आत्मा का अभिमान करना निवृत्त हो जाता है। सब कर्म भी निवृत्त होने और सब संशय नष्ट हो जाते हैं। ऐसे शुद्ध स्वरूप को पाकर ज्ञानी उर्मी में स्थित होते हैं, जो सत्ता सर्वव्यापी, सर्वगत, नित्य स्थित और उदय-अस्त से रहित है। राजा बोले, हे भगवन्! मैं जानता हूँ कि आत्मा चिन्मात्र सत्ता है और देहादिक मिथ्या है। आत्मा सर्वज्ञ, शान्त और अच्युतरूप है, यह जानता हूँ। परन्तु मुझे शान्ति नहीं मिली, क्योंकि आत्मा चिन्मात्र मुझे नहीं भासता और स्वरूप में स्थिति भी नहीं हुई। इसलिए कृपा करके उपदेश करिये कि मैं स्थित होऊँ।
ऋषि बोले, हे राजन्! तुझसे मैं एक ज्ञान कहता हूँ, जिसके जानने में फिर कोई दुःख न रहेगा और उसमें ज्ञेय में तुमको निष्ठा होगी। तब तुम सर्वात्मारूप हो स्थित होगे और तुम्हारा जीवभाव नष्ट हो जायगा। देह और इन्द्रियों में आत्म अभिमान न करके, पुत्र, स्त्री और कुटुम्ब के दुःख में अपने को दुःखी न मानना; नित्य समचित्त रहकर इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में एकरस रहना; चित्त को आत्मपद में लगाकर वृत्ति को ओर न जाने देना; एकान्तदेश में स्थित होना और अज्ञानी का संग न करके, ब्रह्मविद्या का सदा विचार करना; ये ज्ञानी के लक्षण तत्त्वज्ञान के दर्शन के निमित्त तुमसे कहे हैं—इससे विपरीत अज्ञान है। हे राजन्! यह ज्ञेय जानने योग्य है; इसके जानने से केवल शान्तपद को प्राप्त होगे और देह का अहंकार भी निवृत्त होगा। हे राजन्! पहले